ALL News Religion Views Health Astrology Tourism Story Celebration Film/Sport Vedio
मैली चादर
July 18, 2019 • श्याम कुमार पोकरा

विशालकाय कई ऐकड़ के क्षेत्रफल में फैली हुई मल्टी इलेक्ट्रानिक्स इंडस्ट्रीज। मुख्य गेट के सामने स्थित कैंटीन, बाँई ओर स्थित प्रशासनिक व लेखा भवन, गेट के दाँई ओर स्थित रिसर्च एवं डेवलपमेंट बिल्डिंग और कैंटीन के पीछे स्थित असेम्बली शाप। इस इंडस्ट्रीज की वह मालिक भी है और प्रबंध निदेशक भी। नाम है सुमन षर्मा लेकिन सब उसे मैडम कहकर पुकारते हैं। सिर के आधे कटे हुये कंधे पर झूलते रेशमी काले बाल, मंजरी आँखों पर चढ़ा बड़े गोलाकार लेंसों का चश्मा, मध्य ललाट पर चिपकी एक छोटी सी काली बिंदी और साधारण साड़ी मेें लिपटा उसका इकहरा गोरा बदन।
इस वक्त शाम के तीन बज रहे हैं। वह अकेली अपने केबिन में बैठी फाइलों उलझी हुई है। इसी समय चपरासी केबिन में प्रवेष करता है और उसे सलाम करता है।
''मैडम...कोठारी साहब मिलना चाहते हैं।''
''हाँ...भेज दो उन्हें अन्दर।''
सलाम करके चपरासी चला जाता है। थोड़ी देर बाद ही कोठारी साहब उसके कमरे में प्रवेश करते हैं। प्रशान्त कोठारी इस इन्डस्ट्रीज के हिन्दी अधिकारी है। वे उसके डैडी की उम्र के हैं और उनके जमाने से ही इस इन्डस्ट्रीज में सेवारत है। वे उसे बेटी कहकर पुकारते हैं। हाथ में लगी फाइल उसकी ओर बढ़ाकर वे बोलते हैं।
''बेटी...आज बीस केंडिडेट आये हैं... ईश्वर करे आज तुझे अपने प्रष्न का उत्तर मिल जाये और मुझे एक हिन्दी सहायक।''
''हाँ... मैं देखती हूँ अंकल...आप बैठिए।''
उसके स्वर में उत्सुकता है। एक हल्की मुस्कान होठों पर उभर आई है। कोठारी साहब कुर्सी पर बैठते है, और वह फाइल खोलती है। अन्दर कई पेपर लगे हुये हैं। सबसे ऊपर के पेपर को वह पढ़ने लगती है। लिखा है-
''यह मैली चादर हमें हमारे देश की यथार्थ स्थितियों को दर्शाती है। उन लोगों की याद दिलाती है जो गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं। चादर पर कई जगह पेबन्द लगे हुए हैं। जो ये दर्शाते हैं कि हम और हमारे राजनेता वस्तु-स्थिति को छिपाने की कोशिश कर रहें हैं।''
यह पढ़कर होठों की मुस्कान लुप्त हो गई। चेहरा सपाट हो गया। उसने पेपर पलट दिया और अगले प्रत्याशी का उत्तर पढ़ने लगी। 'यह मैली चादर हमें परतंत्र भारत की याद दिलाती है। जब हम अंग्रेजों के गुलाम थे। हमारा जीवन नरक के समान था। चादर पर पड़े ये लाल धब्बे हमंे उस खून की होली की याद दिलाते हैं जो अंग्रेजों ने हमारे साथ खेली थी। चादर पर कहीं-कहीं चमकीली किरणंे प्रस्फुटित हो रही है, जो हमें आने वाले अच्छे दिनों का संकेत दे रही हैं।'
यह पढ़ते ही एक लम्बी निःश्वास उसके नथुनों से निकल कर हवा में फैल गई। वह अपनी रिवोल्विंग चेयर की पीठ पर टिक गई और अगला पेपर पढ़ने लगी।
