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डाक बंगला
June 27, 2019 • परिहार दम्पती

1829 के शुरूआती दिनों में मुझे गर्वनर जनरल लाॅर्ड विलियम बैटिंग का आदेश पत्र मिला कि मुझे नर्मदा सागर टेरटिरी के जबलपुर जिले का सिविल व कार्यकारी प्रभारी नियुक्त किया जाता है, यह टेरिटरी 1817 में मराठा अंग्रेज युद्ध के बाद पराजित मराठों से छीनकर कंपनी शासन में जोड़ी गई थी, मार्च 1829 की शुरूआत में मैने वहाँ का चार्ज संभाला मुझसे पूर्व यहां के प्रशासक मि. फ्रेजर लिंडसे की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी, घने जंगलों से घिरा यहाँ का बंगला बड़ा शानदार था, उन्हीं दिनों गर्वनर जनरल लाॅर्ड विलियम ने सारे देश मे नई डाक और तार व्यवस्था लागू की जिससे पूरे देश मे एक शीघ्रगामी आधुनिक डाक व्यवस्था स्थापित हो सके इसके अन्र्तगत सभी प्रमुख राजमार्गो हर पांच पड़ाव (एक पड़ाव बराबर 20 मील) पर सरकारी डाक बंगलों का निर्माण होना था जिनमें आने वाली डाक के रखने के साथ ही डाक कर्मचारियों के अलावा सरकारी दौरे पर जाने वाले अधिकारियों के आवास भोजन की व्यवस्था होती थी ऐसा ही एक डाक बंगला सागर जबलपुर राजमार्ग पर भी बनाने का आदेश मिला मैंने उस इलाके का दौरा किया मुझे राजमार्ग के बांयी ओर की घने बागों से घिरी एक जमीन बेहद पंसद आई जो कहीं-कहीं थोड़ी उंची-नीची थी, लेकिन छायादार पेड़ों, जलावनी लकड़ी, पानी से भरपूर व आबादी के पास थी जमीन बैंदा व बारसाड़ा गांव की सीमा पर पड़ती थी बारसाड़ा एक उजाड़ सा गांव था जो जमीन के पच्छिम मे एक छोटी सी पहाड़ी पर बसा था इस प्लाट के उत्तर मे काफी बड़ा तालाब था जमीन के पच्छिम मे बड़सारा गांव के नीचे एक उजाड़ स्थान पर एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे एक पुरानी पत्थर समाधि की बनी थी जिसके सिरहाने एक दिये का ताक बना था मैंने उस जगह पर डाक बंगला बनवाने का फैसला किया मैंने महसूस किया कि मेरे मातहत मेरे इस फैसले से खुश नही थे, उन्होंने दबी जबान से मुझे ऐसा करने से रोकने की कोशिश भी की लेकिन मेरे खौफ के आगे वे खामोश हो गये उन्होंने बताया साहब वह जगह भूतिया है, वहां बड़सारा गांव के पुराने पटेल की आत्मा भटकती है जबलपुर के मशहूर ठेकेदार करन सिंह को इस काम का ठेका दिया ठेकेदार ने भूमि पूजन के बाद जमीन समतल कराना चाहा लेकिन ना तो कोई भी स्थानीय पण्डित भूमि पूजन के लिये राजी हुआ ना आस-पास का कोई मजदूर उस जगह पर काम करने को तैयार हुआ ठेकेदार ने बाहर से पण्डित मजदूर लाकर काम शुरू किया पहली भारी बरसात के बाद अषाढ की एक सुबह वह दस जोड़ी बैल लेकर जमीन समतल करवाने लगा तभी हरीराम नामक एक हरवाहे ने किसी के फुसफुसाने की आवाज सुनी उसने सब ओर देखा लेकिन