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कौन थी वो
July 9, 2019 • परिहार दम्पती (रहस्य-रोमांच कहानी)

मैं कुंवर देवेन्द्र सिंह तब 25 वर्ष का सुदर्शन युवक था! पिछले साल ही मेरी नियुक्ति कानपुर में सरकारी इंजीनियर के पद पर हुयी थी, मेरे पिता सुरेन्द्र सिंह सोलंकी सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी थे जो रिटायर्ड होने के बाद शाहजहांपुर में अपने पुश्तैनी गाँव नारायनपुर में बस गये थे, खाते-पीते घर का इकलौता लड़का होने के कारण छात्र जीवन से ही मेरे लिये अच्छे घरों से रिश्ते आने लगे थे, जिन्हें मैं अब तक किसी तरह टालता रहा था, दो महीने पहले मुझे पिताजी का खत मिला था, जिसमे उनके एक पुराने मित्र की कन्या के विवाह प्रस्ताव का जिक्र था कि लड़की व घर-बार हमारा देखा समझा है। लड़की सुन्दर, सुशील, शिक्षित और हर तरह से तुम्हारे योग्य है। वक्त मिले तो आकर लड़की देख लेना तुम्हारी उम्र भी बढ़ती जा रही है। मैं गोरा लंबा तगड़ा लेकिन शर्मीला युवक था, जब मैं 1965 मे लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. कर रहा था तो मुझे मेरी क्लास की एक स्टूडेंट साधना बहुत पंसद थी, वो भी ठाकुर थी उसके हाव-भाव और मुझे देखने के अंदाज से लगता था कि वह भी मन ही मन मुझे पसंद करती थी, लेकिन वह जमाना ही कुछ और था हम कभी खुलकर बात भी नही कर सके थे हाँ एक दो बार लाईब्रेरी मे जरूर हमारी बात हुयी थी उसका मनमोहक सौन्दर्य, मधुर आवाज, शर्मीली मुस्कराहट, चंचल अदायें मेरे दिल की गहराइयों मे बस गई थी उसे देखकर मेरे मन अनयास ही गुनगुनाने लगता था।
दुबली पतली चलने मे बलखाती,
लिये आंखो मे मस्ती बहुत शरमाती।
कालेज की छात्रा साथ मेरे पढती,
बतियाना जुर्म था आंखों से छनती।
मझे मालूम नही उसे कैसा लगता था,
अंदर मेरे तो हड़कम्प मचा रखा था।।
मेरे एक दोस्त जिसकी बहन साधना की सहेली थी, उसने मुझे बताया था कि वह लखीमपुर की रहने वाली थी यहाँ अपने मामा के घर रह कर पढ़ती थी फिर मेरा आई.आई.टी. कानपुर मे सेलेक्शन हो गया वह भी पढ़ाई पूरी करके वापस चली गई हम दोनांे अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गये इसी बीच मुझे अपने बचपन के सहपाठी व पड़ोसी सतीश गुप्ता की शादी का कार्ड मिला वह इण्टर तक मेरे साथ पढा था, उसकी शादी 21 नवम्बर को थी। मैं अपने अर्दली श्याम मनोहर के साथ 17 तारीख की शाम अपनी फियेट कार से कानपुर से रवाना हुआ, मजे की सर्दी पड़ रही थी उन्नाव पहँुचते-पहँुचते शाम गहरी रात मे तब्दील हो चुकी थी चारों और घना अंधेरा व सन्नाटा फैला हुआ था किनारे स्थित घने जंगल ने माहौल और डरावना बना दिया था दूर-दूर तक कोई नजर नही आ रहा था कभी-कभी कोई ट्रक या वाहन निकल जाता था तभी हेडलाइट की रोशनी मे हमे कुछ दूर कोई सफेद सी चीज सड़क पर पड़ी दिखाई दी मजबूरन कार रोकनी पड़ी पास जाकर देखने पर पता चला कि वह किसी बेहद खूबसूरत नवयुवती की लाश थी, जिसने सफेद रेशमी साड़ी ब्लाउज और कीमती जेवर पहन रखे थे उसके सर पर गहरी चोट लगी थी जिससे खून बह कर बांये गाल पर जम गया था लाश की अधखुली आँखे शून्य मे किसी को तलाश रही थी। लगता था कि