'सूरज की गर्म व तीक्ष्ण किरणों से, कड़कड़ाती बर्फीली सर्दी से,
काले मेघों की घनघोर बरखा से,
आँधी और तूफान से,
हमें बचाती है यह मैली चादर'।
यह पढ़कर वह हंस पड़ी। और इसी पेपर पर नीचे उसने इस कविता को एक लाइन जोड़कर पुनः इस प्रकार लिख दिया।
सूरज की गर्म व तीक्ष्ण किरणों से,
कड़कड़ाती बर्फीली सर्दी से,
काले मेघों की घनघोर बरखा से,
आँधी और तूफान से भूखी,
ललचाई क्रूर नजरों से
हमें बचाती है यह मैली चादर।''
फिर वह एक के बाद एक पेपर को पलटती गई और सरकारी नजर से प्रत्येक पेपर को पढ़ती गई। जब सारे पेपर खत्म हो गये तो फाइल बंद करके उसने टेबल पर डाल दी। हताश होकर वह बोली-
''नहीं कोठारी साहब...इनमे किसी में
मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है... आप सब लोगों को जाने को कह दीजिये।
''ठीक है बेटी।''
कोठारी साहब ने फाइल उठाई और बाहर रिसेप्शन हाॅल में आ गये। वहाँ कई युवक बैठे उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। सबके नजदीक आकर वे बुझे हुये स्वर में
बोले- ''मुझे अफसोस है कि आप लोगों में से किसी का चयन नहीं हुआ है। आप सब लोग जा सकते है। कष्ट के लिये हम क्षमा चाहते हैं... धन्यवाद।
यह सुनकर सबके मुँह लटक गये। क्योंकि रोजगार जो एक बहुत बड़ी समस्या है, उनको नहीं मिला था। हताष होकर परास्त सिपाही की भाँति वे सब रिसेप्शन हाॅल से बाहर निकल गये थे।
उनसे भी अधिक दुःख कोठारी साहब को हुआ था। कई दिनों से चल रहा है यह सिलसिला। प्रतिदिन कई नवयुवक हिन्दी सहायक के इस पद के लिये साक्षात्कार देने आते हैं। सभी से एक ही प्रश्न किया जाता है, कि इस मैली चादर पर चार लाइन लिखिये। एक फटी पुरानी मैली चादर जो मैडम ने कहीं से लाकर दी थी, को परदर्शी कांच के शोकेस में सजाकर रखा गया था। अब तक आये युवकों ने इस मैली चादर पर सैंकड़ों तरह से लिखा था। किसी ने कविता के रूप में लिखा तो किसी ने दार्शनिक आधार पर। लेकिन किसी उत्तर से मैडम संतुष्ट नहीं हो पाई थी। पता नहीं कौन सा जवाब चाहिए था उसे, क्या पाना चाहती है वह इस मैली चादर में कुछ भी उनकी समझ में नही आ रहा था।
शाम के पाँच बज गये हैं। फैक्ट्री के सभी कर्मचारी अपने घरों को जा चुके हैं। कोठारी साहब ने अपनी फाइलें समेटकर बंद की और अपना ब्रीफकेस उठाकर केबिन से बाहर निकल गये। इसी समय उनकी नजर रिसेप्शन हाॅल में खड़ी मैडम पर पड़ी। वह शो केस में संजोयी उस मैली चादर को अपलक देख रही हैं। विस्मित होकर वे उसके नजदीक पहुँचे।
''क्या बात है, बेटी... कई दिनों से मैं तुझमें एक परिवर्तन देख रहा हूँ।''
कोठारी साहब की आवाज सुनकर वह चैंक पड़ी।''हाँ कोठारी साहब... मैं स्वयं ऐसा अनुभव कर रही हूँ। मैं हताश सी होने लगी हूँ। क्या मेरे प्रश्न का उत्तर देने वह नहीं आयेगा।''
''वह कौन बेटी... मैं कुछ समझा नहीं।''
