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पुराना आयना
November 14, 2019 • अनीता परिहार


डब्लु.एच. रसेल 1857 के दौरान हिन्दुस्तान में उस समय के मशहूर बिटिश अखबार दि इंगलिशमैन के संवाददाता थे मई 1857 में गदर के समय वे कानपुर मे थे तभी मई के आखिरी मे इस खबर की सच्चाई का पता लगाने उन्हें फरूखाबाद जाना पड़ा कि वहाँ के शासक नवाब तजफफुल हुसैन खां कन्नौज के स्वामी बिरजानंद तथा देशी फिरंगी फौज के बागी सिपाहियांे से मिल कंपनी सरकार के खिलाफ बगावत करना चाहते है हाल में ही कंपनी द्वारा उनकी पेंशन बंद किये जाने से वे कंपनी से खासे नाराज थे फरूखाबाद कानपुर से साठ मील पश्च्छिम में बसी कंपनी सरकार की मित्र रियासत थी वहाँ उनके साथ जो कुछ घटा उसका वर्णन उन्होनंे अपनी 1860 में लंदन से छपी किताब माई डायरी इन इंडिया में किया है। जिसका जिक्र उन्ही के शब्दों में किया जा रहा है। 21 मई की शाम मैं फरूखाबाद पहुँचा मुझे रेजीडेंट के आवास में ही ठहराया गया नवाब के बगावत की अफवाह शहर मे जोरों पर थी 3 जून को शहर में सीतापुर की ब्रिटिश छावनी के बागी सिपाही शहर में आये चार जून को उन्होनंे नवाब के सिपाहियों से मिलकर अंगे्रजों पर हमला कर दिया अचानक हुये इस हमले मे सैकड़ों अंग्रेज अफसर व कर्मचारी मारे गये बाकी भाग गये उनके आवास, कचहरी कार्यालय लूटकर जला दिये कंपनी का खजाना लूट लिया गया लेकिन मुझे बागी सिपाहियों ने कुछ नहीं कहा उसी शाम मुझे खबर मिली कि कुछ बड़े अंग्रेज अफसर अपने परिवार सहित बीती रात ही रात के अंधेरें में नाव द्वारा कानपुर भाग गये नवाब तजफफुल हुसैन खां की फिर से ताजपोशी हुयी मै करीब आठ महीने तक फरूखाबाद में ही रहा फिरंगी होने के बावजूद नवाब ने मेरा पूरा सम्मान किया मुझे रियासत में कहीं भी आने जाने की पूरी आजादी थी नवाब ने गंगा के किनारे स्थित दरियाये महल मे मेरे रहने की व्यवस्था करवा दी थी जो किले के उत्तर में एक ऊँचे टीले पर स्थित था इस दौरान मुझे रियासत और कन्नौज को अच्छी तरह एक बार मैं देखने का मौका मिला एक बार में कन्नौज की पुरानी राजधानी बारी जो कन्नौज से 30 मील पूर्व गंगा पार पड़ती थी के खास बाजार में टहल रहा था कि एक अजीब से बूढे आदमी ने मुझे एक नायाब चीज मुनासिब दाम पर बेचने की पेशकश की मेरे जिज्ञासा दिखाने पर वह मुझे कई गलियों में घुमाता हुआ एक खंडहरनुमा मकान मे ले गया और जहाँ उसने मुझे एक अजीब सी आकृति वाला काफी पुराना अंडाकार आयना दिखाया यह चाँदी के भारी भकरम फ्रेम में लड़ा करीब पांच फुट ऊँचा व तीन फुट चैड़ा नक्काशीदार आयना था जिसके निचले चैड़े फ्रेम पर दो तीन लाइनों में कुछ लिखा था जो मैल की मोटी पर्त के नीचे ढक गया था और उपरी डरावनी सी देवी की आकृति अंकित थी उसे देखते एक नजर में देखते मैं भांप गया कि आयना वाकई हजारांे साल पुराना और दुर्लभ है बूढे ने आयने के दो सौ रूपये मांगे लेकिन काफी सौदेबाजी करने के बाद सौदा नब्बे रूपये मे तय हुआ चोर ने बताया दसे उसने कन्नौज के मशहूर सेठ चिरौंजीलाल की हवेली से चुराया था कोई कुर्मी अपने खेत मे कुंआ खुदवा रहा था तब खुदाई में आयना निकला था जिसे वह सेठ को बेच गया था मैने आयने को हिफाजत से दरियाये महल मे रखवा दिया जनवरी 1858 मंे मुझे कानुपर लौटना पड़ा और मुझे पत्रकारिता के काम से फौज के साथ कितने ही जिलों में भटकना पड़ा गर्मी आते-आते गदर कुचल दी गई कम्पनी भंगकर दी गई महारानी विक्टोरिया ने देश का शासन अपने हाथ मे ले लिया गया जमींदारों ओर जनता को अनेकों सुविधायें और राजनैतिक, धार्मिक और नागरिक अधिकार प्रदान किये गये लाखों कैदियों को आम माफी प्रदान की गई गदर खत्म होने पर मैं कन्नौज मे पड़ा अपना सामान लेने दरियाये महल पहुँचा नवाब जिनकी मौत की सजा बिटिश सरकार ने माफ कर दी थी ने ना केवल तहेदिल से मेरा स्वागत किया बल्कि मुझसे कुछ दिन उनका मेहमान बन कर कन्नौज में गुजारने की गुजारिश की।