किसी लारी ने उसे टक्कर मार दी थी श्याम किशोर ने फुसफुसा कर कहा, साहब यहाँ से निकल चलिए वरना हम लोेग बेवजह किसी कानूनी झमेले मे फंस जायेगें मैंने वापस जाकर कार स्टार्ट की किन्तु यह देखकर मेरी आखें फटी रह गई कि सड़क पर ना कोई लाश थी, ना ही दूर-दूर तक कोई नजर आ रहा था, मारे भय के मेरे हाथ पैर कांपने लगे बदन मे गर्मी फैल गई हल्का पसीना निकलने लगा तभी मेरी निगाह श्याम पर पड़ी जो सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था फुसफसा कर बोला साहब यह कोई प्रेत लीला है तुरन्त यहाँ से भाग लीजिए तभी किसी युवती की दर्द भरी चीख सुनाई दी जिसे सुनकर मारे भय के खून जमता सा महसूस हुआ आस-पास कोई नजर नही आ रहा था, मैंने बदहवासी मे कार स्टार्ट की और पागलों की तरह कार दौड़ा दी करीब एक घ्ंाटे मे हम लखनऊ पहुँचे वहाँ हम कुछ सामान्य हुये, हम चारबाग मे खाना खाकर चल दिये अगले दिन सुबह 8 बजे हम लोग शाहजहांपुर पहुंचे। हमे आया देखकर घर मे सब बड़े प्रसन्न हुये शाम को मैं अपने दोस्त से मिलने गया वह शिकायत करते हुये बोला अब फुरसत मिली है। पहले आ जाता तो कुछ बिगड़ जाता फिर इधर-उधर की ढेर सारी नई पुरानी बाते हुयीं तीसरे दिन बरात सुंदरपुर जानी थी दो दिन कैसे बीत गये कुछ पता ही नही चला शादी मे सतीश की जिद पर मुझे भी फेरों के समय मंडप पर रहना पड़ा। जब दुल्हन की बहनें और सहेलियाँ उसे मंडप मे ला रही थी तो दुल्हन के पीछे आ रही एक लड़की को देखकर मैं बुरी तरह चैंक गया, लड़की हूबहू वही थी जिसकी लाश मैंने कानपुर-उन्नाव हाईवे पर देखी थी, लेकिन यह कैसे संभव है। उसने वही सफेद रेशमी साड़ी, ब्लाउज और कीमती गहने पहने थे जो लाश के शरीर पर थे मैं उसे देखकर बदहवास सा हो गया मारे भय और खौफ के मेरी बोलती बंद हो गई मुझे चक्कर से आने लगे तभी कुछ लड़कियाँ हम लोगों के लिये चाय-नाश्ता ले आई तभी वही लड़की टेª मे मिठाई लेकर आई और सबको पेश करने लगी मेरे पास भी आई और अत्यन्त मधुर स्वर मे बोली कुछ लीजिये ना मारे दहशत के मेरी जबान पर ताला पड़ गया मैं उसे एकटक देखे जा रहा था मैंने बिना सोचे एक रसगुल्ला उठाकर खा लिया तभी पीछे से किसी ने आवाज लगाई पूनम इधर आओं! तुम्हें संुदर चाचा बुला रहें है। वह लड़की पायल छनकाती चली गई फेरे समाप्त तो गये मैं गुमसुम सा हो गया दूसरे दिन बरात वापस आ गई लेकिन मेरा मन कहीं नही लग रहा था एक अजीब सी अंजाने भय मिश्रित निराशा, उदासी, बेचैनी मेरे दिमाग पर छाई हुयी थी मेरा खाना-पीना नींद सब उड़ गई। घरवालों दोस्तों सब ने खूब पूछा क्या बात है। लेकिन मैं सबको तबीयत ठीक ना होने का बहाना बनाकर टाल गया तीसरे दिन सतीश के पिता के बुलाने पर मैं उसके घर गया मैंने अकेले में उन्हें सारी बात बताई तो वह भी हैरत मे पड़ गये, अगले दिन चैथी थी, सतीश अपनी दुल्हन को विदा कराने ससुराल गया तो मुझे भी साथ ले गया जब मैंने सतीश के ससुर को सारी बात बताकर पूनम के बारे मे जानकारी मांगी तो सब चैंक गये सबने एक स्वर मे कहा कि ना हमारे खानदान मे, ना पास पडो़स मे, ना परिचितों मे पूनम नाम की कोई लड़की है, ना आपके बताये हुलिया की कोई लड़की हैरत की बात तो तब हुयी