''मैं भी नहीं पहचानती हूँ उसे... लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन वह मुझे अवश्य मिल जायेगा। और वह दिन मेरे लिये अत्यन्त खुशी का दिन होगा।''
उसकी बात को वे समझ नहीं पाये। उसको क्या चाहिये...किसका इंतजार है उसे! गहरे असमंजस ने उन्हें घेर लिया।
''बेटी... सभी लोग जा चुके... घर चलने का समय हो गया है।''
''हाँ.....आप चलिए कोठारी साहब... मैं थोड़ी देर और यहाँ रूकना चाहती हूँ।''
''ठीक है बेटी...मैं चलता हूँ।''
कोठारी साहब चले गये। वह फिर परदर्शी कांच के शो केस में लटकी हुई उस मैली चादर को देखने लगी, अपलक वह उसमें खो गई। आज एक बार फिर वह हादसा अतीत से निकल कर उसकी स्मृतियों में विचरण करने लगा।
दिसम्बर माह की वह अन्तिम रात थी। शहर के एक होटल में वह न्यूईयर पार्टी में झूम वही थी। पुराना साल विदा हो गया था, और नये साल का आगमन हुआ था। नववर्ष की खुशी में सबके साथ वह भी आर्केस्ट्रा की धुन के साथ द्रुतगति से लहरा रही थी। तभी होटल के एक बेरे ने उसके कान में आकर फुसफुसाया था-'मैडम...आपके डैडी की तबियत अचानक खराब हो गई है। आपको जल्दी ही घर बुलाया है।' यह सुनते ही उसकी सारी खुशियाँ फुर्र हो गई थी। और वह उसी स्थिति में होटल से निकल कर अपनी कार की ओर दौड़ पड़ी थी।
वह कार स्टार्ट करने ही वाली थी कि अचानक किसी ने आकर उसे दबोच लिया था। चार पाँच अनजान चेहरे कार घुस आये थे। सबने मिलकर उसे जकड़ लिया था। किसी ने उसके हाथ पकड़े, किसी ने उसकी टांगे पकड़ी और किसी ने उसका मुँह दबा दिया था। उनमें से एक ने कार स्टार्ट की और होटल से बाहर की ओर दौड़ा दी थी।
थोड़ी देर बाद कार एक पार्क के सामने आकर रूकी। चारों तरफ सन्नाटा था, सड़के वीरान थी। वे जबरदस्ती उसे उठाकर पार्क के एक अंधेरे कोने में ले आये थे। वह छटपटा रही थी, उन दरिन्दों की पकड़ से छूटने का प्रयास कर रही थी। इसी समय एक भेड़िए ने उसके कपड़े कई जगह से फाड़ डाले तो वह घबरा गई थी। उसने एक बार फिर अपनी पूरी शक्ति लगा दी। उनकी पकड़ से छूटकर वह एक तरफ भागी, मदद के लिए जोर से चीखी-'बचाओ...बचाओ...।' बदहवास भागते हुये अचानक उसके पैरों में कुछ उलझ गया और वह नीचे गिर पड़ी थी।
वह उठने का प्रयास कर ही रही थी कि तभी किसी ने आकर उसे सहारा दिया था। एक चादर से उसके नंगे बदन को ढकते हुए वह बोला था-'आप यहाँ से भाग जाइये... मैं इन कुत्तों को रोकता हूँ।' उसने नजरें उठाकर देखा पतला लम्बा युवक उसके सामने खड़ा था। दूसरे ही क्षण वह उन इंसानी दरिंदों से भिड़ गया था। और वह पार्क के बाहर खड़ी अपनी कार की ओर दौड़ पड़ी थी।
