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शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने वाले शिक्षा मित्र हुए बेपटरी
July 19, 2019 • राजीव प्रताप सिंह ‘सहायक संपादक’

शिक्षकों की कमी तथा शिक्षकों के द्वारा पढाई के अतिरिक्त कार्यो जैसे जनगणना, पोलियो अभियान, मिड डे मील सहित तमाम कार्यो को करने के परिणामस्वरूप (मसलन पढाई का कार्य छोड़कर अन्य सरकारी कार्य करना) शिक्षकों की कमी पूर्ति के लिए उप शिक्षक शिक्षा मित्रों की नियुक्ति सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत केन्द्र सरकार के 65 प्रतिशत तथा राज्य सरकार के 35 प्रतिशत के सहयोग से प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त करने की योजना 2001 में बनाई गई थी। उत्तर प्रदेश में भी यह योजना लागू की गई तथा इसी के अंतर्गत 11 माह के शिक्षा सत्र के लिए संविदा पर शिक्षक रखने की योजना की शुरूआत की गई इसमें व्यवस्था भी निर्घारित की गई कि गांव के युवक अथवा युवती का चयन ग्राम शिक्षा समिति के प्रस्ताव पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति के माध्यम से चयन कर नियुक्त किया गया। तथा संबन्धित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में इन्हें एक माह का प्रशिक्षण भी दिया गया। वहीं चयन शुरू से ही विवादों के साये में रहा और शायद ही कोई नियिुक्ति रही हो जिस पर विवाद न रहा हो।
बहरहाल सरकार का यह प्रयास सफल रहा तथा प्राथमिक शिक्षा में शिक्षा मित्रों के चयन के बाद से पुनः गति पकड़नी शुरू कर दी। इसी को देखते हुए राज्य सरकार ने 2006 में इनका मानदेय 2250 रूपये से बढ़ाकर 3500 रूपये प्रतिमाह मानदेय देना शुरू किया आगे चलकर शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के पश्चात् इन्हें प्रशिक्षित कर सहायक अध्यायपक के पद पर समायोजन किया गया जो बाद में यह समयोजन विवाद का रूप ले लिया तथा मामला न्यायालय में चला गया। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2015 में अपने एक निर्णय में बिना टी.इ.टी. पास शिक्षा मित्रो के समायोजन पर रोक लगा दी बाद में 25 जुलाई 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्रो के सहायक पदो पर समायोजन निरस्त कर दिया।
प्राथमिक शिक्षा मेें की रिकार्ड बदलाव लाने वाले शिक्षा मित्रो को न्याय पालिका का यह निर्णय काफी भारी पड़ा। व्यक्तिगत तौर पर 3500 मानदेय पाने वाले शिक्षा मित्रो के चयन के बाद पटरी से उतर चुकी प्राथमिक शिक्षा पुनः गति पकड़ना शुरू कर दी सहायक अध्यापक बनने के बाद तगभग 40000 रूपये वेतन होते ही इनके जीवन शैली रहन-सहन एवं सामाजिक रूप से इनका जीवन स्तर काफी ऊंचा हो गया। लेकिन ज्योही न्यायालय का निर्णय 172000 शिक्षा मित्रो के जीवन में वज्रपात बन कर आ पड़ा। काफी शिक्षा मित्र अवसाद में चले गये तथा बहुतों ने आत्महत्या कर ली। सूत्रों की माने तो अब तक काफी संख्या में शिक्षा मित्रों ने अपनी जान दे चुके है। सरकार को इस विषय पर सहानुभूति पूर्वक विचार करना चाहिए। वैसे कई संगठन भी अपने लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन आने वाला समय ही बताएगा कि शिक्षा मित्रो की स्थिति में सुधार होगा अथवा नहीं?