जब घर की औरतों ने बताया कि शादी के दिन सफेद रेशमी साड़ी ब्लाउज पहन कर कोई लड़की नही आई थी लोगों ने कहा लगता है या तो आप किसी गहरे तनाव मे है या आपको वहम् हुआ। वहाँ से लौटने के कुछ दिन बाद मैं श्याम किशोर के साथ पिताजी के मित्र ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह की बेटी को देखने कार से लखीमपुर को रवाना हुआ। अभी हम लखीमपुर की सीमा मे घुसे ही थे कि हाईवे पर अचानक कार घरघरा कर बंद हो गई आप-पास कोई गैराज नही था एक ट्रक वाले ने सारी बात जानकर कार को ट्रक के पीछे बंाधकर हमें एक गैराज तक पहुँचा दिया लेकिन गैरेज का मैकेनिक काम से कहीं गया था मजबूरन हमे वहाँ रूकना पड़ा मैकेनिक करीब दो घंटे बाद लौटा कार ठीक होते-होते शाम हो गई, आगे बढ़ने पर हमे हाइवे से दांयी ओर एक रास्ता कटता नजर आया जिसके किनारे लगे एक जंग खाये बोर्ड पर लिखा था लखीमपुर 45 किलोमीटर जब कि नेशनल हाइवे से लखीमपुर 80 किलोमीटर दूर था, जल्दी पहुंचने की धुन में मैंने गाड़ी उसी रास्ते पर दौड़ा दी रास्ता काफी सुनसान और वीरान था दोनों और धने पेड़ थे कहीं-कहीं सूखे खेत नजर आ रहे थे हमे इस रास्ते पर चले हुये एक घंटा हो चुका था धना अंधेरा फैल चुका था तभी श्याम ने कहा साहब लगता है कि हम लोग गलत रास्ते पर आ गये है यह कोई आम रास्ता नही है देखिये सड़क पर घास उग आई है बात सौ फीसदी सच थी घास उगने का मतलब था कि इस रास्ते पर कोई आता-जाता नही था यह देखकर मुझे बड़ी घबराहट हुयी तभी मुझे नजर दांयी ओर एक रोशनी दिखाई दी मुझे लगा कि शायद वहाँ कोई आदमी या बस्ती हो लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे तो हमे एक डरावना दृश्य दिखाई दिया वह रोशनी एक चिराग की थी, जो एक बेहद पुरानी समाधि की ताक मे जल रहा था, इस वीरान ईलाके मे समाधि का वह जलता दिया बड़ा डरावना लग रहा था वहाँ कुछ आगे बढने पर हमे दांयी ओर कुछ दूर पर बड़ी भारी रोशनी के साथ काफी भीड़ दिखाई दी जानकारी लेने के मकसद से मैंने गाड़ी उधर मोड़ दी। नजदीक जाने पर पता चला कि वहाँ किसी की शादी हो रही है। खूब रोशनी थी, बड़ा सा पंडाल लगा था, दो ढाई सौ आदमी मौजूद थे, हलवाई पुरी, पकवान, मिठाईयाँ बना रहे थे कुछ लोग पंगत में खाना परोस रहे थे कुछ खा रहे थे थोड़ी दूर पर एक गाँव दिख रहा था तथा बांयी ओर एक बड़ा सा तालाब था मैंने एक आदमी से रास्ते के बारे मे पूछा तो वह मुझे एक संभ्रान्त वृद्ध के पास ले गया उसने बताया दो मील आगे एक लकड़ी का डिपो है उससे कुछ हाथ आगे बांयी ओर एक सड़क मुड़ती है। जो सीधी लखीमपुर को जाती है। फिर वह हाथ जोड़ कर बोला आज मेरी बेटी की शादी है! आप लोग मेरे मेहमान है। मेहरबानी करके आप लोग भोजन करके ही जाइयेगा हमें भी भूख लगी थी फिर उसकी बात को मैं मना नही कर सका फिर वह हमे पंगत में ले गया हमने भरपेट भोजन किया जो बेहद लजीज था भोजन करने के बाद मैंने उसी वृद्ध से कहा आपकी बेटी मेरी बहन है। मंै अपनी बहन को कुछ नेग देकर पैर पूजना चाहता हूँ वह मेरी बात सुनकर मुझे अपने साथ गाँव के एक पुराने से मकान पर ले गया खुद अंदर गया कुछ देर बाद वह कुछ महिलाआंे के साथ सजी धजी दुल्हन को ले आया