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उल्लू की मनहूस आवाज
July 22, 2019 • - अनीता परिहार

यह अचम्भित, हैरत-अंगेज, सनसनीखेज और खौफनाक घटना जलंधर में सन् 2001 में घटी। डेराबाबा गांव में बलवंत सिंह नाम के रिटायर्ड सूबेदार रहते थे। 1965 की भारत-पाक जंग के दौरान वे अपनी एक आँख खो बैठे थे। रिटायरमेंट के बाद वे अपने तीनों लड़कों बड़े सुरजीत, मझंले करतार व छोटे गुरमीत के साथ अपनी 12 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर खेती-बाड़ी करते थे। कोई कमी नहीं थी। सब कुछ मजे में चल रहा था कि अचानक वे गृह कलह के शिकार हो गये। छोटा लड़का गुरमीत जो शहर में रहकर पढ़ाई कर रहा था। उसने जलंधर में अपना कारोबर करने के लिये बलबंत से पैसा मांगा। गुरमीत को उसके पिता व दोनों भाइयों और भाभियों ने बहुत समझाया कि हम लोग किसान हैं। सब मिलजुल कर खेती-बाड़ी करें और चैन से गुजर-बसर करें। लेकिन जब गुरमीत किसी तरह नहीं माना तो बलबंत ने गांव में पंचायत बुलाकर सबके सामने अपनी 12 एकड़ जमीन चार हिस्सों में बांट दी। तीन हिस्से तीन लड़कों को दिये व एक हिस्सा अपने पास रखा। गुरमीत ने अपने हिस्से की जमीन बेच डाली और 1982 में जलंधर से 17 किलोमीटर जुड़े कस्बे में खाद-बीज की दुकान खोली। किस्मत मेहरबान हुयी और कारोबार अच्छा चल निकला। इसी बीच उसने एक मकान भी खरीद लिया। फरवरी 1984 में उसने शहर की एक लड़की अमनदीप कौर से शादी कर ली और जिससे दो बेटे हुये। सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक 1988 में बलबंत की दिल के दौरे से मौत हो गई। अन्त्येष्टि के बाद गुरमीत ने अपने भाइयों से पिता के हिस्से की जमीन व पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा मांगा तो भाइयों ने उसे कुछ भी देने से मना कर दिया। बात पंचायत तक पहुंच गई जब वहाँ कोई नतीजा नहीं निकला तो गुरमीत ने अपने भाइयों के खिलाफ अदालत में बंटवारे का मुकदमा कर दिया। जिससे उसकी भाईयों से दुश्मनी पैदा हो गई। मुकदमा लम्बा खिंच गया। 10-12 साल गुजर गये। इसी दौरान गुरमीत  की एक बुआ जो गाजियाबाद में रहती थी, उनकी बेटी सिमरन की दिसम्बर महीने में शादी पड़ी जिसमें बुआ ने तीनों भाईयों को बुलाया जिसमें तीनों भाई दुश्मनी भूलाकर शादी में शामिल हुये। शादी कार्यक्रमों के दौरान कई दिनों तक साथ खाना-पीना, षराब का दौर चलता रहा। शादी के बाद सब भाई अपने-अपने घर चले गये। गाजियाबाद से लौटने के करीब दो हफ्ते बाद एक रात गुरमीत ने आठ बजे अपनी दुकान बंद की, फिर कुछ दोस्तों के साथ शराब पी। जब रात को कार से घर लौट रहा था। उस समय रात के करीब 11 बज रहे थे। सड़क के दोनों ओर घने पेड़ लगे थे। हाइवे पर वैसे भी स्ट्रीट लाइट नहीं होती है। सड़क पर घना अंधेरा और कोहरा फैला हुआ था। अचानक गुरमीत को सड़क के किनारे दो काली मानव आकृतियाँ खड़ी दिखाई दी, जो उसे कार रोकने का ईसारा कर रही थी। गुरमीत ने कार रोककर देखा तो दो बेहद सुन्दर औरतें थीं। जिन्होंने सर से पांव तक काले कपड़ें पहनें रखें थी। उन्होंने उससे शहर तक के लिये लिफ्ट मांगी, ना जाने क्या सोचकर उसने उन्हें लिफ्ट दे दी। वे दोनों कार की पिछली सीट पर बैठ गयीं। गुरमीत कार चलाता रहा वे औरतें धीमें स्वर में बातें कर रहीं थीं। कुछ देर बाद उसने महसूस किया कि उनकी आवाजें आनी बंद हो गई है, ना जाने क्या सोचकर उसने विंड स्क्रीन पर निगाह डाली तो वह देखकर बुरी तरह घबरा