दूर-दूर तक कोई नही दिखा आवाज फिर आई बैल अचानक रूक गये पहले तो उसे कुछ भी समझ मे नही आया फिर उसने देखा कि उसके सामने एक भयानक चेहरे वाला जर्जर बूढा खड़ा है। उसका चेहरा बिलकुल सफेद सूखा और उसकी आखें बिलकुल धंसी पुतलियों एकदम सफेद थी मानों किसी मुरदे की आखें हों लेकिन उसके पैर नही दिख रहे थे तभी देखते ही देखते धूल भरी आंधी चलने लगी धूल का एक बगूला सामने कर घूमने लगा धूल पत्ते उसमे गोल-गोल चक्कर लगाने लगे बूढा भी बगूले मे गोल-गोल धूमने लगा और गायब हो गया हरीराम भूत-भूत चिल्लाता भागा और बेहोश हो गया, बैल भी बुरी तरह हांफते हुये जुआ तुड़ा कर भागे बाद मे जंगल मे मिले हरीराम होश मे आने के बाद पागल हो गया उस दिन काम बंद हो गया दूसरे दिन शाम को मजदूर काम खत्म करके एक पेड़ के नीचे हाथ पैर धो रहे थे तभी ना जाने कैसे पेड़ की एक मोटी डाल टूटकर एक मजदूर के सिर पर गिरी जिससे उसकी मौत हो गई इन हादसों को देख कर मजदूरों की रूह फना हो गई उन्होंने काम करने से मना कर दिया कुछ दिन बाद ठेकेदार अन्य जगहों से मजदूर लाकर जमीन की सफाई करवाने लगा पहले दिन ही पेड़ काटते हुये एक लकड़हारे को सामने हवा में भयानक चेहरे वाला जर्जर बूढा नजर आया जो तुरन्त गायब हो गया भय के मारे पेड़ से गिरने से मौत हो गई इसे एक सामान्य सा हादसा समझकर भुला दिया गया, अगले दिन प्लाॅट से खूब सारे सांप निकले उन्हें देखकर सब मजदूर भाग निकले सांप काटने से दो मजदूरों की मृत्यु हो गई अगले दिन संपरे बुलाये गये वे काफी सांप पकड़ कर ले गये और उन्हांेने मंत्रों से जमीन बांध दी उसके दो दिन बाद कुओं की खुदाई का काम शुरू किया गया एक दिन अचानक कुंये की दीवार धँस जाने से एक मिस्त्री कुयें मे ही दफ्न हो गया ठेकेदार ने काम रोककर मुझे सूचना दी मैंने खुद मौके पर जाकर मामले की जांच की घटनाये एकदम सच थी मैंने अपने मातहतों, बैदा गांव के मुखिया और कुछ सम्भ्रान्त लोगों से इस बारे मे राय ली उन्होंने मुझे बताया कि इस जमीन को पूर्व कलेक्टर मि लिंडसे पट्टे पर उठा कर राजस्व को बढाना चाहते थे पहले यह ईलाका बरसाड़ा गांव के मुखिया जोधा सिंह का था जिनकी करीब बीस पचीस साल पहले हत्या हो गई थी तब से इस जमीन पर उसका भूत भटकता है। वह किसी को वहाँ बसने नही देता है वहां रात को क्या दिन मे भी कोेई जाता है, जो जाता है जिन्दा वापस नही आता है। मेरे दफतर के पुराने कर्मचारियों ने भी इस बात की पुष्टि की और बताया कि पुराने कलेक्टर साहब ने इस बारे मे एक सरकारी रिपोर्ट भी बनाई थी जो सरकारी कागजों मे दर्ज है। गांव के बुजुगों ने सलाह दी कि भगत, सयानों को बुलाकर पटेल की आत्मा को बुलाकर उसी से इस समस्या का हल पूछा जाये इसके अगले कुछ दिन तक मैं अन्य कामों मे व्यस्त रहा सावन मास के