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शनि द्वारा उत्पन्न योग
November 28, 2019 • डी.एस. परिहार

शनि ग्रह अन्य ग्रहों के साथ योग करके अनेक प्रकार के रातयोग और दुर्योग बनाता है। जिनमे से कुछ योग  निम्नलिखित हैं।
1. यश योग- जब शनि स्वग्रही या उच्च का होकर लग्न से केन्द्र मे हो तो षष योग होता है। जातक को प्रतिष्ठित जाॅब करता है। उसके आधीन कुछ लोग काम करते हैं। भृगु नाड़ी के अनुसार जब शनि स्वग्रही या उच्च का होकर कहीं भी हो तो यश योग होता है।
2. सूर्य-शनि योग-
3. चन्द्र-शनि योग (विश योग)
4. मंगल शनि योग- रोजगार बाधा योग
5. बुध- शनि योग काॅमर्स योग
6. गुरू- शनि योग महाभाग्ययोग
7. शुक्र शनि योग धन योग 
8. शनि राहू योग नन्दी व नर हत्या योग
9. शनि केतु योग लंगोटी योग या वात विकार योग
शनि के शष्ठाष्ठक योग:-
1. यदि मंगल और राहू या शनि और राहू परस्पर  6 या 8 वें भाव मे हो तो नाग (सर्प) का शाप हो। यदि मंगल और केतु या शनि और केतु परस्पर  6 या 8 वें भाव मे हो साधू का शाप हो।
2. यदि मंगल शनि से 6 वें भाव मे हो तो जातक को उसके जाॅब मे शत्रु सक्रिय होंगें और जाॅब मे घाटा होगा दोनो परस्पर शष्ठाठक हो तो दुःमरण व दुर्घटना योग बनाये।
3. 1. शनि-चन्द्र का  द्विदादश योग या शष्ठाठक योग। इस दोष का वर्णन भृगु संहिताः प्रैडिक्टिव टैकनिक डिस्फेरेड के लेखक शंकर अडवाल ने किया है। जिसे उनके पिता श्री रमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने होशियारपुर, पंजाब की भृगु संहिता से संग्रहित किया था शनि चन्द्र का योग विष कहलाता है। जो पुरूषों मे निराशा के दौरे तथा रोजगार मे मंदी, गिरावट और यात्राकारी जाॅब देता है। और महिला जातक मे यह निराशा के दौरे के साथ मासिक धर्म मे गड़बड़ी, स्त्रियों के रोग, हारमोनल डिस्टरबेंन्स देता है। कमर दर्द, संतान प्राप्ति मे बाधा, हिस्टीरिया, अति क्रोध देता है भृगु नाड़ी मे इसे पिशाच पीड़ा योग कहा गया है। लेकिन पंजाब की भृगु संहिता मे इसे वैवाहिक जीवन मे मंगली दोष के समान अतिघातक माना गया इस दोष से युत अनेक कुण्डलियों सौ फीसदी असाध्य संतानहीनता, तलाक, पति या पत्नी मे से किसी एक को अति लंबी गंभीर बीमारी, या विधवा या विधुर बनाता है।
2. गुरू शनि यदि परस्पर 6 या 8 वें भाव मे हो तो 2. गुरू शनि यदि परस्पर 6 या 8 वें भाव मे हो तो अचानक जातक का आर्थिक और समाजिक पतन हो जाता है। शनि गुरू परस्पर 2/12 या 3/11 मे कम आयु मे कमाये जातक की इच्छायें पूरी हों। सूर्य से शनि काफी दूरी पर कोई महत्वाकांक्षा नहीं। जातक की इच्छायें अति विलंब से पूरी हों।
- शनि के आगे चन्द्रमा जाॅब घर से दूर हेगा।
- शनि से 2 या 12 या त्रिकोण मे कोई ग्रह ना हो कोई स्थाई जाॅब ना हो।
- शनि से 7 वें गुरू एक बड़े संस्थान मे जाॅब होगा।
- 5. शनि ये 3 वें सूर्य राज सरकार मे प्रभाव।
