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मेरा नाम कंचनलता है
September 30, 2019 • धीरेन्द्र सिंह परिहार रहस्य-रोमांच

मैं और सुब्रोतो मुखर्जी लंदन के किंग एडवर्ड मेडिकल कालेज के क्लासमेट थे मैं आदित्य नारायण झा पटना का निवासी था, मेरे पिता आनंद नारायण झा पटना हाईकोर्ट के मशहूर बैरिस्टर थे, सुब्रोतो बंगाल के नदिया जिले का निवासी था पर उसका परिवार कई दशकों से कलकत्ता में अपनी खानदानी कोठी मे रहता था सुब्रोतो के पिता नारायण मुखर्जी नदिया जिले के बहुत बड़े जमींदार थे पर पिछले बीस सालों से अजीबो-गरीब बीमारी से परेशान थे, हमारे थर्ड ईयर के पेपर हो चुके थे कालेज बंद होने वाला था हम लोग अपने घर लौटने की सोच ही रहे थे तभी सुब्रोतो के घर से तार आया कि पिता जी तबीयत बहुत खराब है। तुरंत घर आ जाओ तार पाकर सुब्रोतो घबरा गया मैंने उसे ढाढस बंधाया चिन्ता ना करो सब ठीक हो जायेगा उसने मुझसे रिक्वेस्ट की कि मैं भी उसके साथ कलकत्ता चलूँ जिससे उसकी हिम्मत बंधी रहे, मैं उसे मना नही कर सका मैंने अपने घर सूचना दी कि मैं महीने भर के लिये दोस्त के घर कलकत्ता जा रहा हूँ लौटकर घर आऊंगा अगले हफ्ते हम कलकत्ता पहुंचे जहाँ के चायना टाउन ईलाके मे उसकी विशाल दुमंजिली शानदार कोठी थी घर का माहौल बड़ा उदास था सबने हमारी खूब खातिरदारी की शाम को हम उसके पिता से मिले उस समय उनकी तबीयत कुछ सुधरी हुयी थी, उन्हांेने मेरा हालचाल पूछा पर वे जीवन से काफी निराश नजर आ रहे थे, मैंने उन्हें काफी हिम्मत बंधायी पर उनकी निराशा कम नही हुयी बाद मंे मैंने सुब्रोतो से उनकी बीमारी के बारे मे पूछा तो, वह बोला मै तो ज्यादातर बाहर ही रहा हूँ मां और नरेन्द्र भईया ही असली बात बता सकते हैं। शाम की चाय के वक्त मैंने सुब्रोतो की मां से पिताजी की बीमारी के बारे मे पूछा तो उन्होने बताया कि आज से बीस साल पहले उनके साथ एक डरावना और भयानक हादसा पेश आया था उन दिनों हम लोग अपने गांव धर्मपुरी की हवेली मे रहते थे एक बार सावन के महीने मे नरेन्द्र के पिता जमींदारी के काम से बग्गी से कलकत्ता जा रहे थे जाना दोपहर मे था पर दिन भर भारी बरसात होती रही जिससे निकले निकलते शाम हो गई उन्के साथ उनके मुनीम अखिल चन्द्र बोस दो नौकर चेतराम, हरीराम और कोचवान कन्हैया भी थे आसमान पर बादल छाये हुये थे कुछ ही देर मे घना अंधेरा फैल गया रास्ते के दोनो ओर घने पेड़ों की कतारों ने माहौल और डरावना बना दिया था चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था दूर-दूर तक कोई नजर नही आ रहा था, ना आदमी ना, आदमजात। तभी तेज गरज के साथ मूसलाधार बारिस शुरू हो गई चारों ओर ओर केवल बारिस का शोर था पहले जमींदार साहब ने वहीं ठहरने की सोची पर मुनीमजी ने कहा, यहां खुले में ठहरने का कोई मतलब नही है। दो मील आगे नवाबी दौर का पुराना चुंगीघर है, जरूरत पड़ी तो वही रात गुजार लेंगे तभी आधा मील चलने पर उन्हें रास्ते पर एक जगह लालटेन की रोशनी दिखाई दी पास जाने पर पता चला कि एक बैलगाड़ी कलकत्ता से आ रही थी जिसका पहिया टूट गया था गाड़ी में बेलारी गांव के जमींदार की बड़ी बहूरानी अपने दो नौकरों के