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फिल्मी डकैतों का सफर
July 13, 2019 • राजीव प्रताप सिंह

भारतीय फिल्मकारों ने हमेशा से ही देश व समाज की समस्याओं को अपनी कहानी का आधार बनाया है। डकैती की समस्या भी लम्बे समय से ग्रामीण जनता को पीड़ित करती रही है। समाज के ही कुछ युवक अनेक आर्थिक, समाजिक या पुलिस या कानूनी कारणों से कानून व समाज के खिलाफ हथियार उठा कर जनता को लूटने लगते हैं और गैर कानूनी कार्यो मे लिप्त हो जाते है। किसी इंसान के डकैत बनने के अनेकों कारण होते है। कुछ गरीबी, भयंकर, शोषण, अत्याचारों, जमींदारों, साहूकारों के जुल्म, भ्रष्ट पुलिस के अत्याचारों या पुलिस, नेताओं, जमीदारों व साहूकारों के गठजोड़ या जातीय संघर्ष के कारण डाकू बन जाते है। कुछ अपराधी प्रवृत्ति के युवक अपनी क्रूर प्रवृत्ति, नशे व अय्याशी तथा संामतवादी सोच के कारण भी डकैत बन जाते है। भारतीय फिल्मकारों ने इन सभी प्रकार के डकैतों के जीवन व उनके कारनामों को बड़ी सजीवता से रूपहले पर्दे पर उतारा है। डकैती की फिल्मों का भारतीय सिनेमा के विकास में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। रूपहले पर्दे के इतिहास पर नजर डालने से पता चलता है कि हिन्दी सिनेमा की पहली डाकू फिल्म 1948 मंे आई नवीनचन्द्र व लीला पवार अभिनीत व बलवंत दवे द्वारा निर्देशित सफेद डाकू थी, जिसके सम्बध मे अधिक जानकारी नही मिलती है। इसके बाद 1957 में महबूूब खान की मदर इण्डिया आई जिसमे पहली बार डाकू समस्या को मानवतावादी दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की गई थी। इसके बाद दूसरी उल्लेखनीय फिल्म 1961 में राजकपूर की जिस देश मे गंगा बहती है आई जिसमे राका डाकू के रूप में प्राण ने जानदार अभिनय किया जिसके लिये वे आज भी याद किये जाते हैं। 1961 में टेªजडी किंग दिलीप कुमार गंगा डाकू के रूप में गंगा जमुना में नजर आये तो फिल्म और दिलीप कुमार दोनों ने नये सफलता के झण्डे गाड़ दिये जिसमें उन्होंने साहूकार व पुलिस के अत्याचार से पीड़ित होकर मजबूरन बने डाकू का ऐसा शानदार अभिनय किया जिसमे उनकी मजबूरी व लाचारी साफ नजर आती थी, फिर 1963 में सुनील दत्त की होम प्रोडेक्शन अजंता आर्टस के बैनर तले फिल्म मुझे जीने दो आई सुनील दत्त की गरजदार आवाज और रोबीले व्यक्तित्व ने उनके क्रूर डाकू के किरदार में चार चाँद लगा दिये फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला फिल्म बेहद कामयाब रही 1971 मे फिरोज खान, संजय खान मुमताज की मेला मे फिरोज खान ने डाकू शक्ति सिंह के रूप मे यादगार भूमिका अदा की आगे चल कर उन्होंने आग, शंकर शंभू, आग और पानी मे डाकू की सफल भूमिकायें कीं। 1972 मे मुहम्मद हुसैन द्वारा निर्देशित सुल्ताना डाकू आई जो ब्रिटिश काल मे हरियाणा के वास्तविक डाकू सुल्ताना के जीवन पर आधारित फिल्म यह आज भी खास मुकाम रखती है। जिसमे सुल्ताना डाकू के किरदार के रूप मे दारा सिंह के सजीव अभिनय को भुलाया नही जा सकता। 1971 मे हाॅरर और सस्पेंस फिल्मों के मषहूर निर्देशक राज खोसला द्वारा निर्देशित धर्मेद्र, विनोद खन्ना की मेरा गाँव मेरा देश आई जिसमे डाकू जब्बर सिंह के रूप मे विनोद खन्ना एक नये अवतार के रूप मे नजर आये खंूखार डाकू का निभाया उनका रोल अविस्मरणीय है। आगे चलकर उन्होंने कच्चे धागे 1973, बंटवारा, पत्थर और पायल मे डाकू का रोल निभाया ठाकुर ब्राह्मण जातीय संघर्ष व खानदानी दुश्मनी पर बनी कच्चे धागे मे लाखन ठाकुर (विनोद खन्ना) के प्रतिद्वन्दी डाकू रूपा के रूप मे कबीर बेदी भी डाकू के रूप मे खूब जमे। 