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आ अब लौट चलें
May 19, 2020 • पवन उपाध्याय ‘वरिष्ठ पत्रकार’ • Views

कोरोना के संक्रमण में सारे प्रवासी अब अपने घरों को लौट रहे है । आखिर वो कौन सा कारण है कि इस बीमारी से लोग इतना डर गए है और अपने गाँव को लौटने को मजबूर है,  मिट्टी की सुगंध उनको अपनी ओर क्यो खींच रही है। अगर पुरानी पहले की बाते याद करे तो देखते है कि हमारे बड़े बुजुर्गों ने हमे बताया था कि प्लेग, हैजा, चेचक के चलते पूरा का पूरा गांव साफ हो जाता था, लोग गाँव छोड़कर सिवान में बस जाते थे बाग-बगीचे, खलिहान में रहने के लिए चले जाते थे। उस समय भी संक्रमण एक दूसरे से ही फैलता था लोग साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते थे। परिस्थितियां लगभग वही है केवल रोग बदल गया है, रोग के लक्षण बदल गए है, उस समय भी इन रोगों का कोई सटीक उपचार नहीं था और आज भी कोरोना की कोई दवा नही है। 
आज के आर्थिक युग मे लोगों द्वारा किसी न किसी तरह से प्रकृति के नियमो का पालन न करना और प्रकृति के विरूद्ध कार्य करना, प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना उसका दुरूपयोग व दोहन करना इस बीमारी को और विकराल बनाती है। प्रकृति अपने को संतुलित करती है । अब जबसे पूरी दुनियाँ में सर्व बंदी (लाॅकडाउन) हुई है तबसे वातावरण स्वच्छ, पर्यावरण साफ, प्रदूषण समाप्त चाहे वो वायु या ध्वनि हो, नदियां स्वच्छ निर्मल, ओजोन परत भर गई। पहले आपको एक और उदाहरण देता हूँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा लेकिन उस चेतावनी को लोग समझ नही पाते  क्योकि लोग भागम-भाग में कुछ देखते व समझते ही नही, बात सितंबर 2013 की है मैं बनारस गया था तो देखा कि अस्सी घाट पर गंगा जी के किनारे मिट्टी व गंदगी का अंबार लगा हुआ है तो पता चला कि गंगा जी मे बाढ़ आई थी और बाढ़ के उतरने के बाद ये मलवा यही रह गया इसका मतलब की गंगा जी अपने को स्वयं ही साफ कर लिया। 
 कुछ इसी तरह प्रकृति ने अपने को साफ-सुथरा कर लिया चाहे वो कोरोना ही कारण क्यो न बना हो। कोरोना का प्रकोप उन देशों या उन क्षेत्रों में ज्यादा हुआ जहां लोग पूरी तरह से प्रकृति से दूर रहे, चाहे वो रहन-सहन हो या खान-पान हो। हम इसको भारत से जोड़ते है भारत के गाँवो से जोड़कर देखते है। गाँव मे बच्चे मिट्टी में खेलते है और उसका लाभ ये होता है कि बच्चो के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। रात की बची रोटी अगली सुबह खाते थे वो भी हमारे लिए लाभकारी होता है, दोपहर में गुड़ का शर्बत खाने के लिए लाई चना लेते थे। भोजन करने की जगह की नियमित गाय के गोबर से लिपाई होती थी, व्यक्ति हाथ पैर धुलकर भोजन करने बैठता था। लेकिन शहरी जीवन मे लोग जूता-चप्पल पहन कर कुर्सी मेज पर बिना सफाई किये खाने बैठ जाते है । वहीं आज क्या है कि कोई 8 घंटे की बासी रोटी नही खाता वही 4 दिन का बासी पावरोटी 8 दिन बासी बन, महीनों बासी रस्क बड़े चाव से खाता है, आज बच्चे पास्ता, केक, बर्गर, पिज्जा, चाॅकलेट आदि बड़े चाव से खाते है और मांए भी जल्दी के मारे भूखे बच्चे को 2 मिनट वाली नूडल्स-मैग्गी खिलाती हैं। बच्चो के सवेरे उठने रात में सोने का कोई समय नहीं रहा। खेल के मैदान में अब खेल नहीं रहा, उसकी जगह घरों के अंदर मोबाइल ने ले लिया। इससे कितना मजबूत बच्चा होगा और ये ही नहीं दूध के नाम पर बाजार का दूध जो गाय और भैंस का मिश्रण होता है और शुद्धता पता नही उसमे स्वाद लाने के लिए कोई चूर्ण जो हार्लिक्स, बूस्ट आदि नामो से आता है को मिलाकर बच्चो को पिला दिया जाता है। आपको गाय भैस पालते बहुत ही कम लोग दिखेगे लेकिन दूध, पनीर, छाछ, मिठाई जितनी चाहिए उतने मिल जाएगी इसी से इसकी शुध्दता का अंदाजा लगा लीजिये। 
 अब देखते है कि लोग अपने घरों को क्यो लौट रहे आखिर एक ही बात सबके दिमाग मे एक साथ कैसे आ गयी । इसका कारण है शहरों का दिखावटी जीवन, भागम-भाग वाली दिनचर्या, रिश्तों का कोई महत्व नहीं रह गया, यानी समाज से, रिश्तों से दूरी स्थापित हो गयी। बाहर रह रहे लोगों के बच्चे गाँव को जानते ही नही, वो अपनी पहचान से भी दूर हो गए है, लेकिन कोरोना के डर ने लोगांे को वापस अपने जड़ो से जुड़ने के लिए मजबूर कर दिया। ये बात तो साफ हो गयी कि हमारे गाँव का जीवन ही असली जीवन है, गाँव मे पैसा कम है पर रिश्तों की डोर मजबूत है।
 भारत मे कोरोना का प्रकोप कम क्यो है इसको देखते है तो ध्यान दीजिए कि ठंड के बाद ही होली के समय हम होलिका दहन करते है जिसमे रेड़ का पेड़ होता है यही रेड़ का पेड़ बहुत तरह के वायरस को समाप्त कर देता है। उसके बाद नवरात्रि आती है जिसमे जगह-जगह हवन होते है वो हवन भी बहुत तरह के वायरस को समाप्त करते है और फैलने से रोकते है। बरसात के बाद फिर शारदीय नवरात्रि आती है जिसमे हवन होता है जो हमें पूरे वर्ष हमको सुरक्षित रखते है। हमारा सादा जीवन ही हमारे जीवन का आधार है। इससे एक बात साफ हो गयी कि लोग प्रकृत के पास प्रदूषण से दूर रहना चाहते है अपनी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, त्योहार, खान-पान से जुड़ना चाहते है यही सारी बाते लोगों को अपने गाँवो में लौटने को मजबूर कर रही है, कोरोना तो माध्यम बन गया।