साथ ससुराल जा रही थी पहिया इतनी बुरी तरह टूटा था कि नया पहिया लगाये बिना गाड़ी का चलना नामुनकिन था जमींदार साहब ने बहूरानी से बात की तो उसने अपना परिचय देते हुये आनंद बाबू से उसको उसके ससुराल पहँुचाने की प्रार्थना की। उन्होने मुनीम जी और हरीराम को वहीं छोड़ा और अपनी बग्गी से बहूरानी, उनके एक नौकर और चेतराम को लेकर बेलारी की ओर चल दिये हरीराम ने बताया था बड़े मालिक के जाने के कुछ समय बाद अचानक बैलगाड़ी की लालटेन बुझ गई भयानक अंधेरा छा गया हाथ को हाथ नही सूझ रहा था साथ दूसरी गाड़ी के चालक नौकर की आवाजें आनी भी बंद हो गई हम लोग कुछ भी समझ पाते उसके पहले एकाएक भारी गर्जना के साथ आसमान मे बिजली कड़की उस रोशनी मंे जो हमने देखा उस देखकर भय के मारे हमारे होश फाख्ता हो गये ना वहां बैलगाड़ी भी था, ना वह लोग, तभी मुनीम ने ऊपर देखा वह भय से चीख पड़े मैंने उधर देखा कि सामने वाले पेड़ पर बहूरानी व उनके नौकरों की लाशें जमीन से करीब 30-40 हाथ उपर हवा मे उलटे लटकी हुयी हैं बहूरानीे ने सफेद साड़ी ब्लाउज पहन रखी थी उनके लंबे काले बाल उलटे हवा मे उड़ रहे थे तीनों की मृत आखें हमे घूर रही थी फिर मुनीम जी की चीख सुनाई सनाई दी मैने देखा के उनकी आखें मारे डर के फटी जा रही थीं वे बुरी तरह कांप रहे थे उनके मुँह से खून बह रहा था वे अपना सीना दबाये कराहते हुये जमीन पर गिर पड़े जब मैं उनके पास पहुचा तबतक वे मर चुके थे उसी समय मुझे अपने पीछे किसी युवती की दर्दनाक चीख सुनाई दी मैं पलटा तो सामने पूरे सफेद कपड़े पहने एक 18-20 साल की लड़की की लाश हवा मे खड़ी दिखाई दी उसके पैर उलटे थे तभी मुझे चक्कर आया उसके बाद मुझे खुद को अस्पताल मे पाया बयान देने के तीन घंटे बाद हरीराम मर गया उसके बात पर किसी ने यकीन नही किया सुब्रोतो के पिता लौटे तो वे आधे पागल हो चुके थे हवेली पर मनहूसियत और मौत की दहशत छा गई हवेली शाम होते ही अजीब से सन्नाटे और खामोशी मे डूब जाती थी रात मे कभी किसी के नाचगाने की आवाजें आने लगी ढूंढने पर कोई नजर नही आता था कभी हवेली के नौकरो तथा घरवालों को सफेद कपड़े पहने एक लड़की की लाश हवा मे खड़ी दिखाई देने लगी उसके पैर उलटे थे जिसे हवेली मे दो नौकरों ओर आनंद बाबू के छोटे भाई ने खुद देखा पर वे सब अगले दिन मरे पाये गये, एक-एक करके हवेली के नौकर चाकर मुंशी मुनीम बंधु संबधी सब भाग गये हम लोग भी करीब बीस बरस पहले वहां से आकर कलकत्ता मे रहने लगे यहां आकर भी आनंद बाबू की तबीयत मे कोई सुधार नही हुआ उन्होने लोगों से मिलन-जुलना बंद कर दिया रात रातभर उन्हें नींद नही आती थी उन्हे रात मे कभी किसी के नाच-गाने की आवाजें आती तो कभी सफेद कपड़े पहने एक लड़की की लाश हवा मे खड़ी दिखाई देती घर मे किसी और को ना कोई आवाज सुनाई देती ना कुछ दिखता डाक्टरों ने इसे दिमागी रोग बताया डाक्टरी के अलावा हकीम वैद्य मुल्ला तांत्रिक का भी ईलाज चला पर रत्ती भर भी फायदा नही हुआ मेडिकल का छात्र होने के कारण मैं और सुब्रोतो भूत-प्रेत नहीं मानते थे हमंे यकीन था कि समस्या की जड़ गाश्व की हवेली मे ही है। अतः वहां जाना अनिवार्य था गांव जाने का हमारा फैसला