मैंने 101 रूपया हाथ मे लेकर दुल्हन के पैर छुये फिर उसके हाथ मे रूपये देकर कहा सदा सुहागन रहो बहन तभी हवा के तेज झोंकें से उसका घूंघट हट गया दुल्हन का चेहरा देखकर मैं भय से बदहवास हो गया क्योकि दुल्हन वही थी जिसकी लाश मैंने कानपुर-उन्नाव हाईवे पर देखी थी, लेकिन यह कैसे संभव है। उसने वही सफेद रेशमी साड़ी, ब्लाउज और कीमती गहने पहने थे जो लाश के शरीर पर थे मैंने घबरा कर चारों ओर देखा तो पाया वहां का गाँव उसका पिता, घर की औरते सब गायब है। मैं एक टीले पर खड़ा था चारों और घने अंधकार मे डूबा वीरान मैदान नजर आ रहा था, मैं बेहोश हो गया, जब होश आया तो देखा सुबह हो चुकी है। एक आदमी मुझे झझकोर कर जगा रहा था, जगने पर मैंने पाया कि मैं एक टीलेनुमा शमशान पर पड़ा हूँ, चारांे ओर पास बंजर खेत हैं। बांयी ओर एक तालाब है। मेरे कुछ ही दूर श्याम किशोर बेहोश पड़ा था, जिसे मैं होश मे लाया वही भी आँख मलता हुआ उठा और बोला रात खाना खाते ही गहरी नींद आ गई थी वह भी शमशान देखकर घबरा गया उस आदमी ने बताया कि वह डिपों में मजदूर है काम पर जा रहा था तो आप लोगों को यहाँ सोता हुये देखकर इधर चला आया मैंने उसे रात की सारी कहानी बताई तो वह बोला बाबूजी रात की बरात, बराती दुल्हन सब प्रेतलीला है। किस्मत से आपकी जान बच गई रात की बाते सोच की मारे भय के मेरा दिमाग सुन्न हो गया किसी तरह हम सब वहाँ से चल दिये, आगे कुछ ही दूरी पर लकड़ी का बड़ा सा गोदाम था जहाँ लगी आरा मशीन से पटरे चीरे जा रहे थे कुछ लकड़हारे मोटे तनों को चीरने मे लगे थे उन्हे देखकर मेरा भय कुछ दूर हुआ, मेरी आपबीती सुनकर वे भी चकित रह गये एक बूढे़ मजदूर ने बताया जिस जगह आप बता रहे है। उससे कुछ दूर पर आज से पचास-साठ साल पहले एक गाँव हुआ करता था जिसके मुर्दे तालाब के किनारे वाले टीले पर जलाये जाते थे वह जगह भुतहा है। उधर रात तो क्या दिन मे भी कोई नही जाता है। गोदाम के बगल से एक सड़क लखीमपुर हाइवे को गई थी पहले लखीमपुर जाने के लिये सिर्फ यही सड़क थी लेकिन जब से सरकार ने नया हाईवे बना दिया तब से इस सड़क पर केवल लदाई के ट्रक ही आते-जाते हैं। अगली सुबह एक ट्रक लखीमपुर जा रहा था उसी के साथ हम लोग लखीमपुर पहुँच गये वहाँ चैक के सदर बाजार के पास गोविंद नगर में पिताजी के मित्र सूर्य प्रताप सिंह से मिला उन्हें मेरे आने की पहले से ही सूचना मिल गई थी उन्होंने गर्मजोशी के साथ मेरा शानदार स्वागत किया खाना-पीना और बड़ी देर तक इधर-उधर की बाते की, आज रात यही आराम करो बेटी इसी शहर मे अपने नाना के यहाँ अपनी ममेरी बहन की शादी मे गई है कल तक आ जायेगी हमे मेहमानखाने मे ठहरा दिया गया जिसकी खिड़की से मकान के बगीचे का शानदार नजारा नजर आता था आधी रात के बाद अचानक मेरी नींद खुल गई मुझे लगा कि कमरे मे कोई है। मैंने अंधेरे मे चारों ओर देखा कोई नही दिखा तभी चरचराहट की धीमी आवाज के साथ कमरे की खिड़की खुल गई खिड़की के पास सफेद साया नजर अया गौर से देखने पर मेरे होश फाख्ता हो गये लड़की हूबहू वही थी जिसकी लाश मैंने कानपुर-उन्नाव हाईवे पर देखी थी उसने वही सफेद रेशमी साड़ी, ब्लाउज और कीमती गहने पहने थे जो लाश के शरीर