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बरसात की रात
July 13, 2019 • परिहार दम्पत्ती (रहस्य-रोमांच)

हमारा खानदान इलाहाबाद के उच्च कुलीन ब्राह्मणो मे से एक था, हमारे बाबा प. कैलाश नाथ झा रीवां के नाहरगढ रियासत के राजपुरोहित और राज ज्योतिषी थे दर्जनों रियासतों के राजा, बड़े अधिकारी और घनी सेठ हमारे जजमान थे कुण्डा रियासत की ओर से हमारे परिवार को शहर मे एक विशाल हवेली और गंगा के किनारे पांच गाँव मिले थे हमारे चाचा दीना नाथ झा इलाहाबाद के मशहूर बैरिस्टर थे, मैंने उन्ही के साथ हाईकोर्ट मे प्रैक्टिस करता था वे हमारे साथ ही हवेली मे रहते थे उनकी फालिज की बीमारी के कारण वकालत का सारा भार मुझ पर आ गया था कम समय मे ही मुझे पैसा और नाम मिल गया था, यह 1955 के बरसात की बात है। कई दिनों से आसमान पर बादल छाये हुये थे उस दिन दोपहर से ही बारिश हो रही थी रात 10 बजे का समय था अचानक शहर की लाइट गुल हो गई नौकर पेट्रोमैक्स रख कर चला गया, मैं खाना खाकर एक मुकदमे की फाइल देख रहा था, नींद आने लगी थी मैं सोने की सोच ही रहा था तभी टेलीफोन की घंटी घनघना उठी मैं झल्ला उठा कि कही इस तूफानी रात मे कही जाना ना पड़े यह सोच कर ही सिहरन सी दौड़ गई, बाहर तेज बारिश हो रही थी बादलों की गड़गड़ाहट के साथ बिजली की कड़क और तूफानी झोंकों मे बाहर निकलने की बात सोचना ही कष्टप्रद था, मैने फोन रिसीव किया दूसरी ओर एक भारी व गंभीर आवाज आई झा साहब मैं नाहरगढ रियासत का दीवान सत्यप्रकाश बोल रहा हूँ। महाराज की तबीयत बहुत खराब है। उन्हें बेहोशी के दौरे पड़ रहे है। वे आप से इसी समय अपनी वसीयत लिखवाना चाहते हैं। वैसे इस मौसम मे आपको कष्ट तो बहुत होगा लेकिन आप महाराज की मजबूरी समझकर हम पर मेहरबानी कीजिये हम आपके पुराने क्लाईंट है। अगर राजा साहब बिना वसीयत के मर गये तो पूरी रियासत बिखर जायेगी मैं आपको मुंहमांगी फीस दूँगा, मै भली-भांति जानता था कि रीवां की नाहरगढ रियासत के राजा हमारे पचीसों साल पुराने मुअक्विल थे उनके कई मुकदमों की पैरवी मैंने खुद की थी पेशे के प्रति ईमानदारी और निष्ठा के वशीभूत होकर मैं उन्हें मना नही कर सका। मैने कहा कि मैं अभी आता हूँ। उन्होंने बताया कि राजा साहब इस समय गोपालपुरा वाली कोठी मे है। जो इलाहाबाद रींवा रोड पर पुरानी तहसील की इमारत से दांयी ओर दो कि लोमीटर अंदर है आप पुरानी तहसील की इमारत के पास आ जाये जहाँ इमारत खत्म होती है वहाँ से दाहिने एक कंकड़ वाली रोड जाती है आप उस पर आगे बढेंगें तो आगे एक बड़ा सा पीपल का पेड़ मिलेगा उससे आगे बढकर दांयी ओर कच्ची सड़क है। उस पर आगे एक घनाबाग मिलेगा उसके बांयेे एक पगडंडी मिलेगी कुछ दूर पर लालटेन लिये हुये एक बुढ्ढा मिल जायेगा जो आपको बंगले तक पहुँचा देगा मैंने रास्ता समझकर रेनकोट, रेनहैट, दस्ताने पहने और ब्रीफकेस मे सरकारी वाटरमार्क, मोहर, टार्च लेकर रवाना हुआ मौसम की नजाकत को देखते हुये मैने कार के बजाय अपनी बीएसए मोटरसाईकिल लेना ठीक समझा बाहर निकल कर देखा तो मूसलाधार बारिश थम चुकी थी लेकिन हल्की बूंदाबादी अभी भी जारी थी हवा के तेज सर्राटे चल रहे थे बाहर मजे की ठंड थी हवा के झोंके बदन मे घुसते मालूम पड़ रहे थे। रोम