सुनकर घर में सबने खुब हंगामा किया सुव्रोतो की मां का तो बुरा हाल था सबके विरोध के बावजूद भी हम धर्मपुरी गये वहां सुब्रोतो के रिश्तेदारों ने हमारा स्वागत सत्कार किया अगले दिन हम स्थानीय पुलिस चैकी गये जो धर्मपुरी से दो मील दूर नदिया कलकत्ता राजमार्ग पर थी वहाँ का इन्चार्ज धर्मपुरी गांव का ही निवासी निकला उसे बीस साल पहले हुये हादसे की कोई खास जानकारी नहीं थी, उसकी जानकारी भी गांव मे फैले भूत-प्रेत के किस्सों तक ही थी, उसने अगले दिन बुलाया अगले दिन पहुँचने पर उसने हमें बीस साल पुराने रेकार्ड मे दर्ज एफ.आई.आर. और फाईनल रिपोर्ट की काॅपी दी जिसके अनुसार 22 जुलाई सन् 1923 को एक स्थानीय किसान ने चैकी मे सूचना दी कि कलकत्ता नदिया हाईवे पर दो आदमियों की लाशें पड़ी है जिनकी शिनाख्त धर्मपुरी के जमींदार आनंद मुखर्जी के मुनीम अखिल चन्द्र बोस और उनके नौकर हरीराम के रूप मे हुयी जिनमे हरीराम बेहोश था, उसे ईलाज हेतु अस्पताल भेजा गया जहां अगले दिन वो कुछ घंटे के लिये होश मे आया पर शाम होते-होते चल बसा, उसने मरने से पहले जो बयान दिया वो एक अजीबो-गरीब पहेली बनकर रह गया, पोस्टमार्टम की रिर्पोट भी बड़ी रहस्यमय थी उसी दिन बेलारी गांव के कुछ लोग बैलगाड़ी से दो आदमियो को लेकर पुलिस चैकी आये जिनमे से एक अर्धबेहोशी की हालत मे आनंद बाबू थे, दूसरे उनका नौकर चेतराम था गांव वालों ने बताया कि उन्हें यह लोग गांव के बाहर दायीं ओर वाली भूतिया हवेली के सामने मिले थे सो वे इन्हें पुलिस चैकी ले आये चेतराम मर चुका था उसकी मौत भी ठीक वैसे ही हुयी जैसे मुनीम जी और हरीराम की उन उसकी मौत हार्ट फेल से हुयी थी उनकी आँखें दहशत से फटी हुयी थी लगता था कि मरने से पहले उन्होंने कोई बेहद खौफनाक चीज देख ली थी आनंद बाबू की बग्गी और और कोचवान का कोई पता नही चला कि उसे जमीन निगल गई या आसमान खा गया बयान में हरिराम ने वही बात बताई थी कि जो सुब्रोतो की मां ने हमे बताई थी पर आनंद बाबू के साथ क्या हुआ यह कोई नही जान सका पुलिस वालों ने बेलारी गांव की भूतिया हवेली का सर्वे किया जहंा उन्हें कोई खास चीज नही मिली बस आनंद बाबू का ऐनक और जेब घड़ी मिली जिससे पता चलता था कि वे यहां आये जरूर थे गाश्व वालों ने बताया कि हवेली भूतिया है। यहां दिन में भी कोई नही आता है, हवेली में एक प्रेतनी रहती है। जो कभी-कभी रात में वहां भटकने वाले युवको या मुसाफिरों को अपना शिकार बनाती है। अगले दिन उस अभागे की लाश ही मिलती है। कभी-कभी बरसाती की अंधेरी रात मे हवेली पूरे शानो-शौकत से जगमगा जाती है। जैसे राजमहल मे नाच हो रहा हो कभी-कभी अंधंरे मे डूबी हवेली से किसी के नाच-गाने की या किसी औरत के रोने की आवाज आती है। पर देखने पर अंधेरे के सिवा कुछ नही दिखता है हमने जब पुश्तैनी बंद पड़ी हवेली मे रहने की बात की सब रिश्तदारों और गांव वालों ने हमे खूब रोका पर जब हम नही माने हवेली की सफाई करवा गई दुमंजिले पर एक कक्ष मे हम दो पलंग लगा दिये गये सुरक्षा की दृष्टि से हमने एक राइफल और बड़ी टार्च ले ली हवेली के पास कुछ हथियारबंद नौकर व गांव वाले भी सोये मैं और सुब्रोतो बड़ी देर तक ईधर-उधर की