एक दिन सबेरे से पानी बरस रहा था शाम को अंधेरा जल्दी हो गया शाम का खाना मैने कुछ जल्दी खा लिया और मैं मि. लिंडसे की पर्सनल रिपोर्ट पढ़ने लगा मेज पर लैम्प जल रहा था 17 मार्च 1925, आज मुझे गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग का खत प्राप्त हुआ जिसमे उन्हांेने कम्पनी की आय बढाने पर जोर दिया था इस सिलसिले मे मैंने टेरटिरी की तमाम उन उपजाऊ जमीनों की जाँच की जिनसे पहले आय होती थी पर आज वे परती पड़ी थी या जिनके उददंड जमींदार कर नही देते थे मुझे एक ऐसी विशाल जमीन के बारे मे पता चला जो बड़सारा गांव मे पडत़ी थी उससे पहले मराठा राज्य को पांच हजार सालाना आय होती थी लेकिन वह करीब 20-25 सालों से बंजर पड़ी थी, 22 अप्रैल 1825 आज मैं अपने पटवारियों, तहसीलदार आदि के साथ बड़सारा की जमीन का सर्वे और नापजांेख करने वहाँ पहुँचा मेरे कर्मचारी मेरे फैसले से नाखुश और डरे हुये थे उनका कहना था कि यह जमीन प्रेतग्रस्त है मैंने जैसे ही नपाई का काम शुरू कराया गांव वालों के चेहरे पर अंजाने अनिष्ट आशंकाओं के कारण हवाईयां उड़ने लगीं। देशी कलेक्टर रजिस्टर तैयार करने लगे जैसे ही जमीन की नपाई का काम शुरू हुआ ना जाने कैसे नपाई की रस्सी टूट गई इसे संयोग मान कर नई रस्सी मंगवाई गई नपाई करते कुछ ही वक्त बीता था जाने कैसे नपाई करने वाला एक अमीन हवा मे उछला और दूर जा गिरा इसी के साथ अचानक काफी तेज आंधी आ गई सरकारी फार्म हवा मे उड़ने लगे आंधी मे हम सब करीब-करीब अंधे हो से गये जब आंधी रूकी तो सारे कागज और यंत्र बेकार हो गये थे दुर्घटनाग्रस्त अमीन के दोनों घुटने टूट गये थे हम सब वापस आ गये उसी रात मेरे अर्दली को सांप ने काट लिया और दूसरे दिन मेरा घोड़ा लकवे जैसी किसी विचित्र सी बीमारी का शिकार हो गया शाम होते-होते चल बसा इन घटनाओं का मुझे पर गहरा असर हुआ और मैंने नपाई का काम बंद करा दिया 5 मई 1829 मुझे खबर मिली कि डाकुओं ने कम्पनी का दिल्ली से कलकत्ता को भेजा जा रहा खजाना सागर मे लूट लिया तुरन्त कार्यवाही करो 7 मई मैंने नौगांव छावनी सें सेना की दस पलटन भेजने को लिखा 12 मई आज मैं जिले के पुलिस दस्ते और सार्जेन्ट मोरिस की कमान मे आई सैन्य पलटनों के साथ डाकुओं को पकड़ने निकल पड़ा 18 मई आज जबलपुर की घाटी मे हमारी डाकुओं से मुठभेड़ हुयी 18 डाकू मारे गये 14 पकड़े गये उनका सरदार बाकी साथियों सहित भाग निकला घाटी के बीच एक पत्थर की चबूतरेनुमा जगह थी जिसे देशी सिपाही गोंड आदिवासियों की रानी की कब्र कह कर उसके आगे सर नवाते थे मुठभेड़ मे मेरी बंदूक से निकली एक गोली कब्र मे जा लगी सिपाही बहुत भयभीत थे उनका कहना था कि रानी की आत्मा मुझसे जरूर बदला लेगी मैं इसे केवल अंधविश्वास मानता था शाम होते-होते मुझे तेज बुखार