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डिजिटल युग के बच्चे कुछ ज्यादा ही संवेदनशाील हैं
June 16, 2019 • विजय प्रकाश

पिछले कुछ दशकों में मानव ने तकनीकी प्रयोग से प्रत्येक क्षेत्रों में उन्नति की है, जोकि प्रशंसनीय है, साथ ही भारतीय समाज में निरन्तर संयुक्त परिवार का एकाकी परिवार में विभक्त होना, जहाँ माता-पिता दोनों ही कार्यरत है, उनका बच्चों को उचित एवं पर्याप्त समय न दे पाना, उनमे परस्पर संवाद न होना एक विचारंणीय विषय है। यह संवादहीनता उस समय अत्यधिक दुःखदायी होती है, जब उनका पाल्य किशोरावस्था 10 से 19 वर्ष की दहलीज पर खड़ा होता हैं। किशोरावस्था को जीवन का वसंतकाल माना गया है। किशोर अपने मन की उलझनों को सांझा तय करना चाहता है, परन्तु डर व झिझक के कारण 72 फीसदी किशोर माता-पिता से अपनी सभी बातें नही कह पाते है, जिससे उनके बीच गलतफहमी रहती हैं और मित्रों से सांझा करने के पश्चात हंसी के पात्र बनते है या गलत सुझाव प्राप्त करते हैं। मोबाईल और कम्प्यूटर के अधिक प्रयोग की वजह से 64 फिसदी किशोर व उनके अभिभावकों के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं। 63 फीसदी किशोर कहतें है कि घर में उनकी बात नही मानी जाती अथवा राय नही ली जाती तो उन्हें अधिक गुस्सा आता हैं। 16 फिसदी मे गुस्सा व तनाव महसूस होने पर नशा करने की इच्छा जागृत होती हैं। 61 फिसदी किशोर बताते है कि माता-पिता उनसे परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के लिए दबाव बनाते हैं, अच्छा प्रदर्शन न कर पाने पर 48 फिसदी खुद को नुकसान पहुँचाना चाहते है। 60 फिसदी किशोरों में अकेलेपन की वजह से आत्मविश्वास की कमी रहती है, 50 फिसदी किशोरों मे हीन भावना रहती है और असफल हारने का डर सताता रहता है। परिवार में उचित वातावरण न मिलने पर 43 फिसदी किशोर घर छोड़कर भाग जाना चाहते हैं। 39 फिसदी किशोरों को लगता है कि उनके दोस्त के माता-पिता अधिक अच्छे हैं। 84 फिसदी बताते है कि मैं जो पढ़ना अथवा करना चाहता हूँ, यदि माता-पिता अनुमति दें तो मैं बेहतर प्रदर्शन कर सकता हूँ, अत्यधिक दबाव अथवा तनाव होने पर 30 फिसदी किशोरों में आत्महत्या का विचार आता है। 85 फिसदी अधिकांशतः परार्मशक की आवश्यकता महसूस करते हैं। ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को डांटने के बजाए उन्हें दोस्ताना माहौल प्रदान करें, बच्चे के लिए संवाद के सभी रास्ते खोले, जिससे बच्चों का उचित मार्गदर्शन हो सके, डिजिटल युग के बच्चे कुछ ज्यादा ही संवेदनशाील हैं, उन्हें समझाने पर ज्यादा जोर देने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करें, उन्हें कहने का मौका दें, आवश्यकता पड़ने पर परार्मश से अवश्य संपर्क करें।