रोम सिहर रहा था लेकिन जाना तो था ही पेशे की इज्जत और एक मरते हुये इंसान की अंतिम इच्छा का सवाल था रह-रह कर बिजली कड़क रही थी बादलों की कड़कड़ाहट से जमीन दहल रही थी किसी भी समय तेज बारिश शुरू हो सकती थी लेकिन इन सब बातों से बेपरवाह मै अपनी धुन मे चला जा रहा था शहर पीछे छुट गया था मैं हाइवे पर चल रहा था जहाँ स्ट्रीट लाइट का सवाल ही नही था दोनो तरफ घने पेड़ों की कतारें थीं कहीं-कहीं घने बाग व खेत थे। रात गहरा गई थी फिर वह बीहड़, मौसम, तेज तूफानी हवा, गहरा अंधेरा और चारों ओर सन्नाटा मैंने तहसील की इमारत के बगल से गाड़ी मोड़ी ही थी कि एक नई मसीबत आ गई गाड़ी की हेडलाइट अचानक बंद हो गई। शायद बल्ब फयूज हो गया था कंकड़ वाली सड़क बेहद उबड़-खाबड़ थी गाड़ी चलाने मे बड़ी दिक्क्त हो रही थी सड़क जगह जगह सें टूटी थी गढ्ढों मे पानी भरा था रह-रह कर गहरे घक्के लग रहे थे मुझे गाड़ी की रफ्तार काफी कम करनी पड़ी थी, मैं मोटर साईकिल चला कर पीपल के पेड़ के नीचे पहुँचा कि अचानक पेड़ के पत्तों मे भारी खड़खड़ाहट की आवाज हुयी जिसने मुझे बुरी तरह चैंका दिया मेरी दिल की धड़कन तेज हो गई। हुआ यह कि गाड़ी के शोर ने पेड़ पर बैठे गिद्धों के झुंड मे हलचल पैदा कर दी थी वे एक साथ फड़फड़ा उठे थे मैं मट्टी और कीचड़ से भरी सड़क से बाहर निकलकर बाग तक पहुँचा जहां सड़क खत्म हो गई थी, वहां से बांये ओर एक पगडंडी गई थी मैं उसी पर चलने लगा आखिर कुुछ दूर पर मुझे लालटेन की रोशनी दिखाई दी मैं वहां पहुँचने वाला ही था कि एक तूफानी झोंके के कारण एक बड़ा सा पेड़ हरहरा कर गाड़ी के ठीक सामने गिर गया अगर मै धीमी रफ्तार मे ना होता तो अब तक मौत के मुंह मे जा चुका था। मौत को सामने देखकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया किसी तरह मैं खुद को काबू करके पेड़ का चक्कर लगा कर लालटेन की रोशनी तक पहुँचा मुझे धोती कमीज व सदरी पहने सर पर पगड़ी लगाये एक लंबी दाढी वाला बूढा नजर आया उसके बांये हाथ मे लालटेन और दांये हाथ मे छाता था वह करीब आकर बोला आप ही वकील साहब है। हाँ आइये वह गाड़ी पीछे बैठ गया हवेली कितनी दूर है बस आ ही गये जल्दी कीजिये सरकार राजा साहब की हालत बेहद खराब है। बूढे बैठते ही एक विचित्र बात हुयी मोटरसाईकिल हवा से बात करने लगी जब कि खराब रास्ते और मौसम की नजाकत को देखते हुये मैं बहुत ही धीमी रफ्तार से गाड़ी चला रहा था सामने पगडंडी बांयी ओर मुड़ गई थी बूढे ने सामने एक इमारत की ओर इशारा करते हुये कहा लीजिये सरकार बंगला सामने है।
बंगला जो देखने मे बंगला कम भूतिया खण्डहर अधिक मालूम पड़ रहा था, कोठी एकदम उजाड़ थी दीवारों का जगह-जगह से प्लास्तर उखड़ा हुआ था हाते मे एक टूटा हुआ फव्वारा था दीवारों और बगीचे मे जगह-जगह पर उंची-उंची घास उग आई थी। मैने बंगले के सामने गाड़ी रोकी बूढा लालटेन उठाकर आगे चलता हुआ बोला आइये अंदर चलिये, मैं सोच रहा था कि इस वीरान उजाड़ से इलाके के इस भूतिया बंगले मे कोई कैसे रह सकता है बूढा मेरे मन की बात जानकर बोला हैरान ना हो वकील साहब यह हवेली राजा साहब के परदादा के दादा ने गदर के पहले बनवाई थे, वे बहुत बड़े राजा थे अब समय पलट गया है पुरानी शान-शौकत अब नही