हो गया मैने दवा ली पर कुछ फायदा नही हुआ आधी रात के वक्त मेरी नींद खुली तो तेज बुखार से बदन बुरी तरह टूट रहा था अचानक मैंने देखा कि मेरे पंलग के चारों और एक एक फुट की छोटी-छोटी सात गुड़ियां विचित्र कर्कश धुन मे कुछ गाते हुये नाच रही थी तभी वे गायब हो गई गहरी खामोशी छा गई टेन्ट के बाहर खिली चांदनी फैली हुयी थी तभी मुझे लगा कि बाहर कोई खड़ा है। मैंने देखा कि एक महिला योद्धा बदन पर बख्तरबंद पहने हाथ मे नंगी तलवार लिये खड़ी है। पर यह देखकर मेरा खून जम गया क्योंकि उसका सर नही था, मारे डर के मैं बुरी तरह चीखा संतरी भाग कर मेरे पास आ गये लेकिन वहाँ कोई नही था सिपाहियों का कहना था कि वह चबूतरे वाली प्रेतनी रानी थी डाक्टर इसे बुखार का असर मानता था अगले दिन भी मेरी तबीयत नासाज थी इसके बाद डाक्टर हेनरी लारेन्स की रिपोर्ट नत्थी थी 19 मई मि. लिंडसे कल रात तेज बुखार कुछ अंट-शंट बक रहे थे उन्हें कुछ नाचती हुयी गुड़िया व एक सर विहीन बख्तरबंद पहने महिला दिखाई दी लेकिन यह मात्र उनका वहम था अक्सर तेज बुखार में मरीजों को ऐसे भयानक काल्पनिक दृश्य दिखते है। 20 मई आज मैने लिंडसे की जाँच की उनका बुखार ज्यों का त्यो बना हुआ है। मैंने उनकी दवाइयों मे तब्दीली की रात दो बजे मेरे संतरी ने मुझे जगाया कि मि. लिंडसे का अर्दली आया है उनकी हालत बहुत खराब है। मैं तुरन्त कपड़े पहन कर उनके टैन्ट गया वे वे सूखे पत्ते की तरह थर-थर कांप रहे थे, बुखार बहुत तेज था मैंने तुरन्त माथे पर पानी की पट्टियां रखी वे भयभीत स्वर मे बड़बड़ा रहे थे देखो यह कौन बच्ची हंस रही मैंने चारों ओर देखा मुझे कुछ ना दिखा फिर वे चीखे अरे वो आ गई हत्यारिन उसके हाथ में तलवार व बदन पर बख्तरबंद है पर उसका सर नही है वह चुड़ैल मुझे मारने आ रही है बचाओं मुझे कोई उसकी तलवार से बचाओं तभी उनकी दर्दनाक चीख माहौल मे गूँज गई उनकी गर्दन एक ओर लुढक गई उनकी धड़कन व नब्ज बंद हो चुकी थी, उनकी मौत ने हम सब को अचरज में डाल दिया एक रहस्यमय बात जिसका हमारे पास कोई जवाब नही थी उनकी गर्दन पर तलवार जैसा घाव था जिसमे से खून बह रहा था मामला सचमुच अजीब था बाहर मूसलाधार पानी बह रहा था मुझे बेहद डर लगा मैं रात भर सो नही सका तीसरे दिन अमावस्या थी, रात को गांव मे भगत आया था मैं भी अपनी लोगों के साथ मौजूद था ढपली की धुन पर भगत बहुत देर नाचा अचानक वह झूमने लगा उसकी आंखे चढ गई आवाज बदल गई पुजारी ने पूछा पटेल जी राम-राम आप हम सब पर क्यों नाराज हो कुछ देर चुप रहने के बाद भगत भारी अवाज मे बोला मैं निर्दोष था दीवाली की रात लुटेरे पिंडारी गफूर खां के गिरोह ने दौलत लूटने के लालच मे मेरे लड़कों बहुओं पोतों को बेरहमी से मार डाला उन्होंने मेरे बीबी को खजाना बताने के लिये बहुत