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मशीन का रहस्य
June 22, 2019 • एन.एस. मेहता

आॅरफीशियस दावा करता था वह ऐसी मशीन बना सकता है जो बिना किसी ईधन के अपने आप चल सकती है। किन्तु इस दावे के बदले उसे सम्मान नही बल्कि लोगांे की घृणा मिली उसका जन्म सन् 1780 को जर्मनी में हुआ था। उसने 36 साल की उम्र मे लोगों की प्रताड़ना से परेशान होकर वह जर्मनी की रियासत हेस केसिल आ गया था, हेस केसिल के काउंट कार्ल ने उसका सम्मान करते हुये उसे ऐसी मशीन बनाने का आदेश दिया 1717 में उसने मशीन तैयार कर ली काउन्ट ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन के उनके मित्र विलेम ग्रैब्सेंड तथा आस्ट्रिया के शाही वैज्ञानिक बेरेन फिशर को उस मशीन की जांच के लिये बुलाया आॅरफीशियस ने वैज्ञानिको से कहा कि आप मेरी मशीन के भीतरी भाग को तब तक नही देख सकेगें जब तक मुझे मेरी मशीन की कीमत नही मिल जाय, बिना कीमत के मैं इस मशीन का रहस्य किसी को नहीं बताऊगा काउंट के किले के एक पत्थर के उंचे अंधेरे कमरे मे मशीन रखी थी कमरे के बीचो-बीच 12 फुट ऊचा व 2 फुट मोटा व भारी भरकम एक पहिया था जो जमीन से आठ दस इंच ऊपर था इसका घूरा एक मशीन से जुड़ा था मशीन बहुत बड़ी नही थी मशीन पूरी तरह कपड़े से ढकी है। कई लालटेन की रोशनियों में वैज्ञानिको ने मशीन का गहन निरीक्षण किया मशीन मंे से जुड़ा जमीन या फर्श पर कोई पट्टा नहीं था वैज्ञानिको के कहने पर आॅरफीशियस ने पहिये को हाथ के घक्के से घुमा दिया और मशीन चालू हो गई वैज्ञानिको ने घड़ी देखकर पाया कि पहिया एक मिनट मे छब्बीस चक्कर लगा रहा है। वैज्ञानिको ने उससे मशीन रोकने का तरीका पूछा तो उसने कहा कि पहिये पर हाथ रखने से मशीन रूक जाती है वैज्ञानिको ने हाथ रखा तो मशीन रूक गई उन्होंने आॅरफीशियस से कहा जो मशीन केवल हाथ रखने से रूक जाय उससे कोई काम नही लिया जा सकता है और हो सकता है कि मशीन के अंदर कोई आदमी बैठा हो। प्रोफेसर ने मशीन का मुआयना करते-करते अचानक मशीन पर एक चुटकी नसवार फेंक दी ताकि कोई आदमी अंदर छुपा हो जो बाहर आ जाय किन्तु मशीन से कोई आदमी बाहर नही निकला उन्होंने पूछा मि. आॅरफीशियस मशीन कितने दिनों तक चल सकती है तो उसने जवाब दिया क्योंकि इसमे कोई ईधन नही लगता है। अतः यह महीनों, वर्षो, सदियों तक चल सकती है। तीन दिनों तक वैज्ञानिकांे ने मशीन की पूरी जांच की इस दावे को परखने के लिये 12 नवम्बर 1717 को मशीन चला दी गई कमरे को बंद करके दरवाजों के ताले पर वैज्ञानिको ने अपनी सील लगा दी आठ सप्ताह बाद 4 जनवरी 1718 को बेरेन व प्रो. ग्रेव्सेंड ने सील तोड़कर ताला खोला व कमरे में जाकर देखा कि मशीन का पहिया उसी गति से चल रहा है। वैज्ञानिक चमत्कृत रह गये प्रो. से पहिये पर हाथ रखा और मशीन रूक गई उन्होंने पूछा यह कौन सा सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त मैं आपको कीमत मिलने पर बता दूँगा। इस रहस्य की क्या कीमत मांगते हो। 20,000 ब्रिटिश पौंड। अरे यह कीमत तो बहुत ज्यादा है। प्रो. ग्रेव्सेंड ने इस संबध मे प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन को पत्र लिखा तभी इसमे एक ऐसा मोड़ आया जिसने सारा बना बनाया खेल बिगाड़ दिया दरअसल रकम आने मे देर हो गई आॅरफीशियस को शक होने लगा कि वे दोनों वैज्ञानिक उसे टाल रहे हैं। उसे उसकी मुँह मांगी कीमत नही मिलेगी वे लोग मुफ्त में ही उसका राज जान जायेंगे जैसे-जैसे समय बीतता गया उसका संदेह और पागलपन बढ़ता गया एक रात आॅरफीशियस ने मशीन को भारी हथौड़े से तोड़ डाला उसे रोकने और कैद करने की बड़ी कोशिश की गई लेकिन वह किसी के हाथ नही आया और घने जंगलों मे भाग गया सैकड़ों आदमियों ने उसकी हफ्तो तलाश की किन्तु उसका कुछ पता नही चला इस सच्ची और प्रामाणिक घटना पर उन दोनों वैज्ञानिको ने काफी कुछ लिखा उनके अन्य वैज्ञानिकों को लिखे पत्र भी इस घटना के प्रमाण है। इस घटना पर कई किताबें भी लिखी गयीं जो बाजार मे उपलब्ध है। ना जाने आॅरफीशियस को प्रकृति के कौन से रहस्य का पता चल गया था जिसके आधार पर उसने ऐसी मशीन बना डाली। सोचने की बात है इतनी वैज्ञानिक प्रगति हो जाने के बाद भी आज तक ऐसी मशीन न बन सकी ना बनने की संभावना है। वो कौन सा रहस्य था कोई नही जानता।