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मैं वापस आऊंगी
July 27, 2019 • ऊशा जैन ‘शीरी’

लंबी, छरहरी, गोरी चिट्टी रामी चाची जैसे ग्राम टनकपुर की शान हैं। वे बाल विधवा है, पति का सुख उनके भाग्य में सिर्फ थोड़े ही समय के लिए लिखा था। ससुर उनकी शादी से पहले ही  परलोक सिधार चुके थे। उनके पति मां-बाप की बारहवीं संतान थे। एक तो बुढ़ापे की संतान फिर एक-एक कर आठ बच्चे मौत की गोद में समा चुके थे, तीन लड़कियाँ और रामू केवल चार संतान ही बची थी, रामू की माँ के पास पैसे का अभाव न था। कई बीघा खेत खलिहान ढेर से जानवर, गायें, भैंसें, बकरियाँ, सभी कुछ था। रामू को उन्होंने बड़े लाड़-प्यार से पाला। सोलह सत्रह-बरस का होते-होते उसके लिए बारह तेरह बरस की किशोरी सुंदर सलोनी सी बहू ले आई। बहू का नेहर का नाम रूपकंवर था। उनके अति सुंदर रूप के कारण ही शायद माँ बाप ने उसका यह नाम रखा थ। मगर उसके आते ही सासू ने रामू की जोड़ीदार रामी कहते हुए लाड़ से उन्हें रामी पुकारना शुरू कर दिया। रामी की दुबली पतली काया देख सास ने उसे मुटाने का जिम्मा उठा लिया। देखते ही देखते कुछ महीनों में दुधिया रंग पे जो गुलाबी रंगत उतर आई और बदन से कैलेंडर में छपी सीता मैय्या की सूरत सी लुनाई गमकने लगी सास उसकी नून मिर्च से नजर उतारने लगी। गाँव की मिलने-जुलने वाली औरतें आती तो रानी का रूप देख ठगी रह जाती है। सास जब तक जीवित रही बहु को हथेली पर फूल सा रखा। रामू अत्यंत लजीला किशोर था। दिन में वह माँ के सामने रामी से बात करने में भी शरमाता। हाँ रात को दिए की झपझपाती लौ में एकटक उसके रूप का रसपान एक मतवाले भवर की तरह करता। रानी उन नजरों की ताप न सह पाती। शरमाकर वह अपने बड़े-बड़े रसीले नयन रेशमी घनेरी पलकों के परदे में छुपा लेती। किशोर प्यार में एक अनूठा रंग होता है कुछ बचपना कुछ जवानी का मिला-जुला आलम, दोनों के लिए दिन पहाड़  सा बीतता अैर रात पलक झपकते बीत जाती। सास जब कभी बाजार हाट मिलने-जुलने बाहर जाती तो रामू सब काम धाम छोड़कर घर पर ही बना रहता। मगर ऐसे दिन कभी-कभार ही उन्हे नसीब होते।
 एक साल गाँव में हैजे का प्रकोप फैला। परिवार के परिवार उसकी चपेट में आकर उजड़ गये। इसी में रामू भी चल बसा। बेटे की मौत का सदमा बूढी माँ बर्दाश्त न कर सकी, उसने बिस्तर पकड़ लिया, साल बीतते-बीते रामी का संसार में अकेला रोता-कलपता छोड़ वह भी चल बसी। रामी ने सास की जैसी सेवा की उससे वह गाँव में एक आदर्श बहू की तरह स्थापित हो गयी। सास के रहते वह सुरक्षित थी, लेकिन उसके मरते ही गाँव के जवान-अधेड़ यहाँ तक कि कई खुर्राट बुड्ढ़े मर्द भी उन्हें असहाय हालत में देखकर लार टपकाने लगे। कभी उनके रूप जवानी पर कभी उनकी धन-जायदाद पर लोगों की नीयत बिगड़ने लगी। वक्त पड़ने पर एक अबला किस तरह सबला बनकर दिखा सकी है, रामी ने यह कर दिखाया। उसके तीनों नन्दोइयों ने बारी-बारी से उस पर डोरे डालने चाहे, बहला-फुसला कर काबू में करना चाहा, लेकिन रामी ने बेखौफ होकर खुलकर उन्हें जो गालियाँ दी और घर के बाहर का रास्ता दिखलाया उन्होंने फिर पलट कर आने की हिम्मत न की। उसका चंडी रूप देखकर