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नाइट शो वाली रात
July 4, 2019 • श्रीमती अनीता परिहार

यह 1970 के कड़क जाड़े की कुहासे भरी रात थी सुभाष गुप्ता अमीनाबाद के बेहद पुराने नाज थियेटर से रात का आखिरी शो देख कर निकला था, रात के करीब एक बजे का समय था कुछ देर पहले हुयी हल्की बारिस ने मौसम खराब कर दिया था आसमान अभी घने बादलो से घिरा था बाहर हाड़ कंपाऊ हवा चल रही थी वह हाथो मे दस्ताने, कानो व गले मे मफलर लपेट कर साईकिल से अपने घर की ओर चल पड़ा जो निशातगंज की सातवीं गली मे दुर्गा मंदिर के पास था। वह कैसरबाग चैराहे से जयहिन्द थियेटर होता हुआ लालबाग चैराहे पहुंचा जहाँ कुछ लोग आग ताप रहे थे सब दुकाने बन्द और सड़के सन्नाटे मे डूबी हुयी थी। कहीं-कहीं स्ट्रीट लाइट के इक्का दुक्का बल्ब जल रहे थे, वह दारूलशफा होते हुये जी.पी.ओ. के सामने आया तभी पूरे इलाके की लाइट चली गई सब कुछ अंधेरे मे डूब गया तभी उसे कुछ विचित्र हल्की आवाजें सुनाई दी, मानों खूब सारी मधुमखियां शोर कर रही हों पर उसे कुछ नजर नही आ रहा था। जब वह नरही पर पहुंचा तो उसे सामने कुछ धुंध सी नजर आई गौर से देखने पर सुभाष को एक युवती दिखाई दी जो गोरी, खूबसूरत युवती थी वो सफेद साड़ी ब्लाउज पहने थी तेज हवा में उसके कमर तक फैले लंबे बाल हवा मे लहरा रहे थे जो उसे रूकने का इशारा कर रही थी सुभाष को आधी रात को वह युवती बड़ी रहस्यमय लग रही थी उसे कुछ डर भी लगा किन्तु उसके चेहरे पर लाचारी और दुःख के भाव देखकर सुभाष ने साईकिल रोक दी वह युवती बेहद मीठी आवाज मे बोली सुनिये मैं बड़ी मुसीबत में हूँ प्लीज मेरी मदद कीजिये मंै आपकी क्या मदद कर सकता हूँ, जी मेरा नाम नीता है सामने गली मे मेरा मकान है। मेरे पिता प्रो. शारदा प्रसाद वर्मा की तबीयत वहुत खराब है उन्हें दमा का दौरा पड़ा है, डा. आनंद मोहन शर्मा से उनका इलाज चल रहा है। उनकी दवा खत्म हो गई है। इतनी देर रात और खराब मौसम मे मुझे एक घंटे से कोई सवारी नही मिल रही है अगर आपको तकलीफ ना हो तो कृपया मुझे उनके दवाखाने तक छोड़ दें। सुभाष ने डा. आनंद का नाम सुन रखा था, वे लखनऊ मेडिकल कालेज से रिटायर हुसैनगंज के नामी डाक्टर थे। सुभाष लड़की को साईकिल के कैरियर पर बैठा कर चल दिया उसे अपने चारो और ताजे गुलाबों की भीनी-भीनी तेज खुशबू महसूस हुयी पर वह कुछ नही बोला डाक्टर साहब का दवाखाना हुसैनगंज चैराहे से कुछ आगे दांयी ओर स्थित उनके दुमंजिले पुश्तैनी मकान मे था उपरी मंजिल पर उनका निवास और निचली मंजिल पर दवाखाना था दवाखाने पहुंचकर युवती ने कालबेल बजाई साठ-पैंसठ वर्षीय डाक्टर आनंद ठंड मे सिकुड़ते हुये आये उन्होने प्रो. वर्मा का हाल पूछा और कुछ दवायें दी सुभाष ने वापस उसे नीता को नरही पर छोड़़ दिया नीता उसे थैंक्स कहती हुयी इण्डिया काफी हाउस के सामने वाली गली मे धुस गई। वह जब अपने घर पहुंचा तो घड़ी मे रात के पौने तीन