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अमावस की रात
November 14, 2019 • परिहार दम्पत्ती

आज दफ्तर से जब मंै वापस आया तो एक सुखद आश्चर्य मेरा इंतजार कर रहा था सतीश गुप्ता मेरे बचपन का मित्र अपनी बीबी सुमन व बच्चों सहित मेरे घर दिल्ली आया हुआ था उससे मेरी मुलाकात पूरे सात साल बाद हो रही थी हमारी पिछली मुलाकात मेरी शादी के मौके पर हुयी थी, हम बचपन के दोस्त और सहपाठी थे फिर मै बी.ए. करने के बाद अपने चाचा के पास इलाहाबाद पढ़ने चला गया सतीश गोण्डा मंे ही रहकर पढ़ने लगा जब मै. एम.ए. कर रहा था तभी सतीश की शादी हो गई थी एम.ए. करते ही मेरी नौकरी राजस्व विभाग दिल्ली मे लग गई दो साल बाद मेरी भी शादी माधुरी से हो गई थी विद्यार्थी जीवन मे ही मेरी रूचि लेखन, साहित्य साधना मे थी जो आज भी जारी है इससे मुझे धन व यश दोनों मिला सतीश भी बलरामपुर के गर्वमेंट स्कूल मे प्रिंसपल हो गया था सुनने में आया था कि उसे कोई अजीब सी मानसिक बीमारी हो गई थी लोग कहते थे कि उसे भूत दिखते हैं। मेरी नौकरी ही कुछ ऐसी थी कि मैं चाहकर भी कई साल तक उससे नही मिल सका था सतीश दो सप्ताह के लिये अपने किसी दोस्त की बहन की शादी मे आया था शादी मे अभी चार पांच दिन बाकी थे माधुरी ने सबका स्वागत किया बच्चे भी आपस मे घुल मिल गये सतीश का बिस्तर भी मेरे कमरे में लगा दिया गया शुरूआती जाड़े की रात थी सर्दी अच्छी खासी पड़ रही है। खाने के बाद हम रजाइयों मे दुबके बातों मे मशगूल थे तभी मैने पूछा मैने सुना था कि तुमको कोई अजीब सी बीमारी लग गई थी वो सब क्या था सुना था कि तुम्हे कोई आत्मा परेशान करती थी ये चक्कर क्या था! मेरी बात सुनकर वह खामोश व काफी गंभीर हो गया कुछ देर सोचने के बाद भयभीत स्वर मे बोला, वो क्या था ये तो मै आज तक नही समझ सका लेकिन एक बात जरूर है, वो जो कुछ भी था बेहद रहस्यमय, डरावना और दिमाग को सुन्न कर देने वाला था मैं शुरू से अंत तक सारी बात बताता हूँ तुम खुद ही सही नतीजे पर पहुँच सकते हो। बात जून 1972 के अंतिम सप्ताह की है जब मुझे एक दिन अपाइन्टमेंट लेटर मिला जिसे पढ़कर मैं खुशी से झूम उठा मेरी पोस्टिंग बलरामपुर के रसूलपुर क्षेत्र के गर्वमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल मे हो गई थी मुझे 15 जुलाई के भीतर ज्वाइन करना था पत्नी सुमन मायके गयी हुयी थी माँ ने गाँव मे मिठाई बांटी और मेरे सफर की सारी तैयारियाँ करवी, नई जगह पर मुझे कोई जानता नही था इसलिये पिताजी ने पड़ोस के गुप्ता जी के हाथों लिखी एक चिठ्ठी मुझे दिलवा दी थी जो उनके साढू अशोक जी के नाम थी वो वहाँ डाकघर मे काम करते थे रसूलपुर जाने के लिये मैंने शाम सात बजे वाली वाली पैसेन्जर पकड़ी जो करीब तीन घण्टा लेट थी सावन का महीना था आसमान पर बादल छाये थे सबेरे से रह रह की खूब बारिश हो रही थी तेज हवा चल रही थी गाड़ी करीब साढे दस बजे रवाना हुयी बर्थ की कोई समस्या नही थी खराब मौसम  के कारण डिब्बे मे गिन चुने ही मुसाफिर थे मैं आराम से बर्थ पर लेट गया लेकिन अगले तीन चार स्टेशनों के बाद डिब्बा लगभग खाली हो गया मैं जाने कब सो गया पता ही नही चला कुछ देर बाद नींद खुली स्टिवाच देखी रात के ढाई बज रहे थे। मैंने देखा कि