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जिंदगी होइगै झंडू बाम
June 12, 2019 • अवधेष

जिंदगी होइगै झंडू बाम युवा कवि अनिल कुमार वर्मा की हास्य व्यंग से भरपूर 32 कविताओं का संग्रह है, अपनी कविताओं में जिदंगी के अनेक अच्छे-बुरे रंगांे को समेटते हुये अनाड़ी जी ने बड़ी कुशलता से समाजिक कुरीतियों, व्यवस्था की कमजोरियों, कानून के दुरूपयोग पर हास्य से भरपूर तीखे व्यंग बाण चलाये हैं। भारतीय धर्म, सभ्यता और संस्कृति में पले रचे बसे अनाड़ी जी ने भारतीय संस्कृति मे वर्णित नारी की तस्वीर मन में सजाये हुये पवित्र वैवाहिक जीवन मे प्रवेश किया। भारतीय ग्रन्थों मे पत्नी के लक्षण-
''कार्ये शुमंत्री करमेशु दासी
रूपेशु लक्ष्मी क्षमया धरित्री।
स्नेहेशु माता कर्मेशु वेश्या
षडकर्मनारी कुल धर्म पत्नी।।
कार्य मे मंत्री, कर्म मे दासी, रूप मे लक्ष्मी, क्षमा में पृथ्वी, स्नेह मे माता और शयन मे वेश्या हो हाँलाकि उपरोक्त सभी गुण किसी भी महिला मे मिलना असंभव है। इसके विपरीत उनको आधुनिक सभ्यता व पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित, व्यक्तिवादी, भौतिकतावादी, भोगवादी जिद्दी, अहंकारी, क्रोधी व झगड़ालु पत्नी मिल गई आजकल उपरोक्त दोष अधिकंाश नवयुवतियों मे पाये जाते हैं जिसने उनके परिवार को ना केवल नष्ट-भ्रष्ट कर दिया बल्कि उनको तलाक, अदालत, जेल की चैखट पर लाकर खड़ा कर दिया आदि कवि बाल्मीकि के समान ही उनके दिल की पीड़ा काव्य रूपी झरने के रूप मे फूट पड़ी। निम्न पंक्तियाँ दिल को छू लेने वाली है। इनमे कवि के दिल का दर्द साफ नजर आता है।
ससुराल से किहिस किनारा,
मइकेम डारिस आपन ड्यारा।।
कानून का फिर लिहिस सहारा,
लगवाइस धारा पर धारा।।
वकील साहब देखाइन तिकड़मी खेल,
पूरे घर का होईगे जेल।
बड़ी मुशकिल से करवाइन बेल,
इज्जत का सब निकरा तेल।।
यहां वे दुष्ट पत्नी से पीड़ित युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते नजर आते है। उनकी यह कविता जिंदगी होइगै झंडू बाम पूरी पुस्तक व उनकी जिंदगी का सार है। लेखक ने पुस्तक में भष्टाचार, विकृत फैशन, देशभक्ति, विकृत व्यवस्था, अत्याचारी कानून, टूटते परिवारों की व्यथा को भी अपनी कलम के जादूई रंगो से सराबोर किया है। अपने साथ घटी परिवार विघटन की घटना की विध्वंसात्मक उर्जा से काव्य रचना करना अपने आप मे एक आश्चर्यजनक एवं चमत्कारी कार्य है। पुस्तक पठनीय व संग्रहणीय है। छपाई सुंदर व आकर्षक और प्रस्तुतीकरण उ़त्तम है।