रही बिना देखभाल के सब गिरता जा रहा है। हवेली अंदर से बेहद डरावनी थी, माहौल की भंयकरता और रहस्यमयता मुझ पर हावी हो चली थी मुझे महसूस हो रहा था कि मेरा यहां आने का फैसला गलत था, मैं बिना वजह यहाँ फंस गया मेरा मन बार-बार कर रहा था कि मैं यहां से भाग जांऊ लेकिन फिर सोचता था यहाँ तक आ ही गया हूँ तो वसीयत का काम निपटा ही लूँ। हवेली अंदर से काफी शानदार थी धुसते ही एक काफी बड़ा हाल था जिसकी दीवारों पर हिरन, जानवरों की खालेें, शेर, चीते के पुतले पुराने जमाने की बंदुकें, तलवारें लगी हाल के मध्य मे एक चैड़ा जीना उपर जाता था उपर दांये बायें कई कमरे थे कमरे साफ सुथरे, भारी फर्नीचर और पुराने जमाने की बेशकीमती चीजों से सुसज्जित थे हवेली मे दर्जनों लैंप जल रहे थे हम लोग एक बड़े से कमरे मे पहुँचे, राजा साहब सामने विशाल मसहरी पर बेचैन से लेटे थे बगल मे एक टेबल पर कई दवाइयां रखीं थी बगल मे रियासत के दीवान, डाक्टर, पुरोहित और राजपरिवार के सदस्य खड़े थे मुझे देखकर राजा साहब ने आंखें खोलीं दीवान साहब ने मेरा स्वागत किया मुझे राजा साहब के बंगल मे पड़ी आराम कुर्सी पेश की गई कुछ औपचारिक बातचीत के बाद मैंने बैग से वाटरमार्क निकाले राजा साहब ने बहुत धीमी कांपती आवाज मे रूक-रूककर अपनी वसीयत लिखाई और वसीयत के हर पेज पर उन्होंने कांपते हाथों से दस्तखत किये गवाहों ने भी दस्तखत किये वसीयत की दो कापियां तैयार हुयी एक कापी लिफाफे मे सील करके दीवान साहब के पास सुरक्षित रख दी गई। सब काम निपटाकर मैं बाहर निकला तभी दीवान ने मुझे नोटों से भरा लिफाफा दिया मैं अभी हवेली ये बाहर निकला ही था कि हवेली के अंदर से रोने का शोर सुनाई दिया उसी बुढे ने आकर बताया कि राजा साहब चल बसे मैं वापस चल दिया पीपल के पेड़ से होते हुये तहसील की इमारत तक पहुँचा तभी तेज हवाओं ने भयानक आंधी का रूप धारण कर लिया मौसम अप्रत्यशित रूप से खौफनाक हो चला था तभी एक हष्ट-पुष्ट मोटरसाइकिल सवार ने मेरी मोटरसाईकिल को ओवरटेक किया और मेरे आगे आगे चलने लगा अचानक बूदंाबांदी भाीषण बारिश मे बदल गई हवायें और तेज हों गयी। सारे वातावरण मे तूफानी शोर होने लगा।
मै कही रूकने की सोच ही रहा था, लेकिन उस निर्जन मार्ग मे कोई उपयुक्त जगह नजर नही आ रही थी मैं किसी आबादी की तलाश मे था तभी किस्मत से कुुछ दूरी पर आबादी नजर आई। मेरा मन खुशी से खिल उठा। शायद कोई आसरा मिल जाये उसी समय एक दिल दहला देने वाली घटना घट गई अचानक एक बड़ी टीन की चादर आंधी मे उड़कर लहराती हुयी आई पास पहुँचते कुछ इस तरह घूमी कि एक ही झटके में आगे चल रहे मोटरसाईकिल सवार का सिर घड़ से जुदा हो गया खून का फव्वारा छूट पड़ा मोटरसाईकिल सवार का शीश विहीन सिर शरीर अभी भी पहले की तरह बढता जा रहा था उसका धड़ गाड़ी पर तन कर बैठा था, मुठ्ठियां हैडिल पर कसी थीं फिर करीब 60-70 फुट आगे जाकर सड़क के किनारे गाड़ी समेत गिर पड़ा मै यह भयानक नजारा देख कर अपने होश खो बैठा, जब मुझे होेश आया तो मैने खुद को रीवां जिले के जिला अस्पताल मे पड़ा पाया, डाक्टर ने बताया कि मोटरसाईकिल फिसलने से मेरा एक्सीडेंट हो गया था सिर और बांये पैर मे काफी चोटें आई थीं दायें हाथ की कलाई पर प्लास्टर चढ़ा था। एक