यातनायें दी मेरी आंखों के सामने उसने मेरे बीबी को जिंदा जला दिया लेकिन सारा पैसा तो मैं पहले ही दे चुका था फिर उसने मेरे हाथों मे तेल से भीगा कपड़ा लपेट कर उसमें आग लगा दी मेरी चीख-चीखकर बार-बार कहता रहा कि मेरे पास कुछ नही है। फिर उसने मेरे सिर को तलवार से दो भागों में काट डाला मैं मर कर भूत बन गया मैं किसी को नही छोड़ूगा सबको मार डालूगा लेकिन पटेल जी आप बहुत दयालु जमींदार थे आपके द्वार से कोई खाली हाथ नही जाता था आप निर्दोष पर बहुत जुल्म हुआ लेकिन आप खुद भी निर्दोषों पर जुल्म कर रहें यह फिरंगी साहब है जिन्होंने सारे पिंडारियों का समूल नाश कर दिया गफूर खां के टुकड़े टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिये अब यह हम लोगों की भलाई के लिये डाक बंगला बनवा रहे है। कृपया आप हम सब पर दया करके बताये हम क्या करें कि हम सब आपके भलाई के रास्ते पर चल सके कुछ देर चुप रहकर पटेल ने कहा फिरंगी साहब मेरे नाम से पूरे गांव को ब्रह्मभोज करायें मेरे समाधि पर पक्की छतरी बनवा कर मेरे नाम का दिया जलवायें सूरज डूबने के बाद सिवाय पुजारी के कोई भी समाधि व मेरे गांव मे कोई नही जायें तो मैं किसी को कोई नुकसान नही पहुचाऊंगा। मैंने खुद सरकारी पैसे से पूरे गाँव को ब्रह्मभोज करवाया और पटेल की समाधि पर छतरी बनवाई। पुजारी को रोज समाधि की दिया बुखारी करने का हुक्म दिया फिर कोई विध्न नही आया डाक बंगला बन गया अगले चार साल तक सब कुछ ठीक चलता रहा लेकिन तभी एक खौफनाक घटना घट गई शुरूआती सर्दी की एक शाम बुहारनपुर छावनी से आये चार युवा अफसर डाक बंगले मे आकर ठहरे सार्जेन्ट राबर्ट स्टीव, लैफटीनेन्ट पैट्रिक गिनेस, मेजर ब्राइन स्टारफोर्ड, सार्जेन्ट जेम्स रील्ड वे दिन भर खाना पीना शिकार मटरगश्ती करते रहते थे एक कोहासे भरी रात को वे उपरी मंजिल के कमरे मे बैठे वे शराब पी रहे थे तभी जेम्स ही निगाह बंगले के पीछे पड़ी रात के अंधेरे मे उसे काफी दूर एक चलती हुयी रोशनी दिखाई उसने अपने साथी से पूछा उधर देखों वो क्या है। साथी बोला अरे होगा कुछ तुम्हें अपना दिमाग लगाने कर क्या जरूरत है। लेकिन उसका मन नही माना उसने चैकीदार राम सजीवन से पूछा वहां क्या है साहब उसके बारे मे कुछ ना पूछो वहाँ मौत बसती है। उसके बारे मे बात करना भी मौत को बुलाना है। पैट्रिक बोला तुम इण्डियन जंगली का जंगली ही रहेगा हम खुद वहाँ जाकर सारा मामला देखेगा चैकीदार कांपते हुये बोला साहब भूल कर भी वहां नही जाइयेगा वरना सब जान से जायेंगें चैकीदार के लाख रोकने पर भी वे फिरंगी पिस्तौल, राईफल से लैस होकर रोशनी के पीछे चल दिये अमावस की काली अंधेरी रात थी बंगले के पीछे जमीन कुछ ढलवा थी रास्ते पर दांये हाथ पर काफी बड़ा तालाब था करीब आधा फर्लाग चलने