फिर गाँव में किसी को उन्हें छेड़ने की हिम्मत नहीं हुई। जिम्मेदारियों का बोझ उठाते और जिन्दगी की लड़ाई अकेले लड़ते-लड़ते यह एक अत्यंत जुझारू कर्मठ महिला बन गयी। शक्ल देखकर यह अच्छे बुरे आदमी को पहचान लेती। ज्यादा बोलने की उन्हें आदत न थी, किसी तरह की गुस्ताखी या अभद्रता करने की किसी की हिम्मत न होती। लोग उन्हें पीठ पीछे घमंडी, बदमिजाज, अकड़ू और न जाने क्या-क्या कहते लेकिन सामने किसी की मजाल न थी जो उनसे कोई कुछ भी कह सकता। एक अकेली स्त्री के लिए जीना कितना कठिन है, यह वही जान सकती हैं। अकेलेपन की हर पल कचोटती अनुभव जीवन कैसा नीरज, उजाड़ और बदरंग बना देती है। आदमी न जीता है न मरता। सुख-दुख से परे भूत की अंधेरी सुरंग में भटकते हुए उन्हें लगता जैसे वह खुद भूत बनकर रह गयी हो। किसके लिए जियें, क्यों कर जियें, कभी-कभी कोठरी की। दीवारों पे सर पटकती मूक क्रन्दन करती वह मन ही मन पुकार उठती 'हे ईश्वर यह किन पापों की सजा तू मुझे दे रहा है, इसके साथ, अम्मा के साथ मुझे भी क्यों न बुला लिया?' अन्त की पीड़ा ने उन्हें कुछ और कठोर बना दिया थ। ईश्वर के अन्याय का बदला यह दुनिया वालों से लेना चाहती थी कुछ लोग के बरतव से उन्हें समाज के प्रति कड़वाहट से भर दिया। नारी सुलभ, लज्जा, सहृयता, ममता, करूणा जैसी भावनायें पति और सास की चिता में ही जैसे भस्म हो गयी थी। जिसके शरीर के पोर-पोर में कांटों की चुभन हो उसके मुंह से फूल झरें भी तो कैसे। रामी चाची का जो सबसे बड़ा गुण थ, यह था उनका खुले हाथ का होना। 
 यही कारण था कि लोग उनकी कड़ुवाहट को भी झेल जाते। किसी की लड़की की शादी हो या किसी की स्कूल की फीस जमा न हो पा रही हो, किसी का गरीबी के कारण  इलाज न हो पा रहा हो या किसी के यहाँ कंगाली के कारण फाकाकशी हो रही हो रामी चाची स्वयं भगवान का अवतार बन तुरंत बगैर मांगे सबकी मदद करने पहुंच जाती। चिकनी चुपड़ी बातें करने उनको बिल्कुल नहीं आती थी। उनके द्वारा दी गयी मदद को लोग काम निकालते ही बहुत जल्दी बिसरा देते। वाहवाही लूटने वालों मंे अक्सर ये लोग होते, जो वास्तव में करते कुछ नहीं, लेकिन बातों के द्वारा ही अपना सिक्का जमाना खूब जानते हैं।
 रामी चाची से जलने वालों की भी कमी न थी, ये लोग घात लगाये रहते कि कब ऐसी बात उनके खिलाफ हाथ लगे, जिससे ये उन्हें बदनाम कर सकें। कुछ मर्द जो उनके रूप यौवन पर लट्टू थे और जिन्हें ये चारा न डालती उससे तरह-तरह से लालच देते कोई कहता अरी रामी क्यों आपकी कंचन सी काया पर जुल्म कर रही हो, ये मुई तबाह होने के लिये नहीं कोई दूसरो कहता, भई, हमसे तेरा विधवा का वेश नहीं देखा जाता, हमारी बन के देख। राज करेग। मेवा मिठाई खायेगी। रेशम ओर जेवरी के ढेर लगा देंगे तेरे लिए।
