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रिफ्रेश का बटन दबाकर तरो ताज़ा हो गया
June 13, 2019 • अरविन्द शुक्ला ‘अरविन्दो’

हमारी जिन्दगी एक रेलगाड़ी की तरह है, जो कि समय-समय पर अलग-अलग स्टेशनों पर आ कर रुक जाती है। जिन्दगी के अलग-अलग आयाम, अलग-अलग मंजिलों की तलाष करने लगते हैं। किसी बहते हुए पानी की तरह तमाम पत्थरों, कांटों और जंगलों में होता हुआ हमारा लक्ष्य हजारों अनुभवों को अपने मस्तिक में समेट लेता है। जिनकी यादें व्यक्ति की आँखों में आंसू लेकर आतीं हैं, ये आंसू की बूंदें कोई और नहीं बल्कि वही चोट खायी हुयी निर्मल जल हैं, जो अब बह रहे निकले, ऐसा एहसास एक व्यक्ति के हृदय में बहुत सी आत्मसंतुष्टि लेकर आती है और अपने आपको एक व्यक्ति शांत अनुभव करने लगता है। हमारे शरीर की रचना में ईश्वर ने हमें अनेकों अंग दिए हैं, जोकि भौतिक जगत में होने वाले सभी हलचलों को अनुभव करता है और मश्तिष्क में सुरक्षित करने लगता है। हमारी आंखें जो भी देखती हें, उसे चित्र रूप में मस्तिष्क में संकलित करती है। हमारा शरीर स्पर्ष को भी स्मरण करने लगती है। हमारा शरीर अपने आपमें एक जगत है। जो कि सम्पूर्ण ब्रह्याण की रचना करने के लिए पर्याप्त है। जब बच्चा पैदा होता है, तो उसका मस्तिष्क बिलकुल नया होता है। अपने चारों ओर होने वाली आवाजों, चित्रों ओर स्पर्ष को जब प्रथम बार अनुभव करता है, तब वही चित्र, स्पर्ष और आवाज उसके लिए आधार हो जाते हैं, जैसे जहां भी आप आपका जन्म होता है, वहां का जल आपको सबसे अधिक मीठा प्रतीत होता है। क्योंकि शिशुकाल में पहली बार जो पानी की बूंदें आपके मुंह में डाली गयी, आपके लिए वही पानी के स्वाद का आधार बन जाती है और अनेकों वर्षो बाद जब भी आप अपने गांव जायेंगे और वहां का पानी पियेगें तो वह आपको सबसे मीठा प्रतीत होगा या किसी अथवा किसी भी और स्थान का जल जोकि आपके गांव के जल से मिलता-जुलता है, पीने पर आपको खुशी मिलेगी और संतुष्टि मिलेगी। क्योंकि आपके मस्तिष्क में पानी का जो भी स्वाद सुरक्षित है उसका सौ प्रतिशत मिलान हो जाता है। फिर चाहे ही आपके मित्र आपसे कहते हों कि आपके गांव का पानी खारा है।
हाल ही में जब अपने एक कार्य में अपने में कुछ थकावट अनुभव करने लगा, तब मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरी उम्र का बढ़ना शुरू हो गया है। और मेरे शरीर की मांसपेशियों वह शक्ति और ऊर्जा का एहसास नहीं कर पा रही हैं, जो कुछ वर्ष पहले मेरे पास हुआ करती थी। मुझे लगने लगा कि यह सब इतनी जल्दी कैसे हो गया। अभी तो जिन्दगी के दो ही अक्षर तो पढ़ पाया अभी हजारों ख्वाहिशें तो अधूरी ही रह गयी हैं। यह बातंे मेरे मन में एक बेचेनी को जन्म देने लगी, कई बार मैंने अपने आपको संभाला और उसे प्रेरित कर अधिक काम करने के साथ ही अथक परिश्रम करने लगा। लेकिन सप्ताहांत मेरे साथ यही होने लगा, तभी मेरे मन में ख्याल आया कि कई वर्ष हो गये हैं क्यों न अपने गांव होकर आयें। मेरे सतर्क मुझसे कह रहे थे, गांव जाकर तुम्हे जरूर अच्छा लगेगा और मेरे साथ ठीक वैसा ही हुआ। गाँव से लौटने के पश्चात् जैसे स्वयं ही रिफ्रेश का बटन दबाकर तरो ताज़ा हो गया हूँ।