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अपनी वाणी में कोमलता को बनाये रखें
November 29, 2019 • संकलित

- जो मनुष्य परमात्मा का ध्यान एवं चिंतन प्रेम और श्रद्धापूर्वक करता है परमात्मा भी उसकी अविलम्ब सहायता करते हैं।
- न तो हमें उपवास करना चाहिए और न ही अधिक भोजन। भोजन में संयम रखना शरीर और मन दोनों के लिए उत्तम है।
- वही मनुष्य ईश्वर के दर्शन कर पाता है, जिसका अन्तःकरण निर्मल और पवित्र होगा। सद्गुणों को अपना मुकुट बनाओं और बुराईयों को अपने पैरों के नीचे का पायदान।- - दुःखों का मूल कारण यही है कि हम केवल अपने अधिकारों की माँग तो करते हैं पर अपने कत्र्तव्यों का पालन करने से बचते हैं।
- मनुष्य के रूप में अथवा पशु-पक्षियों के रूप में परमात्मा तो सदा ही हमारी आँखों के समक्ष है-जैसे भी हो सके इन सबकी मदद एवं सेवा करें।
- जो लोग वाणी के दोष को जानते हैं वह यह भी जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति को कठोर वचन कहना वस्तुतः उस पर प्रहार करना ही है। तन के घाव तो भर जाते हैं लेकिन शब्दों के घाव चिरकाल तक बनें रहते हैं। कठोर वचनों से मन की भड़ास तो निकाली जा सकती है, लेकिन ऐसे वचनों को सुनने वाला हमारा दुश्मन भी बन जाता है इसलिए आप हमेशा अपनी वाणी में कोमलता को बनाये रखें।