पर उन्हें एक विशाल पीपल के पेड़ के पास खुल लंबे बालो वाली सफेद साड़ी ब्लाउज पहने एक युवती दिखाई दी जिसके हाथ में थाली थी जिसमे लोटा, फूल व जलता हुआ दिया रखा था वह वह बड़ी रहस्यमय लग रही थी बांयें हाथ पर कुछ दूर पर एक झोपड़ी थी युवती ने समाधि पर जाकर जल चढाया फूल चढा कर ताक मे दिया रखा फिर हाथ जोड़ कर परिक्रमा करने लगी तभी नशे मे चूर मेजर ब्राइन ने दुःसाहस दिखाते हुये युवती का हाथ पकड़ कर पूछा कौन हो टुम इतनी राट का यहाँ क्या करटा है युवती तेज आवाज मे चीखी बापू तुरन्त झोपड़ी से एक वृद्ध दौड़ता हुआ आया और बोला मेरी बेटी को छोड़ दीजिये यह बेकसूर है आप तुरन्त यहां से चले जाइये वरना सब मारे जायेंगें पटेल जी के कोप से कोई नही बचेगा यू इडियट क्या तुमारा पटेल इतना पावरफुल है। हाँ साहब आग हवा, पानी मटट्ी सब पर उसका जोर चलता है। देखते ही देखते वे सब नशे मे बूट सहित समाधि पर चढ गये एक ने लात मार कर जलता दिया बुझा दिया वे सब कब्र पर नाचने कूदने लगे उन्हें नीचे उतारने के लिये पूजारी उनसे भिड़ गया और एक को नीचे फेंक दिया यह देखकर सार्जेन्ट राबर्ट स्टीव ने पुजारी को गोली मार दी यह देख पुजारी की बेटी फिरंगियों पर झपटी स्टीव ने उसे भी गोली मार दी खून से सने पुजारी ने कहा कि तुम सब मारे जाओंगे आग पानी, जमीन और हवा से उनका नशा कुछ कम हुआ वे खिन्न मन से लौट रहे थे अचानक तालाब के पास से गुजरते हुये स्टीव का पैर फिसला और वह लुढकता हुआ तालाब मे गिर गया वे सब चीखते हुये उसे बचाने दौड़े अंधेरी रात मे वे कुछ ना कर सके अगले दिन स्टीव की लाश तैरती मिली तीसरे दिन शिकार खेलते हुये एक जंगली सुअर का पीछा करते हुये ब्राइन से सूखे कुयें में गिर गया और सर फटने से उसकी मौत हो गई इसके दूसरे दिन पैट्रिक कमरे मे सो रहा था जाने कैसे लालटेन फट गई कमरे मे आग लगने से पैट्रिक की मौत हो गई इन घटनाओं से घबरा कर रील्ड ने डाक बंगले से बाहर निकलना ही बंद कर दिया रात उसे नींद नही आ रही थी उसे किसी युवती के रोने की आवाज सुनाई इतनी रात को कौन स्त्री रो रही है। ऊपरी मंजिल की खिड़की से उसने बाहर झांका तो मारे दहशत के उसकी हालत खराब हालत हो गई नीचे सफेद कपड़ें मे पुजारी की मृत बेटी डरावनी आवाज मे रो रही थी रील्ड चीखते हुये बोला यह सच नही है। तुम तो मर चुकी हों अचानक़ वह उपरी मंजिल की खिड़की नीचे आ गिरा और मर गया एक दिन चैकीदार भी मरा पाया गया इसके कुछ साल तक बंगला वीरान पड़ा रहा एक दिन ना जाने कैसे उसमे आग लग गई डाक बंगला जल कर खाक हो गया पटेल की आत्मा को मुक्ति मिली या नही पर आज भी जबलपुर हाईवे पर डाक बंगले के खंडहर व उसकी समाधि मौजूद है जिस पर आज भी दिया जलता है।
यह रहस्य-रोमांच कहानी का स्थान व पात्र पूर्णतः कालपनिक है