लगभग आधे घंटे में वह अपने घर पहुँच गई थी। वहाँ सब कुछ शांत था। डैडी अपने बेडरूम में गहरी नींद में सोये हुये थे। वह सीढियाँ चढ़ी और चुपचाप अपने बेडरूम में चली आई थी। कपड़े बदल कर वह बिस्तर पर लेट गई थी। लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। बार-बार वह खौफनाक दृश्य उसकी आँखों में तैर जाता था, और उसके रोंगटे खड़े कर जाता था। विचलित अवस्था में ही वह सुबह तक करवटें बदलती रही थी।
पक्षियों की चहचहाट सुनकर उसकी आँखे खुली। सुबह होने का एहसास कर वह बिस्तर से उठ गई। बाथरूम से बाहर निकल कर उसने खिड़की का पर्दा खोला। संगमरमरी श्वेत प्रकाश में उसके सुसज्जित शयन कक्ष की कीमती वस्तुयें चमक उठी। सहसा उसकी दृष्टि बेड पर पड़ी एक मैली चादर पर पड़ी। दूसरे ही क्षण रात की वह खौफनाक घटना एक बार फिर उसने नेत्र पटलों पर उतर आई। भयग्रस्त होकर वह कांपने लगी। तभी एक दुबले पतले लम्बे युवक की अस्पष्ट सी छवि उसके मस्तिष्क में उभरने लगी। और एक प्रश्न उसके जेहन में कौंध गया... 'वह कौन था?...।'
धीरे-धीरे उसका मन एक पश्चाताप से ग्रस्त होने लगा। बुरे समय में जिसने उसकी मदद की, अपनी जान जोखिम में डालकर जो उन वहशी दरिंदो से भिड़ गया था, पलटकर उसने उसकी सुध तक नहीं ली थी। वह तो अपनी जान बचाकर भाग आई थी, लेकिन उसकी क्या दशा हुई होगी। सोचकर वह कांप उठी थी। उसे सीधे पुलिस के पास जाना चाहिए थी। लेकिन वह तो स्वार्थी निकली। उसे मुसीबत में छोड़कर भाग आई थी। अचानक उसका मन उसके लिए व्यग्र हो उठा था। टी. वी. आन करके उसने आज के समाचार सुने। टेबिल पर पड़े हुए आज के पेपर को सुक्ष्मतापूर्वक पढ़ा लेकिन कहीं उसकी सूचना नहीं मिल सकी थी।
कई दिन गुजर गये। उसने हर जगह उसकी तलाश की, वह पार्क में उस स्थान पर फिर गई, आस-पास के अस्पतालों में उसे ढूंढा, थानों मे पूछताछ की लेकिन वह कहीं नहीं मिला था। वह कौन था? उसका क्या नाम था? वह क्या करता था? वह कुछ नहीं जानती थी। वह हताष हो गई थी। लेकिन मन उस शख्स पर आसक्त हो गया था, जिसने बुरे समय में उसकी रक्षा की थी, उसे लुटने से बचाया था। किसी भी तरह वह उसे ढूंढ लेना चाहती थी।
दिन प्रतिदिन उसके मन की पीड़ा बढ़ने लगी थी। वह युवक उसकी स्मृतियों में छा गया था। उसका दृढ़ता भरा स्वर बार-बार उसके कर्णपटलों से टकरा जाता था-'आप यहां से भाग जाइये... मैं इन कुत्तों को रोकता हूँ। 'उसने किसी को भी उस घटना के बारे में नहीं बताया था। लेकिन उसके स्वभाव में आये परिवर्तन को डैडी ने भांप लिया था और एक दिन उन्होंने उससे पूछ ही लिया था-'बेटी....क्या बात है...तुम आजकल बहुत उदास रहने लगी हो?'
'नहीं डैडी....ऐसी कोई बात नहीं है।'
'लगता है तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो सुमन... कुछ दिनों से मैं देख रहा हूँ कि तुम बहुत गंभीर रहने लगी हो...बेटी शादी के लिए अब तो हाँ कर दो....तुम्हारी अपनी कोई पसंद हो तो साफ-साफ मुझे बता दो। 'हाँ डैडी... मेरे मन में किसी के लिए जगह बनी है लेकिन...। 'लेकिन क्या...? क्या बात है बेटी?