 बड़ा दिल फेंक है रे तू। क्या समझता है तू मुझे। मैं ऐसी वैसी नहीं, जा के अपनी माँ बहनों को पहना रेशम जेवर। मेवा मिठाई उन्हें ही खिला, मेरा मालिक मेरे पहनने वाला बहुत छोड़ गया है। यह ही-ही करता अपनी झेंप मिटाने को कह उठता मैं तो यूँ ही ठिठोली कर रह था, भौजी, मगर रामी चाची मरद जात की ठिठोली और बुरी नियत को खूब पहचानने लगी थी। बारिश का दिन था। उनकी छत जगह-जगह से टपक रही थी। पूरे घर में सीलन और ठंडक हो रही थी। वह नीचे जो भी बर्तन रखती जरा देर में भर जाता। जैसे ही वह कटोरा बाहर उलीचने गयी कि बनवारी पटेल ने उन्हें पकड़ लिया। तू मरे हुए की याद में कब तक अपने को सुखाती रहेगी, अरे अपने वेद शास्त्रों में भी तो एक स्त्री के कई-कई पति होने की बात है। अरी इसमें अधरम कैसा, जो तू हमेशा धर्म की बात करती है। आज तो मैं तेरे मुंह से हाँ सुने बगैर टलने वाला नहीं। बनवारी मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ, अपने मरे पति का वास्ता देती हूँ, मुझ पर दया कर और यहाँ से चला जा, तेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, किसी ने तुझे इस वक्त मेरे घर देख लिया तो मैं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहूंगी। वो तो और भी अच्छा है भौजी ये सुंदर चेहरा औरों को दिखाने की जरूरत ही क्या है। ऐसा कहकर वह पशु उन्हें भीतर कोठरी में धकेलने लगा। उन्होंने उसकी कलाई पर भरपूर दांत गड़ा दिये। वह जैसे तैसे ही हाय-हाय करता हाथ पकड़कर नीचे बैठा उन्होंने लपककर पास रखी कुल्हाड़ी उठा ली। उसमें साक्षात् चंडी समा गयी। दांत पीसते हुए बोली मेरे नजदीक अकर तो देख, कुल्हाड़ी से पेट न फाड़ दिया तो अपने बाप की बेटी नहीं।
 डर के मारे बनवारी की आंखें विस्फरित हो गयी। तेजधार, वाली कुल्हाड़ी रामी दोनों हाथ से सिर के ऊपर उठाए वार को तत्पर थी। बनवारी ने चुपचाप चले जाने में ही कुशलता समझी। रामी चाची ने उस पर थूकते हुए कुल्हाड़ी एक तरफ कोने में रख दरवाजे का कुंडा लगा दिया। मगर नींद उनसे कोसों दूर थी कि वह इस तरह भला इन भूखे भेड़ियों से अपने को कब तक और कैसे बचा पायेगी। दूसरे, दिन बनवारी सारे गाँव में कहता फिर रहा था कि रामी एक बदचलन औरत है, उसे गाँव से निकाल देना चाहिए। कल उसने खुद अपनी आंखों से उसके घर से एक मरद को निकलते हुए देखा रामी चाची गाँव से चली जाएंगी तो उनकी मदद कौन करेगा। जहाँ अपना स्वार्थ आगे आ रहा था, यहाँ गाँव वाले चुप थे लेकिन इतनी हिम्मत किसी में न थी कि सब जानते बूझते भी बनवारी के खिलाफ बोलते। रामी चाची ने सब सुना और उनका मन के प्रति घृणा से भर गया वही पागल थी। जो अपनी बिसात से बढ़कर उन लोगों की मदद को आधी रात को दौड़ी जाती थी। दलितों की बस्ती में कौन सा ऐसा घर था जो उनके एहसान तले न दबा था। रामी चाची ने यह गाँव छोड़ने का फैसला कर लिया गाँव वालों के बहुत रोकने पर भी वह रूकी नहीं। जाते-जाते बस इतना कह गयी मैं वापस आऊंगी, जल्दी ही आऊंगी... कुछ ही महीनों बाद जब वे गहनों से लदी भारी-भरकम साड़ी पहने गाड़ी से उतरी तो सारे गाँव में खलबली मच गयी। बूढ़े, बच्चे, जवान सभी अपना-अपना काम छोड़कर उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े थे। उनकी थोड़ी सी जमीन पर और छुट्ट-पुटट सामान जो भी उनके पास था, उन्होंने जरूरत मंदों में बांट दिया। गाँव के इज्जतदार कहे जाने वाले सब लम्पट बदमाशों के कलेजे पर सांप लोटता छोड़कर गाड़ी की धूल उड़ाती वह अपने बूढ़े जमींदार पति के साथ चली गयी। फिर कभी उस नरक में लौट कर न आने का संकल्प लिये।