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आधुनिकता की आड़ में मौज-मस्ती
November 8, 2019 • पंकज वैश्य

आज के दौर में किषोर व किशोरियों में बढ़ता असभ्य व्यवहार वाकई चिन्ता का विषय है। उत्तेजना या आवेश में आकर वे ऐसा कुछ कर बैठते हैं। जिससे परिवार की मान-मर्यादा को गहरा धक्का लगता है। पकड़े जाने पर शर्मिन्दगी भी होती है। इसके बावजूद कुछ तो ऐसे होते हैं कि जो बार-बार गलतियाँ करने पर भी नहीं सुधरते। आधुनिकता की आड़ में मौज-मस्ती करने वाले किशोर भूल जाते हैं कि उनके भद्दे आचरणों का अंजाम क्या होगा? वे नशा, सेक्सुअल गतिविधि और कई दूसरे खतरे मोल लेकर जीवन को बेहद रोमांचक बनाए रखना चाहते हैं। अधिकतर समय दोस्तों के साथ घूमने-फिरने, सिनेमा देखने, पार्टियों में बर्बाद करते हैं। अक्सर ऐसे बच्चे उन घरों से आते हैं जहाँ रूपये-पैसे की कोई चिन्ता नहीं होती। उनमें अपनी सभी इच्छाओं की तत्कालिक पूर्ति करने और दूसरों को अपने नियन्त्रण में रखने की प्रबल इच्छा होती है। आर्थिक रूप से कमजोर किशोर भी इनसे प्रभावित होकर साथ मिल जाते है। बाजारीकरण, प्रतिस्पर्धा और हिंसा  के माहौल में एक दूसरे से किसी भी तरह आगे निकलने की होड़ आजकल हर किशोर युवा में देखी जा सकती है। जो छात्र मेधावी व समझदार होते हैं, वे मेहनत और लगन पर अटूट विष्वास रखते हुए रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेकर मनचाही सफलता हासिल करते हैं। परिजन, दोस्त, रिष्तेदार सब उनके गुण गाते हैं। इसके विपरीत पिछड़ने के कारण बहुत से छात्र चाहते हुए भी प्रषंसा के पात्र नहीं बने पाते। बार-बार विफलता के अनुभव से कंुठित हो जाते हैं। जब रचनात्मक तरीकों से अपनी पहचान नहीं बना पाते तो अनैतिक व बेहूदा हरकतों से दूसरों का ध्यान आकर्षित करते हैं। साथियों से उन्हें बढ़ावा मिलता रहता है, जिससे इनकी इगो बूस्ट होती रहती है और इस चक्रव्यूह में फँसे रह जाते है। विलम्ब सहन नहीं करना, असभ्य, अश्लील, आक्रामक व्यवहार जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है। पीयर ग्रुप में शान व रौब दिखाना, सेखी बधारना, जोर-जबर्दस्ती करना आम व्यवहार बन जाता है। स्कूल का वातावरण जैसे अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, अध्यापकों की छात्रों से अपेक्षाएँ, शिक्षा का गिरता स्तर, षिक्षण में मूल्यों का अभाव, पीयर प्रेषर इत्यादि बातें भी बच्चों को बहुत प्रभावित करते हैं। मीडिया द्वारा प्रस्तुत की हुई तड़क-भड़क और षान-षौकत से लबरेज किशोरों की लाइफ स्टाइल भी इन्हें बहुत प्रभावित करती हैं। किशोर परिपक्वता के अभाव में कुछ गलत रास्ते अपनायें, इससे पहले माता पिता व स्कूल अधिकारियों को मिलकर इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए और इसे मुख्य रूप से करना भी होगा। सुख-साधनों के अभाव में किस तरह से मेहनत और लगन के बल पर मजबूती से आगे बढ़ना चाहिए इसकी शिक्षा माता-पिता से अच्छा कोई और नहीं दे सकता। किशोरों के गलत रास्ते पर चलने की जैसे ही भनक पड़े उनकी गतिविधियों की ठीक से जांच पड़ताल करके बिना डाटे-डपटे और आलोचना किए उचित राह दिखाने की कोशिश करें। माता-पिता अपने कीमती समय में से बच्चों के लिए थोड़ा समय निकालें, पढ़ाई के अलावा उनसे उनके दोस्तों, टी.वी. प्रोग्रामों, उनकी मनपसन्द फिल्मों इत्यादि विशयों पर भी बातचीत करें। ऐसा करने से निकटता बढ़ेगी और बच्चे अपनी जिज्ञासाओं, भावनाओं को आपके समक्ष व्यक्त कर पायेंगे। शुरू से ही बच्चों को बतायें कि किसी तरह दूसरों के कहने में आकर या भावुक होकर आत्म सम्मान व प्रतिश्ठा खो सकते हैं। बच्चों की दृढ़ प्रवृत्ति बनायें जिनसे विपरीत परिस्थितियाँ आने पर भी न डगमगाऐं। बच्चों के चरित्र निर्माण में स्कूल की बहुत बड़ी भूमिका होती है। क्लास में बच्चें कैसे पेश आते हैं, उनके अभद्र, असभ्य व्यवहार को किस तरह संषोधित किया जा सकता है, इन विषयों पर गौर करने की बहुत जरूरत है। उनको एजुकेशन स्कूलों में लड़के-लड़कियों में स्वस्थ दोस्त बनाने की चर्चा करें। ताकि एक दूसरे को मान सम्मान देना षुरू से ही सीख पाएँ। नकारात्मक अनुभव से सीख ले और अपने व्यवहार के लिए खुद जिम्मेदार बनें।