बातें करते रहे, फिर सो गये कुछ देर बाद कुछ अजीब सी आवाज सुनकर मेरी नींद खुल गई तो, लालटेन की हल्की रोशनी मे मैंने देखा कि सुव्रोतो पलंग पर बैठा थर-थर कांप रहा है। मैंने पूछा बात क्या है, उसने फुसफुसा कर कहा गाने की आवाज मैने ध्यान लगा कर सुना तो सचमुच कहीं दूर से किसी के युवती के सुरीले गाने की मधुर आवाज आ रही आवाज एकदम साफ थी बात सच थी, हमने बंद खिडक़ी से ही टार्च मारकर दूर-दूर देख तक देखा सिवाय खेतों व पेड़ों के कुछ नजर नही आया बीच-बीच मे बाजों की आवाज भी सुनाई दे रही थी तभी लगा कि आवाज छत पर कोई कोई औरत नाच रही है। तबला और सारंगी भी बज रही है अचानक सन्नाटा छा गया करीब आधे घंटे बाद किसी औरत के रोने की आवाज आने लगी सुब्रोतो ने दरवाजा खोल कर छत पर जाना चाहा पर मैंने उसे रोकते हुये कहा मालूम नही है, इसी आवाज का आवाज का पीछा करते हुये चाचाजी और कई नौकर मर चुके हैं। हम लोग अपने बिस्तरों पर दुबके दुर्गाजी का जाप करते रहे। फिर सबेरा हो गया हमे सकुशल देखकर सबने चैन की सांस ली हमने रात की घटना का किसी से जिक्र नही किया दोपहर को हम लोग लोग तांगे से बेलारी गांव पहुँचे जा धर्मपुरी से करीब-करीब सात-आठ मील दूर था, गाश्व के बाहर एक टीले पर हमे एक जर्जर खंडहर दिखाई दिया जिसका काफी भाग गिर चुका था हमने पास ही एक चाय की दुकान पर चाय-नाश्ता लिया और पान की दुकान पर पान लेकर पूछा भाई यह खंडहर किसका है दुकानदार बोला बाबूजी वो जगह भूतिया है बड़े-बूढे बताते हैं कि बहुत बरस पहले वो कलकत्ता के किसी सेठ का मकान था, जो उन्होंने किसी नाचने वाली महबूबा को दिया था, जो बला की खूबसूरत थी और अपनी माँ के साथ रहती थी। राजा और वेश्या भला कभी किसी के हुये है, वह सेठ की गैरहाजिरी मे अपने किसी आशिक के साथ इश्क लड़ाने लगी, सेठ को जब इस बात की खबर लगी तो उसने एक बरसात की तूफानी रात में किराये के गुंडों के जरिए माँ-बेटी का  कत्ल करवाकर कहीं फिकवा दिया सबूत के अभाव में सेठ जी साफ बच गये, कहते हैं तभी से हवेली मे उसकी आत्मा भटकती है। कभी-कभी बरसात की तूफानी रात मे प्रेतनी हवेली मे प्रेतनी प्रकट होती है पूरी हवेली शान-शौकत से जगमगा उठती अगर कोई मुसाफिर भुले भटके उसमे पहुँच जाता है तो अगले दिन उसकी लाश ही मिलती है। हम लोग खंडहर को देखने गये कभी एक शानदार दुमंजिली ईमारत रही होगी अब उसका अधिकांश भाग मलबे का ढेर बन चुका था ईमारत के उत्तरी-पच्छिमी कोने पर एक कमरा सही सलामत था, जिस पर जाने के लिये पूरब से टूटी-फूटी सीढियां बनी थी, हम लोग कमरे मे पहुँचे कमरे के बाहर उत्तर व पच्छिम मे बरामदा था हम लोग ने बरामदा और उससे चारों और बाहर का नजारा देखा हम लोग उत्तरी बरामदे मंे खड़े बात कर रहे थे तभी ना जाने कैसे सुब्रोतो का पैर फिसला और वो चिल्लाते हुये बरामदे से नीचे जा गिरा मैं भी उसे बचाने नीचे कूद गया गनीमत थी कि बरामदे से लगा मलबे का एक बड़ा ढेर था हम लोग मट्टी पर फिसलते हुये नीचे गिरने लगे तभी उसका फिसलना थमा मैं भी उसके पास पहुँचा मैंने देखा कि उसने एक कंकाल का हाथ पकड़ रखा है। जिसमे गंगा-जमुनी सोने का एक कंगन है तभी मट्टी का एक ढेर नीचे