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औरत बन गई नागिन
December 5, 2019 • डी.एस. परिहार

स्वराज पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद त्रिवेदी ने सन 1895-96 मे अलौकिक घटनाओं को संकलित करते हुये एक अद्भुद ग्रन्थ अद्भुद आपाल लिखा था जिसे संवत 1983 सन 1926 मे लखनऊ के प्रसिद्ध प्रकाशक दुलारे लाला भागर्व ने गंगा पुस्तक माला, 9-30, अमीनबाद लखनऊ से प्रकाशित किया था इसकी एक प्रति मध्य प्रदेश के मशहूर लेखक कैलाश नारद के पिता हुकुमचन्द्र नारद के निजी संकलन में थी अद्भुद आलाप की रचना श्री त्रिवेदी ने 1895-96 मे जबलपुर मे की थी जब वे झांसी के मिडलैंड रेलवे के डाक तार विभाग मे मुलाजिम बनकर आये थे, उस समय उनकी मुलाकात छिंदवाड़ा के निवासी और बाजना मठ से सिद्धि प्राप्त अवधूत शुकदेव महराज और भगवती पांडे से हुयी थी शुकदेव जी किसी के भी मन की बात बता देते थे मनचाही चीज की बारिस करा देते थे कोई भी चीज कही से मंगवा देते थे त्रिवेदी जी बाजना मठ से आकर्षित थे, वे अक्सर ही वीरान बीहड़ मे संग्राम सागर पर चले जाते थे सन 1895 मे बरसात की एक शाम जब श्री त्रिवेदी जी बाजना मठ की भुतहा पहाड़ियों के मध्य शुकदेव जी के पास बैठे थे तो शुकदेव जी ने उनको अद्भुद ईन्द्रजाल दिखाया जिसके आंतक व चमत्कार से वे बरसों तक डूबे रहे अद्भुद आलाप की धुंधली हो चुकी सतरों मे जबलपुर की उस बारिस का नजारा अब तक दर्ज है। शुकदेव जी ने बरसते पानी के बीच किसी को तीन बार पुकारा आओ-आओ-आओ ना जाने कहाश् से एक काला भयानक सांप आकर शुकदेव जी के पैरों के पास आकर रंेगने लगा पर वह सांप नही था त्रिवेदी जी ने लिखा है। कि तब एक और विलक्षण बात हुयी शुकदेव जी ने जोर से कहा कि नाचो मेरे देखते ही देखते उस सर्प ने सुंुदरी का रूप धारण कर लिया और वो उसी रूप मे मदमस्त होकर आकाश मे नाचने लगी उसकी आश्खे हम पर ही टिकी थीं। मेरा मन उसके चेहरे पर था और शरीर अपनी जगह बैठा था अद्भुद आलाप मे श्री त्रिवेदी जी जी ने उस समय घटी 21 अलौकिक घटनाओं का वर्णन किया है।