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चमत्कारी फलादेश के सूत्र गुलिक द्वारा लग्न शोधन
January 15, 2020 • प. एल, बी, उपाध्याय, (पूर्व जज)

दक्षिण भारत के ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रश्नमार्ग मे ज्योतिषी को चमत्कारी फलादेश करने का निर्देश दिया है। वर्तमान समय मे कम्प्यूटर आ जाने के कारण कोई भी ज्योतिषी लग्न और उसकी शुद्धता पर घ्यान नही देता है, और सीधे फलादेश करना आरंभ कर देता है। अधिकंाश कुण्डलियो मे जंम का समय अनुमान पर आधाारित होता है। यह समय कभी कभी 5 मिनट से लेकर 1 घंटे तक हो जाता है। ज्योतिष के विशिष्ठ ग्रन्थ वृहत पाराशर होराशास्त्र जो महर्षि पारशर जी और उनके पौत्र मैत्रेय के मध्य संवाद के रूप मे उपलब्ध है। श्रीमद भागवद् के अनुसार श्री मैत्रेय जी व्यास जी के पुत्र हैं। इसके अनुसार मनुष्य के जमांक का शोधन प्राणपद, चन्द्रमा और गुलिक के आधार पर करना चाहिये। जो लग्न है वह पशु या पक्षी की भी हो सकती है। अतः लग्न और उसके नक्षत्र का शोधन सही फलादेश के लिये परमावश्यक है। इसमे सूर्य के राशि, अंश, कला, विकला को जोड़ने पर लग्न के अंशों की समानता प्राप्त होनी चाहिये। क्योंकि सूर्य ही ज्योतिषशास्त्र मे गणना का प्रधान आधार है। ज्योतिषशास्त्र मे अनेक योगों और सूत्रों का उल्लेख किया गया है, किन्तु उनसे प्राप्त परिणामों के पीछे जो कारण है उनका उल्लेख परोक्ष रूप से ही किया गया है दैवज्ञ को उन कारणों को भी जानना चाहिये अन्यथा शास्त्र उनके लिये बोझ बन जायेगा जैसे मूल नक्षत्र मे जंमे बालक पर विचार करें तो उसके चतुर्थ चरण को छोड़कर शेष चरणों को बड़ा ही गर्हित बताया गया है। इसका कारण भाव और उसके कारक हो सकते हैं। भाव व कारक की शुभता प्राप्त करने पर अशुभत्व समाप्त हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास की कुण्डली इसका अच्छा उदाहरण है। जहाँ तक प्राणपद द्वारा लग्न शोधन का सवाल है। विद्वानों मे इस विषय पर बड़ा मतभेद है। मैने अपने अनुभव से इसे शुद्ध किया है। जातक के जंम के अनुसार उसकी प्राणपद राशि कही भी हो सकती है। अतः इस पर विवाद निर्मूल है। 
 दूसरी पद्धति चन्द्रमा से लग्न शोधन की है। स्पष्ठ हैकि जब चन्द्रमा बलवान होगा तो प्राणपद राशि उससे त्रिकोण या 7 वंे स्थान पर होगी।
 तीसरी विधि गुलिक द्वारा लग्न शोघन की है। इसके अतिरिक्त कुन्दा द्वारा भी लग्न शोधन का प्रचलन है। सन 2000 से मेरे सौभाग्य दीप में प्रकाशित कुुछ लेखों की श्रंखला को पढ कर सन 2005 मे मेरे एक प्रशंसक दिल्ली से अपने पिता के साथ मुझसे मिलने आये और अपनी कुण्डली की चर्चा की। और अपना जंम समय 9ः 25 (प्रातः) स्थान एटा बताया। लेकिन मैने उनका जंम समय संशंोधित करके प्रातः 9ः 40 मिनट बताया जो विगत 8 सालों मे घटित घटनाओं से पूरी तरह से मेल खाता था इस प्रकार के जंम समय मे 15 मिनट के अंतर पर नवांश बदल जाता है।