गया पिछली सीट पर एक भयानक उल्लू बैठा उसे घूर रहा था। फिर उसने कार रोक कर पिछली सीट पर नजर डाली तो जो उसने देखा उसे देखकर उसे अपनी सांसे बंद होती महसूस हुयीं। पिछली सीट पर कोई नहीं था। ना उल्लू ना औरतें ना उनका नामों-निशान। चलती कार से वे कैसे गायब हो गयी। यह सब सोंचकर उसे भय का दौरा पड़ गया। उसके दिल की धड़कनें बेकाबू हो गई, शरीर कांपने लगा मन किया कि वहाँ से भाग जाये या उसे कोई बचा ले किन्तु दूर-दूर तक सड़क पर सन्नाटा फैला हुआ था। कुछ देर बाद वह सामान्य हुआ तो उसने फिर कार स्टार्ट की शहर में दाखिल होने वाला था कि अचानक उसने देखा कि कार के बोनेट पर ठीक उसके सामने एक भयानक उल्लू बैठा हुआ है। वह भय से चीखा बचाओ उसने तेजी से ब्रेक मारी और कार रुक गयी। उसने देखा बोनेट पर कोई नही था, वह वहीं बेहोश हो गया। जब उसे होश आया तो उसने खुद को अपने घर के बेड पर पाया। पता चला कि एक ट्रक ड्राइवर ने सड़क के किनारे खड़ी उसकी कार और उसमें बेहोश उसे देखा तो उसने इसकी सूचना अगले चैराहे पर खड़े गश्ती पुलिस के दरोगा को दी। दरोगा गुरमीत को अच्छी तरह पहचानता था। उसने गुरमीत को कार सहित घर पहंुचा दिया। घर मंे सबने गुरमीत की आप बीती को नषे में हुआ भ्रम बताया और नशा नहीं करने की सलाह दी। उस दिन गुरमीत ने दुकान नहीं खोली। अब गुरमीत अक्सर सोते समय एक भयानक सपना देखने लगा। वह एक अंधेरी रात में सूनसान सड़क पर अकेला चला जा रहा है और अचानक एक उल्लू उसके सर पर आकर बैठ जाता जाता है, वह डरावनी कर्कश आवाज मे चीख रहा है। गुरमीत घबरा कर बुरी तरह चीखता हुआ वापस भाग रहा है, तो उसे सड़क के किनारे लगे हर पेड़ पर उल्लू बैठा नजर आ रहा है और वह चीखता हुआ नींद से जाग जाता था। एक रात वह पेशाब करने बाथरूम गया तो उसने फर्श पर एक उल्लू को बैठा देखा, वह चीखकर बेहोश हो गया। सारा घर उसकी चीख पर उठ गया। कुछ देर मे वह सामान्य हो गया। इन अजीबो-गरीब हादसों का असर उसके स्वास्थ्य के साथ-साथ उसकी दुकान पर भी पड़ने लगा। उसे रात-दिन हर जगह उल्लू नजर आते थे और किसी को कुछ नजर नही आता था। अब वह अकेले में रहने पर घबराता था। डाक्टरों ने उसे वहम का रोगी घोषित कर दिया। घर वालों ने पण्ड़ित, मुल्ला, ओझा और सयानों का ईलाज करवाया लेकिन रत्ती भर भी फायदा नही हुआ। धीरे-धीरे उसका चेहरा हाव-भाव और आंखे उल्लू की तरह हो गई। कभी-कभी वह रात में उल्लू की तरह भयानक आवाज में चीखने लगता था। जिससे घर के सदस्य बुरी तरह डर जाते थे। अंततः अप्रैल 2001 में बड़ी दयनीय हालत में उसकी मौत हो गई। उसकी अन्त्येष्टि में सभी भाई आये। गुरमीत की कहानी एक तरह से खत्म हो गई, परन्तु एक दूसरे तरह से शुरू हुयी। उसका घर उजड़ गया, बीबी बच्चे भूखों मरने लगे। अमनदीप के घरवालों ने उसे व उसके बच्चों को सहारा दिया। अमनदीप गुरुमीत की रहस्यमय मौत के कारणों, अदृश्य सच्चाई और अनदेखी वास्तविकताओं को तलाश में भटक रही थी। वह जानना चाहती थी कि वास्तव में उसके पति को क्या हुआ था, इसका जवाब मिला उसे फरवरी 2002 में कुरूक्षेत्र हरियाणा के रहने वाले अघोरी साधक भैरवनाथ से। जहाँ उसे अमनदीप की एक दूर के रिश्ते की बहन ले गयी थी। भैरवनाथ अमनदीप की बात सुनकर उसकी मदद करने को तैयार हो गया था। उसने अगली अमावस्या की रात 10 बजे अपनी झोपड़ी में बुलाया। यह सन् 2003 की फाल्गुन अमावस्या की रात थी। दोनों बहने उस रात उसकी झोपड़ी में पहंुची। उसकी झोपड़ी आबादी से दूर शमशान