'लेकिन वह दुनिया की भीड़ में खो गया है। मैं उसे ढूंढ़ने की पूरी कोशिश करूँगी। अगर वह मिल गया तो सबसे पहले उसे आप ही के पास लेकर आउँगी।'
बोलते हुये वह रूआंसी हो उठी थी। द्रुतगति से चलकर वह अपने कमरे में आ गई थी। बेड पर पड़ी उस मैली चादर से लिपटकर वह रो पड़ी थी। उसकी आँखों में एक दुबले पतले लम्बे युवक की अस्पष्ट सी छवि घूमने लगी थी। लेकिन उस तक पहुँचने का कोई भी सूत्र उसके हाथ नहीं लग रहा था। उसे ढूंढ लेने की जिज्ञासा हृदय में हर पल बलवती होने लगी थी। इसी मनःस्थिति में वह बहुत देर तक पड़ी रही थी। अपलक स्नेहपूर्वक चादर को निहारती रही थी। सहसा उस तक पहुंचने की एक योजना उसके मस्तिष्क मे उभर आई थी। एक खुशी की लहर उसके समस्त अंगो में प्रवाहित हो गई थी। मैली चादर को सीने से लगाकर वह आफिस के लिये निकल पड़ी थी। फैक्ट्री में पहुंचकर उसने इस मैली चादर को टांगने के लिए कांच का शो केस बनाने का आदेश दिया था। और उसी दिन अपनी फैक्ट्री में हिन्दी सहायक की भर्ती के लिये खुले साक्षात्कार का विज्ञापन भी शहर के सारे अखबारों में प्रकाशित करवा दिया था।
प्रतिदिन की तरह आज भी कोठारी साहब ने उसे फाइल लाकर दी थी। साक्षात्कार के लिये आये युवकों की संख्या अपेक्षाकृत आज कम थी। सबसे एक ही प्रश्न का उत्तर लिखवाया गया था-'शो केस में टंगी मैली चादर के बारे में दो शब्द लिखिये?' फाइल में लगे एक पेपर को वह सरसरी नज़र से पढ़ती थी और पलट देती थी। वह जो उत्तर चाहती थी वह किसी में उसे नहीं मिल रहा था। अन्तिम पेपर को पलट कर वह देखने लगी थी। ऊपर शीर्शक लिखा था...''मैली चादर''। और नीचे लिखी पंक्तियों को जब वह पढ़ने लगी तो हर शब्द के साथ उसके चेहरे की चमक बढ़ने लगी थी।
'गाँव से एक युवक जब नौकरी की तलाश में इस शहर में आया तो उसके थैले में थे बी. ए. पास करने के प्रमाण पत्र और यह फटी पुरानी मैली चादर। दिनभर वह नौकरी की तलाश में शहर मे भटकता और रात को किसी कोने मे यह चादर ओढ़कर सो जाता। इसी तरह उस रात भी वह एक पार्क में गहरी नींद में सोया हुआ था। अचानक किसी की चीख पुकार सुनकर उसकी आँख खुल गई। उसने देखा कुछ इंसानी दरिंदे एक युवती की आबरु के पीछे पड़े हुये थे। उन भेड़ियों ने उसके कपड़े फाड़ डाले थे। वे दरिंदे उसे नोंच लेना चाहते थे, कि अचानक वह उनकी पकड़ से छूट भागी। बदहवास होकर वह दौड़ रही थी कि अचानक ठोकर खाकर गिर पड़ी। वह घबरा गई एक बार फिर मदद के लिए च़ीख पड़ी थी। और तभी वह युवक उसकी मदद करने दौड़ पड़ा था। इस मैली चादर से उसने उस अबला के नंगे बदन को ढ़क दिया था। और स्वयं उन इंसानी दरिंदो से भिड़ गया था।
यह पढ़कर वह आत्ममुग्ध हो उठी। उसके तन-मन में हर्ष की लहर दौड़ गई उत्सुक होकर वह बोल पड़ी-
''कोठरी साहब... आज मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया है। आप इस युवक को रोक लीजिये। बाकी सब लोगों को जाने दीजिये। इसका नाम है भारत कुमार।''
अपने चेम्बर से निकल कर उसने स्वागत कक्ष में प्रवेश किया। वहाँ एक कुर्सी पर वह अकेला बैठा हुआ था। दुबला पतला लम्बा शरीर, साधारण कपड़े और शालीन चेहरा। उसे देखकर वह खड़ा हो गया। मंत्रमुग्ध सी होकर कुछ क्षणों तक वह उसे देखती रही। फिर शो केष में टंगी उस मैली चादर पर दृष्टि गढ़ाकर बोली-
''मि. भारत... यह चादर ओढ़कर वह लड़की चली गई, और तुम उन जानवरों से लड़ने लगे। फिर क्या हुआ?''