 एक नवांश 1.15 मिनट का होता है। अतः समय की शुद्धि आवश्यक है। मेरे पास कई ऐसी कुण्डलियां हैं। जिन पर प्राणपद का सिद्धान्त लागू नही होता है अपितु वे गुलिक के सिद्धान्त पर ही आधारित है। वैदिक ज्योतिष ना समझने के कारण ही प्रो कृष्णमूर्ति ने कुन्दा शोधन के आधार पर अपनी पद्धति विकसित है। जो निश्चित ही रूप से वैज्ञानिक रूप से शुद्ध है। परन्तु उत्तर भारत मे कुन्दा द्वारा लग्न शोधन या वर्ग चतुष्टय की परम्परा नही है।
उदाहरण संख्या-1
जंम तिथि 3. 8. 1983  समय- 9ः 40 प्रातः
बुधवार इष्टकाल-7.00  ।  सूचित समय-9ः25 
संशोधित समय-9: 40 सुबह।
कन्या लग्न, तुला मे शनि, वृश्चिक-गुरू, केतु। वृष- चन्द्र राहू। मिथुन-मंगल। कर्क- सूर्य। सिंह मे सूर्य। जातक के पिता व्यापारी हंै वह स्नातक व डिप्लोमा   धारी व अविवाहित है।
नवांश-लग्न मीन मे केतु, मिथुन मे मंगल व बुध, सिंह मे शुक्र कन्या मे बृह0 व राहू, वृश्चिक मे, सूर्य, शनि मकर मे चन्द्रमा।
नक्षत्र-कृतिका द्वितीय चरण। भोग्य दशा- 4 वर्ष, 3 माह, 15 दिन। वृद्धि योग, कृष्ण पक्ष, नवमी तिथी।
ग्रहों का विवरण-
1. लग्न  अंश कला नक्षत्र
2. सूर्य  8ः 42  उ. फा. 4
3. चन्द्र  00ः 28  पुष्य 1
4. मंगल 29ः 32  पुर्नवसु 3
5. बुध  09ः 05  मघा 3
6. गुरू  07ः 30  अनुराधा 2
7. शुक्र  15ः 52  पू. फा. 1
8. शनि  4ः 59  चित्रा 4
9. राहू  00ः 35  मृग 3
10. केतु 00ः 35  मूल 1
घटनायें-
 जातक पर सन 2004 से राहू की महादशा चल रही है जो अभी तक बेरोजगार व अविवाहित है गुरू के अंतर मे एक विवाह प्रस्ताव आया जो निरस्त हो गया अंतिम दशा भाग्येश मंगल की है जो सप्तम भाव वर दृष्टि डाल रहा था
जातक का दशमांश इस प्रकार है।
 सिंह लग्न, कन्या मे मंगल, तुला मे राहू व केतु, वृश्चिक मे बुध, मकर मे शुक्र, कंुभ मे चन्द्रमा, मीन मे सूर्य, मेष मे गुरू, वृष मे शनि।
 जातक की प्राणपद राशि वृश्चिक है। दशमांश मे बुध व मंगल व शनि तथा शुक्र का व्यत्यय है। इस मेघावी जातक का  जंम सम्पन्न परिवार मे हुआ है। जो धार्मिक व ईश्वर भक्त है। जातक का जंम समय 8ः 25 लेने पर लग्न 5. 6 अंश पर आती है। जबकि 9ः 40 लेने पर लग्न 8 अंश आती है। प्रश्न यह है कि लग्न का सही अंश क्या है। प्राणपद से शोधन करने पर प्राणपद वृश्चिक राशि मे आता है। जो चन्द्रमा से 7 वें घर मे है। परन्तु सूर्य 12 अश पर है। अतः लग्न और राशि के अंशों में समन्वय नही बैठता है। चन्द्रमा 0 अंश पर है अतः चद्रमा भी लग्न शोधन के लिये उपयुक्त नही है। प्रस्तुत मामले में गुलिक हस्त नक्षत्र मे, कन्या राशि मे, लग्न मे 22 अंश पर है। विवाद लग्न की राशि पर नही अंशामें पर है। अतः गुलिक का साधन करने पर सूर्य-3/16/28/57
