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बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
September 8, 2019 • युवामित्र ‘सहायक संपादक’

श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है।
मित्रों, आज हम श्रीमद्भागवत कथा महात्म्य से भगवान् शंकरजी और माँ पार्वतीजी के एक चरित्र का चिन्तन करेंगे, भोलेनाथ शिवजी माँ पार्वतीजी से कहते है देवी! यह भागवत कथा अगर मिल जाये तो बिना कुछ किये, मुफ्त में भव सागर से पार हो जायेंगे, देखिये भाईयों अगर अपने शहर से किसी दूसरे शहर में जाना है तो पैसा खर्च होगा, किराया लगेगा अथवा आपकी गाड़ी है तो तेल का खर्च हो जायेगा।
अर्थात जगत की एक किलोमीटर से लेकर विदेश तक हजारों किलोमीटर की दूरी के लिये पैसा खर्च करना ही पड़ेगा, पर जगत से लेकर जगदीश के धाम तक की जो करोड़ों किलोमीटर की दूरी है, अगर हमें उस दूरी को तय करना है तो फूटी कोड़ी भी खर्च करने की जरूरत नहीं, बस सत्संग रूपी नाव में बैठो और 'बिनुहि प्रयास होहि भव भंगा' बिना कुछ किये हम भव सागर से पार हो जायेंगे।
पार्वतीजी ने यह सब शंकरजी से सुना तो कहा, पतिदेव यह सत्संग, यह प्रभु की कथा तो बहुत बढ़िया है, जो मुफ्त में पार लगाती है पर इस कथा को कितना सुनना पडेगा? इसका समय भी तो बतायें, क्योंकि जगत तो बहुत व्यस्त हैं, सात दिन की भागवत कथा, नौ दिन की राम कथा इतना समय लोगों के पास कहाँ हैं।
शिवजी बोले देवी आप नौ दिन की बात करती है, लोगों के पास तो नौ मिनिट भी नहीं है, तो कितनी सत्संग सुननी पड़ेगी? बोले देवी ज्यादा सुनने की जरूरत भी नहीं है, कितनी सुने? शिवजी ने बताया! हमारे आँखों की पलक झपकने मात्र की सत्संग भी सुनलें तो भी तो भव-सागर से पार हो जायेंगे।
निमिष दण्ड भरि एकहुँ बारा।
सत्संगति दुर्लभ संसारा।।
तब पार्वतीजी ने कहा, पतिदेव तब तो ऐसी कथा में सब आते होंगे, कथा में दुनिया उलटती होगी? शिवजी बोले, नहीं देवी सब कहां आ पाते हैं, सब नहीं आते? क्यों पतिदेव? कोई पास-सिस्टम है क्या? सब क्यों नहीं आ पाते? शंकरजी बोले देवी क्यों कि ऐहिं सर निकट न जाइ अभागा यहाँ अभागा नहीं आ सकता केवल सभागा ही आ सकता है, यहां आने में बहुत सारी कठिनाईयाँ हैं, क्या कठिनाईयाँ है? शिवजी बताते है।
आवत ऐहिं सर अति कठिनाई, राम कृपा बिनु आई न जाई।
गृह कारज नाना जंजाला, ते अति दुर्गम सैल बिसाला।।
यहाँ आने में बहुत सारी कठिनाईयाँ है, गृह कारज नाना जंजाला घर के कामकाज इतने है कि उसी से फुर्सत नहीं मिलती है तो कब कथा सुने? और घर के काम-काज कैसे हैं? ते अति दुर्गम सैल-बिसाला जैसे हम बद्रीनाथ जाते है तो जब ऊपर चढते है पहाड़ आता है, थोड़ा चलने पर वह पहाड़ समाप्त हो जाता है तो ऐसा लगता है कि अब तो पहुँच गये लेकिन फिर पहाड़ आ जाता है।
ऐसे वहाँ पहाड़ पर पहाड़ आते ही रहते है ठीक उसी प्रकार घरों में भी काम पर काम आते ही रहते हैं, एक काम समाप्त हुआ नहीं कि दुसरा काम आ जाता है, और बहुत जरूरी काम होता है कि यह काम तो करना ही पड़ेगा, लोग सोचते हैं कि यह काम निपटा लें तो कथा में चलेंगे, यह काम निपटा लें तो कथा में चलेंगे, काम तो कभी निपटेंगे नहीं, तुम जरूर निपट जाओगे।
लोग कहते है न कथा में कल चलेंगे, कल चलेंगे, कल-कल करते काल आ जाता है, न कहीं आना होता है न कहीं जाना होता हैं, बहुत सारी कठिनाईयाँ है जिसके कारण हम सत्संग में नहीं आ पाते, आप सोचेंगे कि दो दिन हो गये कथा में जा नहीं सके आज तो चलना ही है, और जैसे ही आप घर से बाहर निकलेंगे और दरवाजे के ताला लगायेंगे तभी कोई मेहमान आ जायेंगे। मेहमान कहेंगे कथा तो सात दिन चलेगी हम तो दो घंटे में वापस जा रहे है, और मेहमानों ने रोक लिया, आपने सोचा चार दिन हो गये नहीं जा पाये आज तो जरूर चलना है, और जैसे ही आप घर से बाहर निकलोंगे पड़ौसी मिल जायेगा, कहेगा कहाँ जा रहे हो साहब? आप कहोगे हम तो श्री कृष्णजी की कथा में जा रहे है या श्री रामजी की कथा में जा रहे है तो पडोसी कहेगा कि अरे वहाँ कृष्ण कथा में और राम कथा में पड़ा ही क्या है? वही कृष्ण और कंस की लड़ाई है, राम कथा में राम और रावण लड़ाई है, वो तो तुम्हारे घर में ही होती रहती है तो वहाँ जाके क्या देखोंगे? तो पड़ौसी ने रोक लिया, नहीं आ पाये कथा में, तो कितने संकट हैं, यहाँ आने में कितनी कठिनाईयाँ है, तो पार्वतीजी ने कहा पतिदेव तब तो कोई नहीं जाता होगा कथा में, घर-परिवार तो सबके हैं, काम-काज तो सबके है तो कौन आयेगा कथा में? 
