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बागी कलमें
July 27, 2019 • पुस्तक समीक्षा

हिन्दुस्तानियों ने विदेशी फिरंगियों की गुलामी को कभी दिल से कबूल नही किया, वे समय-समय पर जो भी साधन मिला उससे ब्रिटिश शासन का विरोध करते रहे। भारतीय लेखक और कवि भी इस मुहिम में पीछे नही रहे उन्होंने ना केवल गुलामी और अन्याय के खिलाफ कलम चलाई बल्कि वे सरकारी दमन, जब्ती, फर्जी मुकदमों व काला पानी तक की सजा के शिकार बने इसी विशय पर युवा लेखक डाॅ. नरेन्द्र शुक्ला ने जो नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय से संबधित रहे हैं। अंग्रेजों द्वारा जब्तशुदा साहित्य पर एक रोचक, ज्ञानवर्धक और शोधपरक पुस्तक लिखी है। पुस्तक की सामग्री उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय व राजकीय अभिलेखागारों, संग्रहालयों तथा पुस्तकालयों से ली है। पुस्तक 10 अध्यायों में विभाजित है। प्रथम अध्याय कालीदास पत्रिका के संपादक कृष्ण जी आब जी के विद्रोही लेखों पर आधरित है अंय अध्यायों मे पंजाब के तत्कालीन पत्र, पत्रिकाओं, इलाहाबाद से प्रकाशित स्वराज्य पत्र, दिल्ली से प्रकाशित हैदर रजा खान का पत्र आफताब, स्वरसती पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी, तपस्वी मोहन के राष्ट्रीय चेतना फैलाने वाले नाटकों, गोरखपुर से प्रकाशित स्वदेश के विजयादशमी अंक, लखनऊ से प्रकाशित  दुलारे लाल भार्गव की पत्रिका सुधा के लेखों तथा राहूल सांस्कृतायन की पुस्तक 'क्या करें के अंशों का वर्णन है पुस्तक मे इन पत्रिकाओं मे छपी सामग्री तथा उस पर हुयी ब्रिटिश कार्यवाही का विस्तृत वर्णन है। पुस्तक की सामग्री दुर्लभ, अप्राप्य और ज्ञानवर्धक है। पुस्तक की भाषा सरल व पठनीय है।