सामने की सीट पर एक 20-22 साल की दुबली पतली लड़की बैठी है जिसने हल्के पीले रंग का सलवार कुर्ता दुपट्टा पहना हुआ था लड़की गोरी चट्टी काफी संुदर थी मैंने गौर किया पूरा डिब्बा खाली था इतनी रात गये ऐसे भयानक मौसम मे खाली डिब्बे मे अकेली लड़की देखकर मुझे काफी हैरत हुयी बड़ी देर तक हम दोनांे खामोशी से बैठे जाने अंजाने मे एक दूसरे को देखते रहे अचानक उसने पूछा क्या आपके पास पानी है। मैंने कहा पानी तो नही लेकिन थर्मस मे चाय है। मैंने कप में उसे चाय दी और हम दोनों खामोषी से चाय पीने लगे फिर उसने पूछा आप कहाँ जा रहे हैं। मैंने उसे अपनी मंजिल और नौकरी के बारे में बताया उसने कहा अरे मैं भी तो वहीं पास के गाँव मे जा रही हूँ, मेरा नाम कुसुम शर्मा है। आठवें तक पढी हूँ, शादी तय हो गई है। नानी के घर गई थी लेकिन अचानक नानी के बीमार हो जाने के कारण अकेले ही घर लौटना पड़ा। बाहर तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश चालू थी खिड़की पर हवा और बारिश के तेज थपेड़े पड़ रहे थे तभी उसने मेरे गले मे पड़ी तावीज के बारे मे पूछा यह आपने क्यों पहना है मैने कहा माँ ने पहनाया है इससे क्या होता है माँ कहती है इसे पहनने से भूत-प्रेत परेशान नही करते हैं, वो बोली क्या तुम्हे परेशान करते हैं, नही वो बोली मुझे बहुत परेशान करते है, मैंने चैंककर पूछा कौन परेशान करता है। वो बोली घेरू, कौन घेरू गाँव के सरपंच का लड़का जो कुयें मे डूबकर मर गया था क्यों परेशान करता है। मैं क्या जानू तभी अचानक ना जाने कैसे उपर की बर्थ पर रखी मेरी अटैची नीचे आ गिरी मैंने उसे उठाकर फिर से बर्थ पर रख दिया और जैसे ही मैं अपनी सीट पर बैठा तो यह देखकर मेरी आंखें हैरत से फटी रह गयीं कि डिब्बे मे कुसुम अपनी जगह पर नही थी मैंने सारा डिब्बा, बाथरूम सब छान मारा लेकिन उसका कहीं कोई नामोनिशान ना था इतने खराब मौसम में चलती टेªन से और एक पल मे कोई कैसे उतर सकता है। वह कोई छलावा थी या कोई भटकती रूह। मैंने खिड़की से बाहर झांककर देखा तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश हो रही घनघोर अंधेरे के सिवाय कुछ भी नही दिख रहा था मुझे अजीब सी घबराहट होने लगी भयानक मौसम, सुनसान डिब्बे मे अकेले होने का अहसास और कुसुम प्रेत थी, यह सोचते ही मारे भय के मेरी हालत खराब हो गई डर के मारे घिग्गी बंध गई ठंड के मौसम मे भी मैं पसीने-पसीने हो गया मैं आँख मूंदकर निरन्तर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा जाने कब आँख लग गई मुझे पता ही नही चला जब नींद खुली तो सबेरा हो चुका था, गाड़ी बलरामपुर स्टेशन पर खड़ी थी। मैं रात की घटना को बुरा सपना समझ और बलरामपुर पहुँचा डयूटी ज्वाइन कर ली गुप्ता जी ने गाँव मे ही मेरे रहने की व्यवस्था करवा दी थी गाँव के बाहरी छोर पर सरपंच जी का दुमंजिला मकान था, मकान के ठीक सामने पूरब दिशा मे एक खेत पार पतराई नामक एक बरसाती नदी बहती थी मकान की निचली मंजिल पर उनके कुछ नौकर रहते थे और ऊपरी मंजिल पर अकेला मैं रहता था समय अच्छे से कटने लगा यह अगहन पूर्णिमा की रात थी एक नींद मैं ले चुका था अचानक मेरी नींद खुल गई लालटेन की लौ तेज करके मैंने घड़ी देखी रात के दो बजे थे अचानक मेरे कानो