''मैडम... बहुत देर तक मैं उन लोगों से लड़ता रहा था। लेकिन वे चार थे, और मैं अकेला था। धीरे-धीरे मेरी शक्ति क्षीण होने लगी थी। एक घूंसा मेरे सिर पर पड़ा और मेरी आँखों में अंधेरा छा गया था। दूसरे ही क्षण मैं बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा था। जब मुझे होश आया, तो मैंने स्वयं को एक सरकारी अस्पताल में पाया था। कई दिनों तक मैं वहां भर्ती रहा हूँ। कल ही मुझे अस्पताल से छुट्टी मिली है।
''मौत के मुँह में तुम्हें अकेला छोड़कर वह भाग गई। क्या तुम्हें उस युवती से कोई शिकायत नहीं हैं?''
''नही मैडम... मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है। वह तो एक अबला थी, क्या कर सकती थी बेचारी। और उसकी मदद करना मेरा फर्ज था।''
यह सुनकर उसके मन में खुशी की लहर दौड़ गई। वह मुड़ी और उसकी आँखों में देखकर बोली-
''भारत... क्या तुम उस युवती को पहचान सकते हो?''
''नहीं मैडम... मैं उसे नहीं पहचानता....वह कौन थी....कहां से आई थी....और कहां चली गई....मैं कुछ नहीं जानता हूँ।''
कुछ क्षणों तक वह अपलक उसकी आँखों में देखती रही। देखते ही देखते उसके चेहरे पर गंभीरता उभर आई और शब्द भारी होकर होठों से फूटे।
''मुझे गौर से देखो भारत....वह युवती मैं ही थी''
यह सुनकर वह चैंक पड़ा। फटी हुई आँखो से उसे देखता रहा-''मैडम आप!''
''मैडम नही सुमन... हाँ भारत मुझे तुम सिर्फ सुमन कहकर ही पुकारोगे। मैं अहंकार में डूबी हुई एक मार्डन लड़की थी। अपने डैडी की करोड़ो की जायदाद की एकमात्र वारिस थी। इस इण्डस्ट्रीज में काम करने वाले कामगारों को मैं हेय दृष्टि से देखती थी। पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति मुझे अति प्रिय लगते थे। अंग्रेजी सभ्यता का रंग मुझ पर इस कदर चढ़ गया था कि अपने देष व देशवासियों से मुझे नफरत होने लगी थी। डैडी मुझे समझाने का प्रयास करने लेकिन उनकी बातें भी मुझे महत्वहीन लगती थी।
आखिर उस रात मेरा अंहकार चूर हो गया। उस घटना ने मेरे विचारों की दिशा ही बदल दी। हमारा देश यहाँ की सभ्यता, यहां की संस्कृति और मेहनत मजदूरी करने वाले लोग मुझे प्रिय लगने लगे। मेरा मन उस शख्स के प्रति आसक्त हो उठा जिसने मेरी रक्षा की थी। तुम तक पहुँचने के लिए मैं व्याकुल हो उठी थी। हर जगह मैंने तुम्हारी तलाश की लेकिन तुम कहीं नहीं मिले। मैं हताश हो गई थी। अचानक एक दिन यह योजना मेरे दिमाग में आ गई। और आखिर आज इस मैली चादर ने हमें मिला ही दिया है। चलो भारत घर चलो, डैडी तुमसे मिलना चाहते हैं''। उसने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया। एक दूसरे की आंखों में देखकर दोनों मुस्कुरा पड़े। फिर दोनों साथ-साथ आगे बढ़े और रिसेप्शन हाल से बाहर निकल गये।