- शनि शुक्र की अति निकट अंशों मे युति हो जातक का विवाह हो और उसी समय वह जाॅब परिवर्तन करे। गुरू शनि व केतु से त्रिकोण मे कर्मयोगी हो।
- शनि व केतु से त्रिकोण मे गुरू हठयोगी हो। इच्छाशक्ति व श्रम से सफलता प्राप्त करे। त्रिकोणेष से शनि/गुरू का गोचर भागयोदय प्रगति दे त्रिकेश से शनि का गोचर कष्ट दुर्भाग्य दे त्रिक भाव से शनि का गोचर कष्ट दुर्भाग्य दे।
- चतुर्थेश से षनि का गोचर अवास परिवर्तन करे।
- सप्तमेश से शनि का गोचर विवाह।
- नवमेश से शनि का गोचर पिता को लाभ दे।
- त्रिक भाव से वक्री शनि का गोचर कष्ट मिटे। गुरू से शनि का गोचर प्रमोशन व स्थान परिवर्तन होगा।
- शनि से त्रिकोण मे केतु जाॅब मे समस्या हो यदि गुरू की दृष्टि हो तो समस्या सुलझ जायेगी हो।
- शुक्र से त्रिकोण शनि गोचर पत्नी को रोग हो स्त्री जातक मे मंगल से त्रिकोण शनि गोचर पति को रोग देगा शु़क्र शनि योग विवाह विलंब।
- मंगल से शनि का गोचर दुर्घटना देगा। शनि से राहू का गोचर या राहू से शनि का गोचर भारी कष्ट दे।
- किसी भावेश से त्रिकोण मे शनि का गोचर प्रथम भाव को लाभ देगा। बुध शुक्र शनि योग जातिका प्रेमी के साथ सुखी रहे। पुरूष जातक मे गुरू या शनि का कई से ग्रहों से संबध कई स्त्रियों से संबध बनाये।
- शुक्र पर षनि राहू केतु की दृष्टि हो तो पुरूष का विवाह ना हो। स्त्री जमांक मे मंगल पर शनि राहू केतु की दृष्टि हो तो स्त्री का विवाह ना हो। इन गुरू का प्रभाव उपचारों से लाभ होगा शनि षुक्र योग पत्नी या जातिका जाॅब करे तथा विवाहोपरान्त समृद्धि बढेगी।
- गुरू/शनि का शुक्र से योग पुत्री का जंम व शनि/गुरू का सूर्य से संबध पुत्र का जंम हो।
- शनि से त्रिकेाण मे शु़क्र सुखी वैवाहिक जीवन। वृष राशि मे हो धनी व प्रभावशाली व्यक्ति हो। लेकिन जिस भाव मे जाये उस भाव से संबधित दुर्भाग्य देंगें।
- मंगल की राशि मे शनि केतु युति मशीनों से संबधित जाॅब हो।
े- शनि से गुरू का गोचर नया जाॅब मिले या प्रमोशन होगा।
- शनि से आगे कई भाव खाली जातक को जाॅब मे लंबे समय तक भटकना पड़े कोई मदद नही करे जातक सेल्फ मेड मैन हो।
- शनि से आगे कई भाव खाली जातक को जाॅब मे लंबे समय तक भटकना पड़े कोई मदद नही करे जातक सेल्फ मेड मैन हो।
- तुला मे मंगल 7 वें मेष मे शनि 12 वें राहू द्वितीय बुध। 30 वर्ष से विवाह ना हो। जब शनि द्वितीय पर्याय मे शुक्र से निकले तो 34 वर्ष मे सुख मिले।
- तुला मे मंगल 7 वें मे वक्री गुरू शनि। शुक्र मंगल मे राशि परिवर्तन है। विवाह विलंब।
- शनि मंगल परस्पर 180 अंष पर विवाह विलंब। शनि से 12 वें केतु या शनि गुरू के मध्य केतु विवाह विलंबशुक्र शनि योग का राहू केतु से संबध पुरूष का विवाह ना हो। स्त्री जातक मे मंगल शनि योग का राहू केतु से संबध स्त्री का विवाह ना हो। गुरू शनि योग से 7 वें शुक्र व शुक्र शनि मे राशि परिवर्तन जातक के द्वितीय पत्नी या रखैल होगी।
- स्त्री जमांक मे शनि मंगल योग चन्द्रमा या बुघ गुरू से राशि परिवर्तन हो महिला घर से भागे। पुरूष जातक मे बुध चन्द्रमा या शुक्र चन्द्र मे राशि परिवर्तन हो पुरूष लड़की भागाये।