बज रहे थे वह सीघा अपने कमरे मे जाकर सो गया दूसरे दिन उसका किसी काम मे मन नही लगा उसे बार बार रात घटी घटनायें याद आ रही थी दरअसल मे उसे नीता के सौन्दर्य ने दिल की गहराई तक छू लिया था नीता का गोरा खूबसूरत चेहरा मीठी आवाज और ताजे गुलाबों की भीनी-भीनी खुशबू की मधुर यादें सता रहीं थी दूसरे दिन गुरुवार था उसके काम की छुटटी थी दिन यू ही इधर उधर के कामों मे बीत गया किन्तु आज सुभाष मन किसी काम में नही लगा नीता उसके दिलो दिमाग पर बुरी तरह छा गई थी। शाम को वह समय बिताने के लिये निशातगंज गोमती के पुल के आस-पास टहलने चला गया हांलाकि अभी शाम के पांच ही बजे थे परन्तु जाड़े के दिन होन के कारण सूरज डूब चुका था अंधेरा हो गया था कोहरा भी फैलने लगा था स्ट्रीट लाइट जल उठी थीं। वह वापस घर को चल दिया तभी पुल की ढलान पर स्ट्रीट लाइट की रोशनी मे उसे सड़क के बीचो-बीच एक बेहद खूबसूरत ताजा गुलाब का फूल पड़ा नजर आया ना जाने किस शक्ति के वशीभूत होकर उसने वह फूल उठा लिया और उसे सुंघते हुये घर को चल दिया उसने कमरे मे जाकर फूल मेज रख दिया और कमरे मे गुलाब की खुशबू कमरे फैल गई कुछ देर रेडियो सुनने के बाद खाना खाकर वह सो गया अभी उसे सोये दो घंटे भी नही हुये थे कि अचानक उसकी नींद खुल गई तभी उसको किसी की गहरी-गहरी सांसे लेने की आवाज आई उसे लगा कि उसके अलावा कमरे में कोई और भी है। उसने झट से लाइट आॅन कर दी यह देखकर उसके हैरत की सीमा नही रही कि नीता सफेद साड़ी ब्लाउज पहने उसके कमरे मे खड़ी है। उसके कमर तक फैले बाल हवा मे लहरा रहे थे और उसके शरीर से ताजे गुलाब की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी सूनसान कड़क जाड़े की रात मे नीता को देख कर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ उसने हैरत से पूछा आप यहां जी मै आपको धन्यवाद देने आई हूं।
भीशण ठंड में भी उसके बदन पर केवल साड़ी ब्लाउज ही था और बंद दरवाजे से वह कमरे में आ कैसे गई। उसके मन में कई सवाल उठ खड़े हुये किन्तु नीता से मिलने से मिली बेहद और अप्रत्याशित खुशी और नीता की नाराजगी के भय से उसने और कुछ नही पूछा उसे लोकलाज का भी डर लगा इतनी देर रात नीता को किसी ने कमरे मे देख लिया तरे अच्छा खासा बखेड़ा हो जायेगा उसने तुरन्त कमरे का दरवाजा अच्छी तरह बंद कर लिया फिर दोनों बाते करने लगे बातें करते कितनी देर हो गई पता ही नही चला फिर नीता ने मूक निमंत्रण दिया सुभाष तन मन भूल कर नीता के सौन्दर्य मे डूबता उतराता रहा सुबह जब उसकी नींद खुली तो नीता जा चुकी थी उसे अजीब सी थकान और कमजोरी सी महसूस हुयी पर नहाकर वह तरोताजा होकर अपने काम पर चला गया सुभाष अमीनाबाद हिन्दुस्तान प्रिंटिंग प्रेस मे चार सौ रूपया महीने पर नौकरी करता था। गुरूवार को को बाजार की छुटटी रहती थी वो बुधवार को अक्सर नाइट शो देख लेता था इसके बाद दो दिन तक नीता उससे नही मिली इन दिनों मे सुभाष खोया-खोया