शिवजी बोले नहीं देवी ऐसी बात नहीं है, आते हैं, पर कौन आते हैं? जिस पर भगवान की अति कृपा होती है वहीं यहाँ आ सकता है, तो यह स्पष्ट कर दिया शास्त्रों ने कि बिना प्रभु-कृपा के सत्संग, प्रभु की कथा प्राप्त नहीं हो सकती, अगर आप पर प्रभु की अनुकम्पा नहीं है तो आप कथा के पण्डाल तक पहुंच कर भी कथा का श्रवण नहीं कर पाओगे, क्यों? 
क्योंकि जब कथा स्थल में प्रवेश होने को है और आपके घर से फोन आ गया कि फलाने हास्पिटल पहुँचों, कोई अपने ही किसी का एक्सिडेंट हो गया है, भगवान् की कृपा नहीं इसीलिये यहाँ तक पहुंच कर भी कथा का रसास्वादन नहीं कर पाया, इसलिये भाई-बहनों! भगवान् की कृपा के बिना कोई प्रभु का नाम भी नहीं ले सकता।
अति हरि कृपा जाहिं पर होई, पाँव देईएं मारग सोई।
बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
सत्संग बिना प्रभु कृपा के नहीं मिल सकता है इसलिये हमें सोशल मीडिया से सुन्दर अवसर प्राप्त हुआ है, ईश्वर की कृपा से हम पौराणिक कथा, आध्यात्मिक चिंतन और मनन, प्रभु श्री रामजी, कृष्णजी, शिवजी के चरित्र का सत्संग और भक्ति को सोशल मीडिया से पढ रहे हैं, सुन रहे हैं, यह भी भगवान् की कृपा ही हैं।
जैसे चुनाव जब होता है तो आप लोग अपने ही किसी के बीच के व्यक्ति को चुनते हैं और मत प्रदान करते हैं, ऐसा ही होता है न! कि इलेक्शन में आप जिसे इलेक्ट्र करते है वह इलेक्टेड व्यक्ति एसेम्बली में जाकर बैठता है, उसी प्रकार भगवान् भी चुनाव करते हैं, वहाँ इलेक्शन होता है और यहाँ सलेक्शन होता है, भगवान ही चयन करते हैं।
फर्क है तो सिर्फ इतना कि आप जिसे इलेक्ट करते हैं वह लोकसभा या राज्यसभा  में जाकर बैठता है, और भगवान् जिसे सलेक्ट करते हैं वह सत्संग सभा में आकर बैठता हैं, हम सब ईश्वर के द्वारा चयनित है, यही बात भगवान् शिवजी माँ श्री पार्वतीजी से कह रहे हैं, भागवत् कथा के बारे में शिवजी कहते हैं कि भागवत् कथा कोई खेल-तमाशा नहीं है, यह कोई मनोरंजन भी नहीं है।
कथा तो भगवान का साक्षात् स्वरूप है इसलिये जो लोग ऐसा सोचकर कथा सुनते हैं कि चलो बैठे-बैठे क्या करें जरा कथा में चले जाते हैं थोड़ा टाईम पास हो जाएगा, वे लोग अपराध करते हैं, अरे भाई भागवत् तो भक्ति अनुष्ठान हैं, भगवान का वांगमय स्वरूप श्रीमद्भागवत कथा हैं, यह हम नहीं कह रहे हैं, यह तो पार्वतीजी से भोलेनाथ कह रहे हैं।
श्रीमद् भागवताख्योयं प्रत्यक्ष कृष्ण एव हि जब भगवान श्री कृष्ण अपनी लीला समाप्त करके मृत्यु लोक से गौलोक धाम जाने लगे तो उद्धवजी भागवान के पास आये, प्रणाम करके बोले कि प्रभु! आप तो जा रहे हैं हमे छोड़कर, भगवान बोले, उद्धव! न तो मैं कहीं आता हूँ, न मैं कहीं जाता हूँ, जब मैं लोगों को दिख जाता हूँ तो लोग बोलते है भगवान आ गये और जब नहीं दिखता हूँ तो लोग बोलते हैं भगवान चले गये, बाकी मेरा आना-जाना होता ही नहीं हैं। तो उद्धवजी बोले प्रभु आप जब नहीं दिखोगे तो हम संसारियों का क्या होगा, हम आपका दर्शन कैसे करें? प्रभु! कुछ तो उपाय करें, तब भगवान ने उद्धवजी से कहा कि यह जो भागवत है इसमें मैं वाणी के रूप में प्रविष्ट हो जाता हूँ, आज से यह भागवत मेरा वांगमय स्वरूप माना जायेगा और यह भागवत कोई पोथी नहीं है, भागवत कोई पुस्तक नहीं है बल्कि श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष वांगमय स्वरूप हैं, अतः भाई-बहनों, भागवतजी का श्रवण करों।
यह बात भगवान् श्री कृष्णजी ने अपने मुखारविन्द से उद्धवजी से कहीं, और यहीं बात माँ पार्वतीजी को शंकरजी बता रहे हैं।
हर हर महादेव!
हरि ओऊम् तत्सत