के पास बनीं थी। अघोरी ने वहां पूजा का सारा सामान सजा रखा था, ताक में दिया जल रहा था, नीचे गोबर से लिपी कच्ची जमीन थी, सामने अघोरी मृगचर्म के आसन पर दक्षिणमुखी होकर बैठा था। सामने जमीन पर हल्दी चूने से चैक पूरी गई थी। उसके चारों कोने में मट्टी के दियों में सरसों के तेल के दीपक जल रहे थे। चैक के बीच में भात के ढेर में नारियल के आधे खोखे में कड़वे तेल का चैमुखी दिया जल रहा था। चैक के नीचे आटे से किसी देवी की आकृति बनी थी। अघोरी ने अपने बांयी ओर आटे का एक बड़ा गोला बना रखा था और दाँयी ओर उसने बिनवा कण्डों व आम की सूखी लकड़ियों का एक हवनकुण्ड बना रखा हुआ था, पास में एक पीतल की थाली में सेंदुर, लौंग, बताशे, कच्ची शराब का पउआ, गुलहड़ के फूल व पीली सरसों के दाने रखे थे। अघोरी ने अमनदीप को आटे के गोले में बैठाया और फिर वह खड़े होकर मंत्र पढ़कर चारों ओर पीली सरसों के दाने फेंकते हुये दिशा बाँधने लगा। फिर उसने देवी का सेंदुर बताशे रोली गुलहड़ के फूल, लौंग व थोड़ी शराब डालकर पूजन किया। बीच में रखे चैमुखी दिये और चारों कोने में रखे चारों दियों का भी उसी तरह पूजन किया। फिर आँख मँूदकर अस्पष्ट शब्दों में साबरी मंत्रों का झूम-झूमकर जाप करने लगा अचानक वह झूमने लगा और उस पर कर्णपिशाचनी आ गई। कुछ देर बाद अघोरी सामान्य हो गया। अघोरी ने उसे बताया कि तुम्हारे पति पर भयानक जादू-टोना किया गया था। जिसका तोड असंभव था। वो कैसे हुआ किसने करवाया? इसके लिये मैं तुम्हारे पति की आत्मा को बुला रहा हूँ। जो खुद बतायेगा कि उसके साथ क्या हुआ था और कैसे हुआ। अघोरी ने षराब डालकर हवनकुण्ड़ में अग्नि प्रज्ज्वलित की फिर साबरी मंत्रों से अग्नि में शराब से भीगे गुलहड़ के फूलों की आहुति डालने लगा। झोपड़ी में पीला घना धुँआ फैलने लगा। झोपड़ी के भीतर का वातावरण बेहद ठण्डा हो गया, तभी अमनदीप ने देखा कि हवनकुण्ड़ के ऊपर का धुँआ एक मानव आकृति धारण कर रहा है। अमनदीप ने उसे पहचान लिया, वह गुरमीत था। अमनदीप यह देखकर सुन्न सी हो गई। धुँये की आकृति जब स्पष्ट हुयी तो सामने उसका पति खड़ा था। अधोरी के ईशारे पर अमनदीप ने पूछा आपके साथ क्या हुआ था, जब तक मैं जान नही लँूगी यूँ ही तड़पती रहूँगी। गुरमीत ने धीमी पर स्पष्ट आवाज मानो किसी सुरंग से आ रही हो में बताया मेरे साथ धोखा हुआ था, मेरे भाईयों ने साजिश करके मुझे मार डाला था। जब मैं बुआ की लड़की की शादी में गाजियाबाद गया था, तो मेरे भाईयों ने धोखे से बकरे के मांस में बलि दिये उल्लू का अभिमंत्रित मांस मिलाकर मुझे खिला दिया। इसके लिये उन्होंने एक मुस्लिम तांत्रिक से उल्लू का मांस लिया था, तांत्रिक ने दस हजार रुपया लिये और एक दुष्ट प्रेत का उल्लू में आह््वान किया और उल्लू में मंत्रो से प्रेत को प्रविष्ट कराकर उसकी बलि देकर उल्लू का मांस मेरे भाईयों को दे दिया। वाहे गुरू उनको उनके किये की सजा देगा। अमनदीप फूट-फूटकर रोने लगी। पति की आकृति फिर से घुलकर  धुँआ बन गई। कुदरत ने उसके भाईयों से भयानक बदला लिया। दोनों भाईयों का घर जल्दी ही उजड़ गया। ना जाने कहाँ से उनके घर की छत पर रात में एक उल्लू आकर मनहूस आवाज में बोलने लगा, उसी दिन से दोनों भाईयों के बुरे दिन आ गये। सुरजीत को लकवा मार गया वह चारपाई पर सड़-सड़कर मरा। करतार नशे की लत का शिकार होकर सारी सम्पत्ति गंवाकर पागल होकर एक दिन मर गया।
रहस्य-रोमांच की इस कहानी के स्थान व पात्र पूर्ण काल्पनिक