लारी वाले ने मुझे सड़क पर बेहाश पाया तो वह मुझे अस्पताल मे भर्ती करा गया था, मैंने जब डाक्टर को रात मे हुयी घटना के बारे मे बताया वह मेरा मुंह देखने लगे दोपहर मे एक पुलिस इन्सपेक्टर दो सिपाहियों के साथ मेरा बयान लेने आया मेरा बयान सुनकर उन्होंने कहा कि या तो आपने शराब पी रखी होगी या फिर सदमे मे ऐसी बातें कर रहे है। मैंने खुद मौके पर मुआयना किया था मुझे मौके पर केवल आपकी मोटरसाईकिल के अलावा कोई दूसरी मोटरसाईकिल नही मिली ना कोई सरकटी लाश, और तो और वहां दूर-दूर तक सड़क से लगी कोई आबादी भी नही है। तो टीन उड़कर आने का सवाल ही नही होता है। अब आप बताइये कि आप रात के 3 बजे उस तूफानी रात मे वहां क्या कर रहे थे मैने उन्हें कल के फोन आने से लेकर बेहोश होने तक सारी आपबीती सुनाई मुझे शाम तक अस्पताल से छुट्टी दे दी गई मै। अपनी गाड़ी लेने पुलिस चैकी पहुंचा तो उन्होंने पुनः मुझसे पुलिसया अदांज मे कई सवाल पूछे जाहिर था कि उन्हें मेरी किसी भी बात पर यकीन नही था मैंने उन्हें ब्रीफकेस खोल कर वसीयत के कागज दिखाये तो यह देखकर मैं हैरान रह गया वाटरमार्क एकदम कोरे थे उन पर ना कोई तहरीर थी ना कोई किसी के दस्तखत। इन्सपेक्टर ने एक और रहस्योदघाटन करके मेरा दिमाग चकरा दिया आप जिस गोपालपुरा गांव मे राजा साहब की हवेली की बात कर रहे है। वहां कोई हवेली है, ही नहीं एक पुराना खण्डहर जरूर है जिसमे पचासों साल से कोई नही रहता है। लेकिन मैं भी अपनी बात पर अड़ा रहा तो वह खुद मुझे अपने साथ उस गाँव ले गये। वहाँ पीपल के पेड़, बाग, पगडंडी पर मेरी गाड़ी के पहियों के निशान मौजूद थे लेकिन हवेली की जगह गिरी हुयी दीवारों वाला खण्डहर खड़ा था जो मात्र मट्टी मलबे का ढेर था तभी खण्डहर का मुआयना करते मेरी मेरी निगाह एक सीलबंद लिफाफे पर पड़ी यह वही वसीयत वाला लिफाफा था जिसे मैंने रात मे दीवान साहब हो दिया था उसे देख कर इन्सपेक्टर साहब को यकीन हो गया कि मैं रात मे यहाँ आया था और मेरे साथ जरूर कुछ अनहोनी हुयी था पर क्या वह कुछ नही बता सके। अगले दिन मैं इलाहाबाद वापस आ गया मैंने नाहरगढ के पुराने सरकारी गैर सरकारी कागज देखे उनमे राजा मर्दन सिंह वल्द अजीत सिंह का कही कोई नाम नही था इसके कुछ महीने बाद मैं अपने एक मुव्वकिल सेठ गोविंददास की बेटी की शादी मे शामिल होने रीवां गया था वहा मेरी भेंट जिले की नाहरगढ़, रीवां रियासत के राजा सूर्य प्रताप सिंह से हुयी मैंने उन्हें उस रात की बात बताई वे भी हैरान रह गये उन्होंने बताया कि हमारा परिवार सौ-सवा सौ से रीवां मे रहता है। हमारी गोपालपुरा मे एक हवेली जरूर हुआ करती थी जो सौ-सवा सौ पहले गिर गई थी, कुछ समय बाद राजा साहब मेरे पास किसी काम से आये तो उन्हांेने बताया कि कुछ दिन पहले उन्होंने रियासत के पुराने कागज निकलवाये थे तो पता चला कि उनके खानदान मे छह पीढ़ी पहले राजा मर्दन सिंह वल्द अजीत सिंह हुये थे, उन्होंने 1814 से 1835 तक राज किया था। वे गोपालपुरा की हवेली मे रहते थे 80 वर्ष की उम्र मे बरसात कर एक तूफानी रात मे उनका देहांत हुआ था गाँव वालों का कहना है कि आज भी कभी-कभी किसी तूफानी बरसात की रात मे वो दिखाई देते है।
यह रहस्य-रोमांच कहानी पूर्णतः कालपनिक है