 गुलिक-5/22/09़
 योग-8/38/47 बराबर 3 अंश 4 बराबर 9/8/47अतः गुलिक का साधन करने पर  गुलिक मकर राशि मे है। जो लग्न की त्रिकोण राशि व चन्द्रमा की भी त्रिकोण राशि है। तथा भाव के रूप मे लग्न 8 अंश का प्राप्त होता है। जातक के जीवन मे घटी घटनायें भी लग्न के 8 अंश पर सही घटित होती हैं। शनि के कन्या राशि के गोचर के समय जातक बहुत बीमार था 
उदाहरण संख्या- 2
जंम तिथी- 6. 8. 1970 समय-8.00 से 9. 00
नक्षत्र- उ0 फा0 गुरूवार शुक्ल पक्ष चतुर्थी
भाग्य दशा- 3 वर्ष 07 माह।
 चमत्कारी फलादेश के लिये ज्योतिषी हेतुु गुलिक का प्रयोग आवश्यक है प्रत्येक जमंाक मे कुछ अदृश्य शक्तियाँ धूूम, पात, इन्द्रचाप, प्राणपद, गुलिक इत्यादि के रूप मे कार्य करती है। अतः भूत प्रेत बाधा या चमत्कारी फलादेशो के लिये इनकी जानकारी आवश्यक है।
  संशोधित राशि चक्र 
सिंह लग्न मे केतु, बुध, कन्या मे शुक्र, चन्द्रमा, तुला मे गुरू,  कुभ मे राहू, मेष मे शनि, कर्क मे सूर्य व मंगल। कम्पयूटर की अधिकांश कुण्डलियांे में गुलिक नही दर्शाया जाता है।
  ग्रहों का विवरण
1. लग्न  22 9 55
2. सूर्य  17 46 35
3. चन्द्र  1 29 29
4. मंगल 18 38 19
5. बुध  15 00 48
6. गुरू  5 19 21
7. शुुक्र  4 02 42
8. शनि  28 24 43
9. राहू  10 20 35
10. केतु 10 20 35
11. गुलिक 3 44 31
गुलिक का उपयोग मृत्यु का समय जानने के लिये किया जाता है। त्रिस्फुट और पंचस्फुट का सिद्धान्त बड़ा रोचक है।
नवांश चक्र
 तुला लग्न, वृश्चिक में गुरू, धनु मे मंगल, शनि, सूर्य,  मकर मे चन्द्र व राहू, कुंभ मे शुक्र, कर्क मे केतु, सिंह मे बुध।
 इस परस्तानक जातक का विवाह सन 2008 मंे हुआ उसने तीन चार नौकरिया बदली और सन 2011 व 2012 में वह असाध्य रोगों से ग्रस्त रहा। जातक दो पुत्रों का पिता हैं। जातक का दशमंाश इस निम्न है। सप्तांश , त्रिश्ंााश,  पंचमांश व दशमंाश लग्न की शुद्धता के परिचायक है। सही घटनाओं के आधार पर पर इष्ट पल की शुद्ध करनी चाहिये।
दशमंाश चक्रः- मीन लग्न, मेष मे सूर्य, मंगल, वृष मे गुरू,  मिथुन मे चन्द्रमा, कर्क में शुक्र, वृश्चिक मे राहू, केतु, मकर मे बुध, शनि।
प्रश्पगत जमांक मे गुलिक
लग्न 5 । 22। 09  सूर्य 3। 19। 46
चन्द्रमा 5। 1। 44    गुलिक 5। 3। 44 
अतः गुलिक के राशि अंश लग्न के अंश बराबर होने के कारण लग्न की शुद्धता प्रमाणित होती है। अतः लग्न की शुद्धीकरण गुलिक, चन्द्रमा और प्राणपद मे से एक के आधार पर करना आवश्यक है।