में किसी औरत के गाने की आवाज आई मुझे आश्चर्य हुआ कि जाड़े की सर्द रात दो बजे कौन औरत गा रही है। खिड़की से बाहर झांका चारों ओर खिली चांदनी फैली हुयी थी सब तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था तभी मैंने देखा कि नदी के पास सफेद कपड़े पहने एक युवती की आकृति दिख रही थी जो मधुर आवाज मे गा रही थी अपनी जिज्ञासा षांत करने के लिये मैं बाहर चला गया जब मैं युवती के पास पहुँचा वह नदी की ओर मुँह करके गा रही थी उसने सफेद शलवार कुरता पहन रखा था उसका दुपट्टा हवा मे लहरा रहा था मैंने हिम्मत करके पूछा कौन हंै आप? वह मेरी ओर पलटी उस पर नजर पड़ते ही मारे भय के मेरे होश उड़ हो गये वह कोई और नहीं कुसुम थी मैंने पूछा कुसुम तुम इतनी बीती रात अकेली नदी किनारे क्या कर रही हो वह नाक के बल खनखनाती आवाज में बोली मैं अकेली कहाँ हूँ, सभी तो है। मेरे साथ माँ-बापू, भाई-बहन किधर? उधर डेरे पर उसने दांयी ओर ईशारा किया मैंने दांयी ओर दूर-दूर तक देखा लेकिन मुझे वहाँ कोई नही दिखा मैेंने बिना पीछे मुड़े कुसुम से कहा वहाँ? तो कोई नही है। मुझे कोई जवाब नही मिला मैंने पीछे मुड़कर देखा तो कुसम का दूर-दूर तक कोइ्र्र पता नही था, मेरे होश उड़ गये, मैं समझ गया कि यह कोई प्रेत लीला है, मैं तेज आवाज मैं चीखकर बेहोश हो गया आँख खुली तो खुद को गाँव वालों के बीच खाट पर पड़ा पाया मेरा शरीर बुखार से तप रहा था डाक्टर मुझे दवा, इन्जेक्शन देकर चला गया था।
 गाँव वालों ने बताया कि सुबह कुछ गाँव वाले शौचादि के लिये निकले तो मुझे नदी के किनारे बेहोश पड़ा देखकर उठा लाये, मेरी आप बीती सुनकर सब हैरान रह गये तभी गाँव के शिव मंदिर के पुजारी रामेश्वर बाबा ने मुझे फूँका हुआ जल देकर कहा बेटा रात-बिरात वीराने में ना निकला करो अक्सर भटकती आत्मायें पीछे लग जाती हैं। पर मेरा मन कुसुम को आत्मा मानने को तैयार नहीं था लेकिन मेरे पास बीती रात घटी बात का कोई जवाब नही था मैंने गाँव वालों से कुसुम के बारे मे पूछा तो कोई उसके बारे मे कुछ नही बता सका इस घटना के कुछ महीने बाद मेरे स्कूल के एक अघ्यापक घनश्याम वर्मा जो यहाँ से 15 किलोमीटर दूर नैनपुर गाँव के निवासी थे ने अपने नये मकान मे अखंड रामायण का पाठ बैठाया था। गर्मी के दिन थे स्कूल मे छुटिट्याँ चल रही थीं। मैं दोपहर अपने एक अन्य अध्यापक साथी ठाकुर राजकिशोर सिंह के साथ साईकिल से वर्मा जी के घर जा रहा था तभी आधे रास्ते मे हमें दांयी ओर एक टूटे-फूटे घरों की बस्ती दिखाई दी, वो क्या है मैने राजकिशोर जी से पूछा कोई उजड़ी हुयी बस्ती है तभी मुझे एक घर से धुआं निकलते नजर आया मैंने कहा लगता है शायद वहाँ कोई रहता है हम उत्सुकतावश वहाँ पहुँचे। वह खंडहरों को ढेर था एक घर के आंगन मे एक युवती चूल्हें पर रोटी सेंक रही थी जिसकी केवल पीठ हमे दिख रही थी, मैंने उससे कहा जरा सुनिये वह पलटी मैं उसे देखकर मारे डर के कांपने लगा, घबराहट दबाकर पूछा वह तो कुसुम थी तुम यहाँ बरबस मेरे मुँह से निकला वो बोली अरे यही तो मेरा घर है। उस रात तुम कहाँ चली गई थी उसने कोई जवाब ना देकर पूछा रोटियां ताजी हैं, लगा दूँ नही अभी भूख नही है। केवल पानी दे दो वह लोटा भर लाई मैंने पानी पिया लोटा वापस