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सत्संग मनुष्य के दिशा निर्धारण का सशक्त माध्यम है
August 10, 2019 • युवामित्र ‘सहायक संपादक’

सत्संग-स्वाध्याय, अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ एवं वैचारिक शुचिता ही श्रेष्ठ जीवन की आधारशिला है। वस्तुतः मनुष्य मन में प्रस्फुटित विचार ही कालांतर में व्यवहार और संस्कारों के रूप में परिणित होते हैं। अतः अपने मनोगत विचारों के प्रति सजग रहें ..! महापुरुषों का संग एवं नित्य सत्संग ही दिव्य जीवन की आधारशिला है। महापुरुषों का सत्संग, शास्त्रों का अध्ययन और गुरु की उपस्थिति से साधक को मार्गदर्शन और प्रेरणा मिलती है। भ्रम दूर होता है और उनकी दिव्य कृपा से सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। महापुरुषों की सन्निधि ज्ञानार्जन, पुण्यार्जन एवं अन्तःकरण की परिशुद्धि में सहायक है। अर्थात् सत्संग द्वारा अज्ञान जनित विकारों से मुक्ति और श्रेष्ठतम जीवन जीने की पात्रता विकसित होती है, सत्संग मनुष्य के दिशा निर्धारण का सशक्त माध्यम है। दिशा ही मानव की दशा को निर्धारित किया करती है। हमारे मनीषियों द्वारा सत्संग-प्रवचनों का प्रावधान मात्र इसलिए किया गया है ताकि मायावी संसार में विचरण करने वाला मनुष्य सत्य विचारों का संग करते हुए सही दिशा की ओर स्वयं को अग्रसर कर सके। संतजनों का सानिध्य प्राप्त करना और उनके द्वारा प्रदत्त महान सुविचारों के अनुसार अपने जीवन को चलाना, यही उन्नत जीवन की आधारशिला है। पूर्ण संत का समागम 'महातीर्थ' कहा गया है। कबीरदास जी ऐसे संत की संगत को प्राप्त करना सौभाग्य की निशानी बताते हुए कहते हैं, 'कबीरा संगत साधु की सांई आवे याद । लेखे में सोई घड़ी बाकी दिन बरबाद'।। सत्संग की पावन गंगा में डुबकी लगाने के उपरान्त ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतरों के कलुष धुल जाते हैं और समस्त पापों का नाश हो जाता है। सत्संग का तो अर्थ ही अत्यन्त अर्थपूर्ण है। सत्य ़ संग = सच का साथ। सत्य तो मात्र ईश्वर कहे गए हैं। शास्त्र कहता है, 'ब्रह्म् सत्यम् जगत् मिथ्या ...'। अर्थात् इस नश्वर और असत्य संसार में मात्र परमात्मा ही एकमात्र सत्य है। अतः सत्य का संग ही सत्संग है। इस विलक्षण सत्संग से ही विवेक का जागरण होता है। विवेक के जागरण से मनुष्य अपने जीवन की समस्त समस्याओं का निराकरण सहज ही प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार सत्संग के द्वारा ही वह अपने अनमोल मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य की पूर्ति करते हुए लोक तथा परलोक में सद्गति को प्राप्त हो जाता है ...।
सकारात्मक विचार आपको उत्थान की ओर लेकर जाते हैं और सशक्त बनाते हैं। सही सोच शांति, आनंद और संतोष प्राप्त करने का उपाय है। अतः सकारात्मक सोच रखें। कोई काम करने से पहले संकल्प, विचार एवं अपने विश्वास को मजबूत करें। जीवन में हर मनुष्य को निश्चित स्थान पर पहुंचने के लिए अपना लक्ष्य निश्चित करना चाहिए। उसे पाने के लिए गंभीर और सकारात्मक चिंतन आवश्यक है, जो बिना आत्मविश्वास के संभव नहीं है। व्यक्ति जब तक स्वयं पर विश्वास नहीं रखता है, वह आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति छोटे से छोटा काम भी आत्मविश्वास से करता है, उसकी सफलता तय है। आत्मविश्वास ही सफलता की चाबी है। महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय हमारी सोच सकारात्मक हो, तभी रास्ता निकलेगा, जो जीवन में लक्ष्य और उपलब्धियां प्राप्त करने में सहायक होगा। संसार की प्रत्येक वस्तु अधूरी है। सकारात्मक सोच और प्रयास से हर वस्तु को संपूर्ण किया जा सकता है। बस इसके लिए थोड़ा धैर्य रखने की आवश्यकता है। आर्ट ऑफ लिविंग की तरह ही आर्ट ऑफ थिंकिंग भी जीवन की एक निरंतर प्रक्रिया है। सही दिशा में सही सोच ऊर्जा देती है, जो स्थिति को नियंत्रण में रखने की कला सिखाती है। यह कला आने के बाद मनुष्य को छोटे-छोटे अवसरों पर भी खुशियाँ मिलेगी और सुखी जीवन बिता सकेंगे ...।

सतसग व कथा श्रवण से विचारों में पवित्रता आती है। कथा एक पवित्र विधा का नाम है। यह कर्तव्यों की मीमांसा है। इससे शिष्टाचार, धर्माचार और लोकाचार का ज्ञान होता है।  भारत के ऋषि-मुनियों ने शुद्धता की पहचान बताई है। मनरूपी कामनाओं पर विराम नहीं लगेगा तो चित्त भी शांत नहीं होगा। लोग बिना श्रम के ही साधन मिल जाए, यह चेष्टा रखते है। इसलिए लंबे समय तक की गयी साधना ही सिद्ध होती है। हमें धार्मिक नहीं आध्यात्मिक बनना है। जीवन संघर्षो में सहज और सम बने रहने की कला ही अध्यात्म है। जो भाव हम में पवित्रता भरे, शुचिता भरे, उल्लास और आवाहन भरे, ऊर्जा और आनंद भरे, प्रेम और करुणा भरे वही अध्यात्म है। सुख-दुःख से परे निरंतर आनंद, प्रसन्नता और अपने अस्तित्व की स्वीकार्यता यही तो अध्यात्म है। हम जब जन्म लेते हैं तब एक व्यक्ति होते हैं, फिर धीरे-धीरे हम व्यक्तित्व बनने की प्रक्रिया से गुजरते हैं। अतः जैसा विचार होगा, जैसा भाव होगा और जैसा अन्न ग्रहण करेंगे, वैसा ही चित्त बनेगा। इसीलिए साधक को इन तीनों पर ध्यान देना होता है। हम में शुभता आये, हमें बाधाएँ तोड़े नहीं, हमारी ऊर्जा किसी के अनिष्ट में खर्च न हो और हम सकारात्मक ऊर्जा के अखंड स्रोत बनें तो हमें अपने चिंतन में मधुरता लानी होगी। अतः केवल मैं और मेरा के भाव से ऊपर उठ कर प्राणी मात्र के कल्याण की कामना का भाव स्वयं के भीतर जगाना होगा। और, तब आप पायेंगे कि आपका दुःख, संकट, क्लेश आदि स्वयं ही नष्ट हो रहा है ...।