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आरक्षण की राजनीति कब तक
August 5, 2019 • राजीव प्रताप सिंह सहायक संपादक

जब भी देश में चुनाव आता है देश में आरक्षण के पक्ष में और विरोध में बहस होने लगती है। आखिर देश में आरक्षण की समीक्षा के नाम से राजनीतिक दल घबराती क्यों हैं? क्या आरक्षण समर्थकों के लिए आराक्षण सिर्फ वोट बैंक है? अथवा वाकई वे इसको लेकर संवेदनशील हैं? आरक्षण समर्थकों का मानना है कि आरक्षण की समीक्षा आरक्षण को समाप्त करने की साजिष की शुरूवात है। जबकि सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम कोई कार्य करते है तो उसका मूल्यांकन एवं समीक्षा जरूर करते हैं। फिर आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मुद्दे की समीक्षा एवं मूज्यांकन नहीं होना भी इसकी विश्वसनीयता पर संदेह को दर्शाता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण की समीक्षा के संबन्ध में दिया गया बयान ऐसा सियासी तूफान खड़ा कर दिया कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी का हारना भी इससे जोड़कर देखा जाने लगा। आनन-फानन में भारतीय जनता पार्टी नेताओं का अलग-अलग बयान आने लगा और वे दिखाने का प्रयास करने लगी कि आरक्षण के समर्थन के हम ही सबसे बड़े हितैषी हैं। राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने तो आरक्षण के समर्थन में बकायदा मोर्चा संभाल लिया कि और बयान देने लगे कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक आरक्षण को समाप्त करना चाहती है। कोई भी राजनीतिक दल अपने आप को इससे अछूता नहीं रख सका। इसके उलट आरक्षण के विरोधी खेमा है, उनका मानना है, आरक्षण आर्थिक एवं सामजिक विसंगति को दूर करने के लिए ठोस कदम है, तो आरक्षण के वजह किसी प्रतिस्पर्धा एवं नौकरी से बाहर होना यह मानवता के खिलाफ है।
 किसी भी पद के चयन का आधार योग्यता होना चाहिए न कि जाति आरक्षण से सफलता तो मिल सकती है लेकिन योग्यता नहीं, जबकि देश ओर समाज को योग्य लोगों की आवश्यकता है। आरक्षण के वजह से जो युवा किसी प्रतिस्पर्धा या नौकरी से वंचित रह जाते है उनका अपराध क्या है? सिर्फ जाति? सिर्फ आरक्षण के वजह से बाहर होने वालों के लिए भी एक आयोग होना चाहिए और उनके लिए भी योग्यता के अनुसार ही रोजगार की गारन्टी सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए। अब तो गरीब सवर्णो को भी 10 प्रतिशत का आरक्षण मिलने लगा लेकिन सवाल वहीं का वहीं है, क्या प्रतिभा की कीमत सिर्फ जाति के आधार पर तय किया जा सकता है, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सेवाओं में सिर्फ अनुकम्पा की वजह से प्रतिभा की कीमत पर स्थान देना कहीं से भी सही नहीं है, न ही मानवता न ही राष्ट्र हित में।   
 आरक्षण की समीक्षा करने वालों का एक वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि हम आरक्षण के समर्थक है, लेकिन यह जरूरी है आरक्षण के कोटे के अन्र्तगत आने वाली सभी जातियों के लिए भी एक निश्चित कोटा होना चाहिए ताकि आरक्षण का लाभ जिस उद्देश्य से संविधान निर्माताओं ने दिया है, उसका सही सदुपयोग हो सके। हरियाणा में जाट एवं गुजरात में पाटीदार आन्दोलन का होना एक बार फिर देश को काफी चोट दे दिया इसलिए सरकार एवं सभी राजनीतिक दलों को इस देश हित एवं मानवता के मुद्दे पर एक राय होकर देश के युवाओं को अपना सिर्फ वोट बैंक न समझते हुए ठोस कारगर कदम उठाने चाहिए।