सा रहा उसके दिल मंे हर वक्त नीता का ख्याल रहता था, तीसरे दिन नीता आई नीता ने बताया उसके पिता की तबीयत ठीक ना होने के कारण वह नही आ सकी दोनांे एक दूसरे की बांहो मे समा गये इसके बाद हर रोज यही सिलसिला चलने लगा। इधर सुभाष का स्वास्थ तेजी से गिरने लगा शरीर मे कमजोरी आने लगी चेहरा पीला पड़़ने लगा एक रात उसकी मां पानी पीने उठी तो उन्हें सुभाष के कमरे से किसी लड़की के हंसने खिखिलाने की आवाज सुनाई दी उन्हें अचंभा हुआ कि इतनी देर रात कौन लड़की हंस रही है। वे ऊपर सुभाष के कमरे पर गई तो देखा कि कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था बत्ती भी बुझी हुयी थी किन्तु हंसने खिखिलाने की आवाज आ रही थी उन्हाने दरवाजा खट खटाया तो आवाजें आनी बंद होकर पूरी खामोशीे छा गयी पुकारने पर सुभाष ने दरवाजा खोला तो तो मां को यह देख कर बड़ा अचरज हुआ कि कमरे मे कोई नही था जब उन्होंने सुभाष से लड़की की आवाज के बारे मे पूछा तो उसने नजरें चुराते हुये कहा कि यह आपका वहम् है परन्तु उसकी मां को सौ फीसदी यकीन था कि वह उनका वहम् नही था, एक दिन वह गोमती नदी के किनारे बने सैकड़ों साल पुराने शिव मंदिर में बैठकर नदी के नजारे देख रहा था तभी मंदिर के बाबा आये उन्होंने सुभाष को गौर से देखा और गरजते हुआ पूछा कौन है तू, बाबा मैं सुभाष हूं। वे बोले मैं तुझसे नही इस चुड़ैल से पूछ रहा हूं जो तेरे साथ साये की तरह लगी है। कौन बाबा मैं तो अकेला हूं रोज जिससे तू मिलता है। वह कोई लड़की नही खूबसूरत छलावा है, तेरे जैसे नवजवानों का खून चूसना उसकी फितरत है। मैं नही मानता सुभाष ने कहा तो सच्चाई अपनी आंखों से देख आज रात क्या होता है। उतार अपनी कमीज। सुभाष ने अपनी कमीज उतारी तो बाबा ने उसके सीने पर मंत्र पढ कर रोली से दुर्गा जी का यंत्र बना दिया उस रात जब नीता आई तो जैसे ही सुभाष ने उसे अपनी बांहो मे भरा तो बुरी तरह चीखती हुयी वह अलग हो गई जैसे आग से बचने की कोेशिश कर रही हो फिर जलती हुयी भयानक आंखों से चीखते हुये बोली क्या पहना है तुमने तुरन्त उसे अपने बदन से उतारो नही तो मैं तुम्हें और पूरे परिवार को मार डालूगी अचानक नीता का चेहरा पुरानी सड़ी हुयी लाश जैसा हो गया, तभी सुभाष की नजर उसके पैरों पर पड़ी नीता के पैर उलटे थे। वह बुरी तरह भूत-भूत चीख की बेहोश हो गया उसकी चीख सुनकर सारे घर वाले उसके कमरे मे पहुँचे उसकी हालत देख सबका कलेजा मंुह को आ गया किसी तरह उसे होश मे लाया गया उसने बदहवास हालत मे घर वालों को सारा किस्सा सुनाया सुभाष के पिता कैलाश नाथ गुप्ता के एक मिलने वाले रामनारायण साहू नरही के पुराने वाशिंदे थे उनसे जब शारदा प्रसाद वर्मा के बारे मे पूछा गया तो उन्होने बताया आज से कई साल पहले उनके मुहल्ले में शारदा प्रसाद वर्मा नाम के एक प्रोफेसर रहते थे। उनकी पत्नी का जवानी मे ही देहान्त हो गया था उनके दो बेटे कहीं बाहर नौकरी करते थे