लुढका तो हमे एक मानव कंकाल नजर आया और तभी कंकाल के हाथ की हड्डियां बिखर गई कंकाल देखकर मारे भय के हमारी घिग्घी बंध गई काफी देर तक मुँह से कोई बोल नही फूटे कुछ सामान्य होने पर मैंने कहा, तुरंत यहांँ से चलो यहां रूकना खतरनाक हो सकता है। सुव्रोतो के मना करने पर भी ना जाने क्या सोचकर मैंने कंगन उठाकर जेब मे रख लिया उसी तांगे से हम वापस आये चैथे दिन गाश्व के पास मनसा देवी का मेला लगा धर्मपुरी से एक मील पूरब मे मनसा देवी का बहुत पुराना मंदिर था जहाश् हर साल सावन मे पन्द्रह दिन तक काफी बड़ा मेला लगता था जहाश् व्यापारी श्रद्धालुओं के अलावा दूर-दूर के साधक, साधू और तांत्रिक भी आते थे हम लोग भी मेला देखने गये मेले में कुश्ती का भी आयोजन था हम लोग तख्त पर बैठकर कुश्ती देख रहे थे पर मेरा मन कुश्ती मंे ना लग कर बार-बार भूतिया खंडहर पर जा रहा था मैने सुव्रोतो से कहा चलो बेलारी गांव चलते है उसने जवाब दिया तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या, उस खतरनाक जगह जाकर अपनी जान गंवानी है। मैंने सोचा कि सुव्रोतो तो कुश्ती में व्यस्त है, क्यो ना उसे बिना बताये बेलारी गांव का चक्क्र लगा लूँ घंटे भर ही की बात है मैं अखाड़े से बाहर निकाला जब मै तांगा स्टैंड पहुँचा तो मुझे एक 20-22 साल की बेहद खूबसूरत युवती जिसने अपने शरीर पर काफी बहूमूल्य गहने पहन रखे थे जिसके चेहरे पर मनमोहक मुस्कान और व्यक्तित्व मे गजब का आकषर्ण था मैं सब कुछ भूल उसे एकटक देख रहा था जल्दी वो भी भांप गई कि मैं उसकी खूबसूरत जुल्फों का कैदी बन चुका हूँ मैंने महसूस किया कि वो भी मुझे नजरें चुरा कर बीच-बीच मे देख रही थी तभी हमारी नजरें मिली तो हल्की मुस्कान के साथ उसका गोरा चेहरा शर्म से लाल हो गया फिर हमारी निगाहें कई बार टकराई फिर वो मेले के बाहर जाने लगी मैं मंत्रमुग्ध सा उसके पीछे पीछे चलने लगा मैंने देखा कि वो आबादी छोड़ कर सूनसान जगह जाने लगी यहां जमीन उबड़-खाबड़ थी चारों और सन्नाटा फैला हुआ दूर-दूर तक कही कोई आदमी या जानवर नजर नही आ रहा था मुझे अपना अच्छा-बुरा कुछ नही सूझ रहा था मेरे दिमाग मे केवल वो ही छायी हुयी थी चलते-चलते मैं उसके पास पहुँचा फिर हिम्मत करके मैंने पूछा आप कौन है। वो मधुर आवाज मे बोली मेरा नाम कंचनलता है। आप ईधर रहती है, जी मेरा घर तो बेलारी मंे है। पर अब मैं ईधर ही रहती हूँ ईधर किधर सामने वाले टीले के पीछे यहां इस वीराने में यह तो पूरी तरह उजाड़ है। तभी मुझे पीछे से किसी ने पुकारा मैने पलट कर देखा तो कोई नही था फिर मैं कंचन की ओर पलटा तो मारे हैरत के मेरी आंखे फटी रह गयी कंचन का दूर तक कोई अता पता नही था अचानक वह कहां गायब तो मैं हैरत से उसे ढूँढने टीले के पार गया मारे डर के मेरी हालत बुरी हो गई, लगा कि मै चक्क्र खा कर गिर जाऊँगा क्योंकि उस पार एक पुराना कब्रिस्तान नजर आ रहा था फिर मेरी नजर संगमरमर की खूबसूरत कब्र पर पड़ी जिस पर लिखा था कंचनलता मृत्यु तिथी 12 जुलाई 1904 इसे पढकर मुझे लगा कि मैं पागल हो जाऊँगा तारीख आज से ठीक चालीस साल पहले की थी तो क्या कंचन प्रेतनी थी, उसके बाद मैंने खुद को सुब्रोतो की