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आज की युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में जागरूक है
June 21, 2019 • रुनझुन नुपूर

युवा और आध्यात्म। यह दोनों शब्द ही परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। आम समझ के अनुसार आध्यात्म तो वह मार्ग है जो वानप्रस्थी और सन्यासियों के लिए नियोजित है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह मार्ग है जो केवल बुजुर्गों के लिए उपयुक्त है। परन्तु आज के युग में यह धारणा तेजी से बदल रही है। आज के उन्नत युग में युवा न केवल भौतिक आधारों पर तरक्की कर रहे हैं, बल्कि आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर बढ़ा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में जागरूक है। यह पीढ़ी जानती है कि केवल भौतिक सुखों के पीछे भागने का अंततः परिणाम कष्टदायी ही होता है। प्रगति की अंधी दौड़ सांसारिक सुख-साधन तो जुटा सकती है, परन्तु आत्मिक शांति, सूकून और आनंदमयी जीवन नहीं दे सकती।
यह सत्य है कि आज के युग में भौतिकतावाद चरम पर है। जीवन के हर क्षेत्र में उपभोक्ता संस्कृति ने अपनी पैठ बना ली है। धन-लक्ष्मी का बोलबाला है। हर कोई जीवन की हर सुख-सुविधा, हर संसाधन को जुटाने में व्यस्त है। विदेशी ब्रांडों की छाप हर जगह छाई है। 'कारपोरेट कल्चर' अर्थाथ बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियों में कामकाज के ढ़ंग ने देश में रोजगार के मायने बदल दिए है। इस क्षेत्र में जितना पैसा है, उतने ही मौके और उतना ही काम। आज के युवा उस युग में नही रहते जहाँ 9 से 5 काम करके आदमी अपने परिवार के पास घर आ जाता था। यह 9 से 9 का जमाना है। आज के युवा के पास चुनौती यह नहीं है कि वो कब लाखों कमा पायेगा बल्कि चुनौती यह है कि वह अपने कमायें लाखों को खर्च करने का वक्त कहां से लाए। यह वह युग है जहाँ की युवा पीढ़ी कारपोरेट में काम कर ईमानदारी से भी उतना पैसा कमा सकती है जितना आज से कुछ वर्ष पहले सिर्फ बेइमानी से कमाना संभव था।
इन अपार संभावनाओं के बीच निश्चित तौर पर बहुत कुछ खो गया। पैसे की दौड़ में रिश्ते धुंधलाने लगे, परिवार सिकुड़ने लगे और भौतिकतावाद अपने पंख पसारने लगा। लोगों के पास परिवार के लिए वक्त नही रहा। जो संस्कार पहले बच्चों में स्वतः ही आत्मसात हो जाते थे, उन्हें सिखने-सीखाने के लिए भी इस युवा पीढ़ी को संघर्ष करना पड़ता है। वर्क-लाइफ बैलेंस अर्थाथ काम और निजी जिन्दगी के बीच संतुलन आजकल एक चुनौती बन चुका है।
यह सत्य है कि आधुनिकता की इस दौड़ में बहुत कुछ बदल रहा है। आलोचक इस बदलते समय को केवल आध्यात्मिक और मूल्यात्मक पतन ही मानते है। यह कुछ हद तक सत्य है कि मूल्य बदल रहे हैं। युवाओं का समाज अपने खुद के नियम बनाता और मानता है। इससे बहुत नुकसान हैं। इन नुकसानों के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। पर मैं यहां उन बातों को नही दोहराऊगीं। मैं कुछ समय के लिए इन नुकसानों और नकारात्मक बातों से अलग उन सकारात्मक बदलावों की ओर ध्यान खींचना चाहूँगीं जो धीमें-धीमें ही सही परन्तु बहुत ही मजबूती के साथ इस युवा समाज में अपनी जगह बना रहे है। मैं उस जागरूकता की ओर ध्यान खींचना चाहूंगी जो इस युवा पीढ़ी को स्वतः ही भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन बनाने में मदद कर रही है।
वर्क-लाइफ बैलेंस एक ऐसा उभरता हुआ मंत्र है जो युवाओं को अपने परिवार और काम के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। धार्मिक गुरूओं से परे आज बड़े शहरों में आध्यात्मिक गुरूओं की भरमार है जो युवाओं की भौतिक जिन्दगी में आध्यात्म के नियमों का महत्व समझा रहे हैं। युवाओं का इन गुरूओं के प्रति झुकाव स्वयं में ही उनकी आध्यात्मिक जागरूकता का प्रमाण हैं। योग के विभिन्न प्रकारों को मानो पिछले कुछ वर्षों में नया जन्म मिला है। योग की इस धूम में युवाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ढेरों पुरातन प्रणालियों को नूतन जन्म मिला है। पिछले कई वर्षों से योगासन, प्राणायम जैसी अनेक विधियाँ जो आम जनजीवन से खो गयी थी, उन्होंने वापस आम जनमानस के जीवन में जगह बना ली है।
मूल में बात यह है कि युवा अध्यात्म से उतना भी दूर नहीं है जितना कि आलोचक अक्सर बताते हैं। बल्कि यदि सूक्ष्मता से विचार किया जाये तो देश के आध्यात्मिक पुर्नजागरण में युवाओं का बहुत बड़ा योगदान है। यह योगदान दिखने में छोटा भले ही हो परन्तु इसका भविष्य बहुत ही मजबूत है। युवा भारत के आध्यात्मिक नेतृत्व के लिए न केवल तत्पर हैं बल्कि तैयार भी हैं।