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बुजुर्गो के विचारो व क्रियाकलापो को आत्मसात करना है जरूरी
March 5, 2020 • रायबरेली। • News

माता-पिता, बुजुर्गो के प्रति सेवा, आदर व सम्मान प्रकट करने से आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, राष्ट्रीय एकता, अखण्डता को बलवती करने का बल मिलता है। समाजसेवी गायत्री देवी ने अपने सीमित संसाधनो अपने परिवार व समाज के लोगो को विपत्तियों में भी चुनौतियों में अफसरो को खोजकर विकास करना व आगे बढ़ना सिखाया है। गायत्री देवी ने अशिक्षित होते हुए वे अपने पांचो पुत्र व एक पुत्री को सभी बहुओ को राजपत्रित अधिकारी के रूप में स्थापित किया है, तथा अपने आवास में रहने वाले अनेको किरायेदार, पास पडोसियो व रिश्तेदारो के बच्चो को भी शिक्षा का महत्व बताया। उन्होंने जीवन सूक्ति के जरिए बताया कि ‘‘दो पल की जिन्दगी है, और इसे जीने के सिर्फ दो असूल बना लो। रहो तो फूलों की तरह, और बिखरो तो खुशबू की तरह’’।। 
जिलाधिकारी शुभ्रा सक्सेना को सहायक निदेशक सूचना प्रमोद कुमार ने उक्त उदगार व्यक्त करती हुई अपनी माताजी गायत्री की 15वीं पुण्यतिथि के अवसर पर दो मान्यता प्राप्त पत्रकारो द्वारा लिखी दूर पथ का राही पुस्तक भेट की। जिलाधिकारी शुभ्रा सक्सेना ने कहा कि माँ के स्नेह का कोई मूल्य नहीं होता हैं। जीवन और मृत्यु के सफर के बीच में किये गये कार्य ही व्यक्तित्व स्थापित करते है। महत्वपूर्ण यह नही है कि जिन्दगी में कितने खुश हम है बल्कि यह है कि आपके व्यवहार से कितने लोग खुश है। आज के सामाजिक परिवेश में जब मानवीय मूल्य गौड़ होते जा रहे है ऐसे में मानवीय मूल्यो की सुरक्षा सुढ़ता के लिए बुजुर्गो के विचारो व क्रिया कलापो को आत्मसात करना जरूरी है।