हवेली मे पाया मेरे सर पर पट्टी बंधी कुछ लोग मुझे घेरे थे तभी सुब्रोतो मेरे पास आया और बोला अब कैसी तबीयत है। तेरी मैं तो ठीक हूँ पर मंै यहां आया कैसे तो कब्रिस्तान मे था, वो बोला क्यों मजाक कर रहे हो तुम तो मेले मेरे पास बैठे थे अचानक कनात गिर पड़ी थी जिसकी बल्ली से तुम्हारे सर पर गहरी चोट लगी थी पूरे चैबीस घंटे बाद तुम्हें होश आया अनेकों आदमियों ने सुब्रोतो की बात को सच बताया मंै जान नही सका कि सच क्या था जो सुब्रोतो ने कहा या जो मैने देखा तीसरे दिन सुब्रोतो के चाचा के घर उनके गुरूजी लक्षमण छावनी के सिद्ध साधू आये जो हर साल मेले में आते थे, वो कुछ दिन जरूर चाचा जी के यहाँ रूकते थे वो मुझे देखने चले आये और मुझे देखकर बोले, अरे इस पर तो किसी प्रेतनी का साया है। उन्हांेने मेरी और सुब्रोतो के पिता के साथ घटी पूरी बात सुनकर कहा आप लोग चिंता ना करे, अब इस प्रेतनी का अंत आ गया है। उन्होंने बेलारी गांव के टीले से मट्टी एक कोरी हंडिया और कुछ पूजन सामग्री मंगवाई फिर शाम को देवी के स्थान पर चैकी लगाकर फिर कोई मंत्र पढते हुये बिनौले की रूई और सरसों मिलाकर मट्टी की एक पुतली बनाई कुछ तांत्रिक चक्र बनाकर उनके मध्य उस पुतली और बेलारी से हमे मिले उस कंगन को रखा और पुतली को वस्त्र, शराब, मुर्गा, संेदूर, फूल आदि चढ़ाया और वे पुतली पर नजर गड़ाये हवा मे कुछ बाते करने लगे लेकिन हमे कुछ भी नही सुनाई पड़ रहा था फिर उन्हांेने पुतली को हंडिया मे डाल कर उसे ढक्कन लगाकर आटे से बंद कर दिया और उसके मुख पर लाल कपड़ा बांध दिया फिर गुरूजी ने कुछ नवजवानों को फावड़े लाने को कहा फिर कुछ मंत्र पढकर हुँकार लगाई चलो तभी मेरे जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार हुआ वहाँ खड़ें हर शख्स की आश्खे फटी रही गई हंडिया तेजी से एक ओर जमीन पर सरकने लगी उसके पीछे गुरू जी मै सुब्रोतो, उनके कुछ संबधी तथा तीस-चालीस गाश्व वाले भी चले चुँकि अंधेरा फैलना शुरू हो गया था कुछ गाश्व वालों ने टार्च लालटेन व लाठियां भी साथ ले लीं हंडिया गाश्व के बाहर जाने लगी सब उसके पीछे-पीछे चलने लगे हंडिया आबादी छोड़कर गाश्व के दक्षिण की ओर वीराने मे जाने लगी जाने लगी चारों और दूर-दूर तक शुरूआती रात का सन्नाटा फैला हुआ इस ईलाके मे कोई दिन में भी नही आता था हंडिया चलती-चलती ठीक उसी टीले पहुँची जिसे मैंने बेहोशी मंे देखा था टीले के पार पहुँचने पर मुझे कोई कब्रिस्तान तो नहीं नजर आया पर मट्टी के ढेरो से भरा एक मैदान जरूर दिख तभी हंडिया एक जगह जाकर जमीन पर गोल-गोल चक्कर लगाने लगी फिर गुरूजी ने कुछ मंत्र पढे तो हंडिया रूक गई गुरूजी से उस जगह खोदने को कहा तो करीब आधे घंटे बाद से एक कंकाल नजर आया जिसने बेशकीमती जेवर और कपड़े पहन रखे जो लगभग गल चुके थे गुरूजी ने कुछ मंत्र पढ़कर हंडिया, कब्र व कंकाल को बांध दिया और अगले दिन गांव वालों के साथ उसी जगह पूरे विधि-विधान से पुतली सहित कंकाल का दाह संस्कार करा दिया इसी के साथ सुब्रोतो पिता पूरी तरह स्वस्थ हो गये बेलारी गांव का खंडहर आज भी खड़ा इस घटना की गवाही दे रहा है।
यह रहस्य-रोमांच कहानी पूर्णतः कालपनिक है