1972 मे ही एक कम बजट की डाकू फिल्म पुतलीबाई आई सुजीत कुमार और अभिनेत्री जयमाला अभिनीत यह फिल्म बेहद हिट रही इसकी एक कव्वाली कैसे बेशम आशिक हैं, बेहद हिट हुई। 1974 मे नरेन्द्र बेदी की फिल्म खोटे सिक्के मे खलनायक अजीत ने खंूखार जंगा डाकू का बेहतरीन अभिनय किया अजीत ने प्रतिज्ञा, पत्थर और पायल मे भी डाकू बने। लगभग खोटे सिक्के की ही कहानी पर 1975 मे रमेश सिप्पी व जी.पी. सिप्पी की मल्टीस्टार फिल्म षोले आई जिसमे गब्बर सिंह के रूप मे अमजद खान ने खलनायकी का नया इतिहास रच दिया फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास मे मील का पत्थर साबित हुयी फिल्म ना केवल जबदस्त हिट हुयी उसके डायलाॅग ''कितने आदमी थे'', तेरा क्या होगा कालिया'',''आओ महारथी'' ''जो डर गया समझो कि मर गया'' घर-घर गूँजे गब्बर सिंह आतंक का नया पर्याय बन गया फिल्म ने देश के दर्जनों सिनेमा घरों मे प्लेटिनम जुबली बनाई। चरित्र अभिनेता जोगेन्दर ने भी 1975 मे फिल्म रंगा खुश मे मलिच्छ व क्रूर डाकू के रूप मे लोगों का भरपूर मनोरंजन किया अपनी अगली फिल्म बिंदिया और बंदूक मे भी वे रंगा डाकू बने। 1987 में सन्नी द्योल की फिल्म डकैत, 1988, जे.पी. दत्त की यतीम, भी सराहनीय डकैती पर आधारित फिल्में थीं सनी की एक अन्य डाकू फिल्म घायल भी अच्छी फिल्म थी मे अस्सी के दषक के बाद कुछ मशहूर वास्तविक डकैतों के जीवन पर बायोपिक फिल्में बनीं जिनमे 1995 में दस्यु सुंदरी फूलनदेवी के जीवन पर आधारित शेखर कपूर की फिल्म बेंडिट क्वीन आई असली बीहड़ों की लोकेशन, बुंदेली भाषा, अशलील भाषा, न्यूड सीन तथा सच्चाई के चित्रण के कारण यह फिल्म बहुत सफल रही फूलन देवी के रोल मे सीमा विश्वास ने बेहद संजीदा अभिनय किया जिसकी जितनी भी तारीफ की जाय कम है। फिल्म में विक्रम मल्लाह के रूप मे निर्मल पाण्डे तथा मुस्तकीम बाबा के रूप मे राजेश विवेक ने यादगार अभिनय किया इसी श्रंृखला मे 2007 मे एक अन्य दस्यु सुंदरी सीमा परिहार के जीवन पर आधारित फिल्म वून्डेड आई यह भारतीय फिल्म इतिहास की एक मात्र ऐसी फिल्म थी जिसमे पहली बार खुद एक दस्यु सुंदरी सीमा परिहार ने अपने ही ऊपर बनी फिल्म मे अभिनय किया बायोपिक श्रंृखला मे भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी और अन्र्तराष्ट्रीय धावक पान सिंह तोमर के दस्यु बनने की सत्य घटना पर आधारित 2012 में इरफान की पान सिंह तोमर आई जिसने कई फिल्मफेयर एवार्ड जीते 1998 मे भरत षाह की मल्टीस्टारर फिल्म चाइनागेट आई जिसमे एक नये कलाकार मनोज तिवारी ने खूंखार व क्रूर डाकू जगीरा का ऐसा शानदार अभिनय किया कि वह फिल्म में ओमपुरी, अमरीशपुरी, डैनी, नसीरूददीन षाह, परेष रावल जैसे दिग्गज कलाकारों पर भारी पडा़। डाकू के रूप मे षत्रुहन सिन्हा की हीरा व अमरीशपुरी की पांच कैदी सफल रही डाकू के रूप मे मिथुन दाता मे संजय दत्त जय विक्रान्त में, राजेन्द्र कुमार बलिदान में डाकू और जवान तथा मनोज कुमार में तथा अभिताभ बच्चन गंगा की सौगंध मे असफल रहे।