देने लगा लेकिन यह क्या वहाँ तो कोई नही था, ना कुसुम, ना चुल्हा, ना रोटी चारों ओर केवल सन्नाटा फैला था धूल उड़ाती शोर करती हवा बह रही थी मैं बदहवास सा कुसुम कुसुम... पुकारता रहा लेकिन कोई जवाब नही मिला मैं वापस राजकिशोर जी के पास आया उनकी हालत देखकर मैं घबरा गया वह डर से थर-थर कांप रहे थे मैंने उन्हें झझकोरा क्या हुआ वे बोले चलिये तुरंत यहाँ से चलिये हम वहाँ से बाहर आये रास्ते भर राजकिषोर जी बेहद गुमसुम व गंभीर रहे वर्मा जी के घर जाकर हमने रामायण पढ़ी फिर खा पीकर अगले दिन लौट आये दो चार दिन बाद वर्मा जी से उस उजड़े गांव के बारे पूछा वे बोले कौन सा गाँव गोपालपुरा वह गाँव कहां घूरा है। लोग उसे भूतिया गाँव कहते है। पिछले 50 सालों से वह वीरान है। बड़े-बूढे़ बताते है, लगभग कोई 50 साल पहले वहाँ ताउन फैला था सैकड़ांे लोग मर गये जो बचे वे अपने दूर के रिश्तेदारों के यहाँ भाग गये फिर ना जाने क्यों वापस नही आये तब से वह उजाड़ है। वहाँ दिन में भी कोई नही जाता हैं। अगर कोइ्र्र भूल से चला गया तो उसकी लाश ही मिलती है।
 कुछ गाँव वालों का कहना है कि कभी-कभी अमावस की रात को वहाँ भूतों की बारात निकलती है। खूब रोशनी होती है, गाजे-बाजों की आवाजें आती है। जो भी आदमी बरात को देख लेता है। वह जिंदा नही रहता है, जबकि सुबह हो जाने पर बरात का कोई नामों-निशान नजर नही रहता, मैंने उन्हें अपनी आप बीती बताई तो वे बोले जरूर आपको कोई वहम हुआ है। मैंने कहा यदि आपको यकीन ना हो तो ठाकुर साहब से पूछ लो ठाकुर साहब बोले उस दिन आपकी हरकते देख कर मैं घबरा गया था आप अकेले ना जाने किससे बात कर रहे थे जबकि वहाँ कोई नही था मैंने अड़ गया, वहाँ कुसुम थी जो मुझसे बात कर रही थी, वे बोले लेकिन मैंने तो वहाँ किसी को नही देखा, ना ही किसी की आवाज नही सुनी, हम दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे ठाकुर साहब का ख्याल था कि मुझे कोई आत्मा परेशान कर रही है। उन्होंने मेरे पिता जी को चिठ्ठी लिखी पिताजी मुझे घर ले आये मशहूर डाक्टर से मेरा इलाज करवाया जिसका कोई खास असर नही हुआ। एक दिन मैं ड्यूटी पर लौट गया एक दिन वर्मा जी आकर बोले मेरे गाँव में जगदीश नामक नाई है। जिसके पुरखे गोपालपुरा से आकर बसे है। शायद वह तुम्हें कुछ बता सके अगले दिन हम लोग नैनपुर गये जगदीश ने बताया कि मेरी दादी बताती थी कि उनके ससुर घेरूलाल गाँव के मुखिया थे ताउन की बीमारी फैलने से पूर्व एक कुयें पर नहाते हुये पैर फिसलने से कुयें मे डूब कर उनकी मृत्यु हो गई थी उनका अपने चाचा से जमीन का कोई मुकदमा चल रहा था चाचा का सारा परिवार ताउन की भेंट चढ गया था केवल एक लड़की कुसुम बची थी जो मेरी दादी के साथ इस गाँव में आ गई थी, उसे अजीब से दौरे पड़ते थे गाँव वालांे का मानना था कि उस पर किसी बुरी आत्मा का साया है। उसी अवस्था में उसकी मौत हो गई थी, दादी कहती थी कि मरकर वह चुड़ैल बन गई थी शायद उसकी आत्मा को मुक्ति नही मिली मेरे कहने पर जगदीश ने कुसुम की आत्मा के लिये श्राद्ध ब्रह्म भोज आदि करवाया जिसका सारा खर्चा मैंने उठाया उसके बाद मैं पूरी तरह से ठीक हो गया फिर कुसुम मुझे कभी नही मिली।
रहस्य-रोमांच की यह कहानी पूर्ण काल्पनिक है।