पर थे मैं उसे देखकर बदहवास सा हो गया मारे भय और खौफ के मेरी बोलती बंद हो गई मुझे चक्कर से आने लगे, मैं तेज आवाज मंे चीखा मेरी चीख सुनकर ठाकुर साहब और घर के नौकर चाकर सब आ गये मैंने उन्हें शुरू से लेकर आखिर तक उन्हें सारा किस्सा बताया जिसे सुनकर वह काफी गम्भीर हो गये, फिर वे कुछ सोचकर अंदर से एक तस्वीर लेकर आये जिसे देखकर मैं चैंक गया मैं बेतहाशा चिल्ला उठा यही है। चाचाजी यही है! मैंने देखा ठाकुर साहब का चेहरा आंसुओं मे डूब गया उन्होंने रूंधे स्वर मे बताया यह तस्वीर मेरी बड़ी बेटी पूनम की है। उसे शादी करने का बेहद शौक था मैंने बड़े अरमानों से तीन साल पहले उसकी शादी हरगांव के शुगर मिल के इंजीनियर सुनील के साथ तय की थी वह भी बहुत खुश थी, एक रात वह अपनी सहेली की शादी से लौट रही थी उसने सफेद रेशमी साड़ी, ब्लाउज और कीमती गहने पहने थे कि अचानक एक बेकाबू ट्रक ने उसे टक्कर मार दी और मौके पर ही उसकी मौत हो गई तब से रूह भटक रही हैं। कई लोग उसकी कहानी लेकर मेरे पास आये पर वह मुझे कभी नही मिली। दोपहर को ठाकुर साहब की पत्नी और बेटी वापस आ गये शाम को लड़की दिखाई की रस्म हुयी लड़की को देखकर मैं हर्ष मिश्रित आश्चर्यचकित रह गया, लड़की की भी वही हालत थी लड़की कोई और नही मेरी बी.एस.सी. की क्लासफैलो साधना थी जिसे मैं कालेज के दिनों से ही चाहता था वह भी दिल ही दिल मे मुझे बेहद पसंद करती थी मैंने तुरन्त शादी की मंजूरी दे दी।
उन्ही दिनों मुझे पता चला कि हरगांव के जिस इंजीनियर सुनील के साथ पूनम की शादी तय हुयी थी उसकी भी दो साल पहले एक रात सड़क दुर्घटना मे रहस्यमय मृत्यु हो गई उसकी मौत और पूनम की मौत मे जबरदस्त समानता थी यह तो नही पता कि यह महज संयोग था या कुछ और सुनील की मौत भी एक साल बाद ठीक उसी जगह, उसी तारीख को, उतने ही बजे सड़क पर हुयी थी, वह भी किसी शादी से वापस लौट रहा था, अचानक एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी टक्कर इतनी भीषण थी कि सुनील की मौके पर ही मौत हो गई थी। एक दिन मैंने अपने दोस्त सतीश से इस बात पर चर्चा चलाई तो उसने बताया कि उसके पिता के एक अध्यात्मिक गुरू लक्ष्मण बाबा जी है। क्यों ना उनसे इस बारे में परामर्श किया जाय। अगले दिन हम लोग उनके पास गये सारी बात सुनने के बाद उन्होंने ध्यान लगाकर बताया कि वे दोनांे शादी से पहले ही मन से एक दूसरे को पति पत्नी मान चुके थे दोनों की आत्मायें आपस मे मिलने के लिये भटक रही हैं। उनकी आत्माओं की सामुहिक शांति हेतु एक अनुष्ठान करना पड़ेगा जिससे वे दोनों अगले जन्म मे पति-पत्नी के रूप मे सुखी जीवन बिता सके। गुरू जी ने अगली पूर्णमासी को दुर्घटना वाली जगह से मट्टी मंगवाकर दो पुतले बनाये फिर उन्हें दुल्हा-दुल्हन की तरह सजा कर आसन पर बिठाया फिर पूूरे मंत्रोपचार से उनकी शादी करवाई फिर उन पुतलों को नदी मे प्रवाहित करके उनका संस्कार व श्राद्ध करवाया जिससे उनकी आत्माओं को मुक्ति मिल गई। फिर उसके बाद पूनम की रूह मुझे कभी नही मिली 9 फरवरी 1971 को धूमधाम से मेरी साधना के साथ शादी हो गई, आज वह मेरे दो बच्चों की माँ है।
यह रहस्य-रोमांच कहानी पूर्णतः कालपनिक है