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आस्था का पर्व महाशिवरात्रि
November 10, 2019 • हनु दीक्षित

भारत में महाशिवरात्रि का पर्व प्राचीनकाल से ही बड़ी श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। यह पर्व मृत्युजंय भगवान शिव और पार्वती के पुर्नामिलन, शिव पार्वती के विवाह और महातपस्वी सदाशिव के अपनी शक्ति के पुर्नमिलन का महापर्व है।
 पौराणिक कथानुसार ब्रहमा के शरीर से सर्व प्रथम अर्ध नारीश्वर प्रकट हुये उन्होंने अपने दो भाग, शिव और शक्ति किये देव योजनानुसार शक्ति राजा दक्ष की पुत्री सती के रूप में प्रकट हुयी तथा शिव पत्नी बनीं राजा दक्ष ने शिव के तपस्वी रूप से घृणा कर उनका उपहास करते हुये एक यज्ञ का अयोजन किया उन्होंने उसमें शिव जी को आमंत्रित नहीं शिवजी के मना करने पर भी सती यज्ञ में पहुंची तो शिव का अपमान देखकर उन्होंने दक्ष को शाप दे डाला और स्वयं भस्म होकर सती हो गई। 
 भगवान शिव अनतंकाल के लिये तपस्या मे लीन हो गये। उसी काल मे अंधकानुसार नामक अजेय दैत्य प्रकट हुआ। उसने सभी देवताओं को हराकर अत्याचार का राज्य स्थापित किया देवताओं ने विचार किया कि शिवजी का पुत्र ही अंधकासुर का वध कर सकता है। सती पुनः हिमालय तथा माता मैना की पुत्री माँ पर्वती के रूप प्रकट हुयी उन्होंने सहस्त्रों वर्षो तक शिव को पति के रूप मे पाने की तपस्या की भगवान शिव प्रकट हुये और उन्होंने माता पार्वती से विवाह किया इस दिन फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी थी। यह रात्रि आस्था का पर्व महाशिवरात्रि कहलायी। इनसे उनको महातपस्वी कार्तिर्केय जी के रूप मे पुत्र प्रप्ति हुयी वे सामुद्रिक शास्त्र के ज्ञाता थे। आगे चलकर इन मयूर वाहनारूढ कार्तिकेय जी देवताओं के सेनापति बने और उन्होंने महाकाय विकट दैत्य       अंधकासुर व तारकासुर का वध किया तथा पृथ्वी पर पुनः धर्मराज्य स्थापित किया भगवान शिव को अपनी खोई शक्ति माता पार्वती के रूप मे प्राप्त हुई तथा वे पुनः संसार का संचालन कर भक्तों को आर्शीवाद व वरदान देने लगे। भक्त बड़े भक्तिभाव से भगवान षिवजी का इस दिन दूध, दही, फूल, बेलपत्र, फल, धतूरा, भांग और धूपदीप आदि से भगवान की पूजा करके व्रत रखते है। और रात भर शिवरात्रि मे भजन कीर्तन करके मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। किसी भी मास के दोनों पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष कहा जाता है, किन्तु फाल्गुन मास की कृष्ण त्रयोदशी सबसे महत्वपूर्ण है। यही महाशिवरात्रि कहलाती है। शिवरात्रि का व्रत अविवाहितों की विवाह बाधा दूर करता है, विवाहितों के वैवाहिक जीवन मे झगड़े तलाकों से मुक्ति दिलाता है। प्रत्येक माह का प्रदोष व्रत संतान बाधा और संतान के कल्याण हेतु सर्वोतम उपचार है।