जिनकी अपने पिता से नही बनती थी उनकी एक 18-19 साल की एक बेटी नीता थी जो मेरी बेटी साधना की सहेली और सहपाठी थी दोनों भारतीय बालिका विद्यालय मे इंटर की सहपाठी थी वर्मा जी को क्षय रोग था, जाड़े की एक रात वर्मा जी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई नीता पिता के लिये दवाई लेने निकली उसने सफेद साड़ी और ब्लाउज पहन रखा था काफी रात हो जाने के कारण उसे कोई सवारी नही मिल पा रही थी तभी उसे किसी कार वाले ने टक्कर मार दी मौके पर ही उसकी मौत हो गई थी शारदा प्रसाद वर्मा यह सदमा बर्दाश्त नही कर सके और कुछ दिन बाद उनकी भी मौत हो गई उनका मकान भी कुछ साल पहले गिर गया मुहल्ले के कुछ लोगों का मानना हैं कि नीता मर कर चुड़ैल बन गयी है।
इसके कुछ दिन बाद एक रात सुभाष अपना काम खत्म करके घर लौट रहा था उसके साथ उसका दोस्त उमेश पाण्डे भी था जो बगल की दुकान श्याम बुक डिपो में काम करता था और पेपर मिल कालोनी में रहता था दोनों साईकिल से शाॅट कट के रास्ते से लौट रहे थे जो स्टेडियम के बगल से होता हुआ गोमती नदी के दाँयी ओर के बंधे होते हुये निशातगंज के पुल की ओर आता था स्टेडियम से लेकर बंधे तक स्ट्रीट लाइट नही थी दोनों आपस मे बातें करते हुये बंधे से गुजर रहे थे अचानक सुभाष भय से कांपते हुये चुुड़ैल-चुड़ैल कह कर बुरी तरह चीखने लगा, साईकिल समेत गिर पड़ा उमेश को कुछ समझ मे नही आया कि क्या हो गया है। तभी सुभाष ने नदी की ओर ईशारा किया तो उधर देखकर उमेश की भी हालत पतली हो गई। बंधे से 25-30 फुट दूर हवा मे सफेद साड़ी ब्लाउज पहने एक 20-22 साल की युवती उनके साथ-साथ उड़ रही थी मानो हवा मे तैर रही हो उसके खुले लम्बे बाल हवा लहरा रहे थे वह हनुमान जी का घ्यान करके उंचे स्वर मे हुनमान चालीसा का पाठ करने लगा चुड़ैल कुछ दूर तक उनके साथ उड़ती रही फिर चीखती हुयी दूर होती चली गई और गोमती पार जाने के बाद दिखना बंद हो गई उमेश उस रात सुभाष को उसके घर छोड़ गया। सुभाष के पिता सपरिवार रामनारायण के घर नरही गये और उन्होने अपनी आंखों से वर्मा जी का मकान देखा रामनारायण जी ने गुप्ता जी को अपनी बेटी साधना का उसकी सहेलियों के साथ लिया गया ग्रुप फोटो दिखाया जिसमे नीता भी थी नीता की फोटो देखकर सुभाष ने बुरी तरह चीख पड़ा यही थी पिताजी यही थी जो रात मे मुझसे मिलती थी, लेकिन यह मर कैसे सकती है। रामनारायण ने बताया कि उसे मरे तो 14-15 साल बीत चुके हैं। मैं खुद उसके अंतिम संस्कार मे शामिल हुआ था मेरे सामने ही उसे दफनाया गया था सुभाष अपने परिजनों के साथ गोमती नदी के मंदिर वाले बाबा जी से मिला उन्होने नीता की आत्मा का आहवाहन किया और तंात्रिक अनुष्ठान द्वारा उसकी आत्मा को मुक्ति दे दी उसके बाद नीता सुभाष से फिर कभी नही मिली आज 65 वर्षीय सुभाष की अमीनाबाद मंे अपनी नारायण प्रिंटिग प्रेस है जो उसके बेटे संभालते हैं। रहस्य-रोमांच की यह कहानी पूर्ण काल्पनिक है।