- गुरू मकर मे शनि केतु युत आगे चन्द्र फिर शुुक्र पत्नी के अलावा प्रेमिका। चन्द्रमा  प्रेमिका व शुुक्र पत्नी होगी।
- शुक्र व गुरू के मध्य चन्द्र पत्नी भागे।
- शुक्र पर मंगल की दृष्टि या शनि से द्वितीय शु़क्र या मंगल शुक्र या गुरू शुक्र 6/8 मे या गुरू से 7 वें सूर्य व मंगल वैवाहिक झगड़ें। मेष मे बुध द्वितीय से त्रिकोण (6, 2,10 भाव) मे मंगल वैवाहिक झगड़ें। 
- गुरू से 12 चें शनि या शुक्र पर शनि की दृष्टि या शनि मंगल युति हो व मंगल शुक्र मे राशि परिवर्तन हो विवाह विलंब अवैघ संबध हो।
- शनि से 12 मंगल विवाह विलंब या शुक्र शनि मे राशि परिवर्तन हो तथा शुक्र से 7 वें गुरू शनि युति हो, विवाह विलंब। मंुगल शनि सिंह में छठे मकर का नीच का गुरू जातक क्रोधी हो।
- मंगल शनि केतु विवाह विलंब दे। शनि से 5 पें केतु 7वें मंगल। मंगल शनि व राहू के मध्य स्त्री जातक मे वैवाहिक बाधायें आयें। विवाह बाधा या अविवाह योग।
- गुरू से 11 वें शुक्र या शनि से 10 वें शुक्र पत्नी द्वारा धनलाभ हो।
- मंगल से 7 वें गुरू/शनि का गोचर मकान, जायदाद खरीदे।
- शनि से शनि गोचर रोग।
- शुक्र से 7 वें गुरू/शनि का गोचर पत्नी द्वारा धनलाभ हो।
- शुक्र से 1, 4, 7, 11 वें शनि का गोचर विवाह देगा।
- मीन मे चन्द्र गुरू कफ रोगी गुरू शनि योग या द्वितीय मे शनि वात रोगी।
- चन्द्रमा से द्वितीय शनि केतु दो पापी ग्रही जं के समय माता को कष्ट हों।
- शनि का चन्द्र राहू से गोचर जातक ठगी करे।
- शनि व शनि केतु योग कुल देवता का प्रतीक है। शनि केतु बड़ा भाई दूर स्थान पर रहे। बुध केतु धर्म संस्थान, मंगल केतु नाग दोष, शनि केतु सरकारी जाॅब शनि चन्द्र पेय पदार्थों का व्यापार, चन्ंद्र शनि व्यवसायिक संस्थान।
- लग्न, चन्द्र तथा चतुर्थेश से षष्ठेशों के राशि अंशों को जोड़ो जो राशि अंश प्राप्त हो उस पर शनि का गोचर माता को मृत्यु या घोर कष्ट देगा।
- तृतीयेश और द्वादेश के राशि अंशों को जोड़ांे जो राशि अंश प्राप्त हो उस पर शनि का गोचर भाई बहनांे को मृत्यु या घोर कष्ट देगा या तृतीयेश और द्वादेश से षष्ठेशों के राशि अंशों को जोड़ो जो राशि अंश प्राप्त हो उस पर शनि का गोचर भाई बहनांे को मृत्यु या घोर कष्ट देगा। 
- तृतीयेश व अष्ठमेश के राशि अंशों को जोड़ो जो राशि अंश प्राप्त हो उस पर केतु का गोचर जाॅब मे कष्ट व अशुभ स्थानान्तरण होगा।
- शनि, गुलिक व राहू के के राशि अंशों को जोड़ो जो राशि अंश प्राप्त हो उस पर मंगल, केतु, शनि का गोचर मृत्यु देगा। शनि से गुरू का गोचर कष्ट देता है।
- शनि से द्वितीय गुरू धनहानि देता है।
- शनि से चतुर्थ गुरू घाव व दुर्घटना देता है।
- शनि से 7 वें दुर्भाग्य व शत्रुता देता हैं।
- शनि से 8 वें रोग व धनहानि देता हैं।
- शनि से नवें गुरू अशुभफल देता है।
- शनि से 10 वें गुरू चोट, झगड़े देता है।