ALL News Religion Views Health Astrology Tourism Story Celebration Film/Sport Vedio
दीर्घजीवी हैं नीलिमा मिश्रा की गजलें: विजय
April 26, 2020 • प्रयागराज। • Views

डाॅ. नीलिमा मिश्रा की पंक्तियां हैं-‘धरम के ग्रंथ पढ़ने की नहीं चाहत रही कोई, सुना है होम करने से भी अपने हाथ जलते हैं।’ निश्चित तौर पर धर्म और विज्ञान का बहुत सम्हल के , सही और मानवता के हित में उपयोग करना आवश्यक होता है। कोई रचना जब अपने आप में अनेक भावों और अर्थों का समावेश करती है, जब पाठक अपने मनोभाव और मनःस्थिति के अनुसार उसकी व्याख्या कर उससे कुछ पाता है या आनंदित होता है, तो ऐसी रचना दीर्घजीवी होती हंै। विज्ञान व्रत जी का एक शेर याद आ रहा है, ‘गद्दी का वारिस लौटा था, राम कहां लौटे थे वन से।’ इन पंक्तियों को पढ़ते ही राम के वनवास तथा उसके बाद का जैसे सारा इतिहास आंखो के सामने कौंध जाता है। यह बात गुफ्तगू की ओर आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा परिचर्चा में मैनपुरी के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विजय प्रताप सिंह ने डाॅ. नीलिमा मिश्रा की गजलों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा जमादार धीरज ने कहा कि डॉ. नीलिमा मिश्रा अपने सुगठित अशआर के माध्यम से प्यार आध्यात्म और राष्ट्रभक्ति की त्रिवेणी बहाती हुई जीवन के कठिन यथार्थ  के प्रति भी उतनी ही सजग हैं सुख और दुख के अनवरत चक्र से चिंतित होकर लिखती हैं। देश मैं शांति न्याय समता स्थापित करने वाले लोकतंत्रा के प्रहरी भारतीया संविधान के जनक बाबासाहेब डॉक्टर अम्बेड्कर के प्रति आपकी भावभीनी श्रधांजलि  अर्पित करते हुए कहती हैं, ये बेहद सराहनीय है।
तामेश्वर शुक्ल ‘तारक’ ने कहा कि डॉ. नीलिमा मिश्रा जितनी सहजता एवं सरलता अपने व्यक्तित्व में समेटे हुए हैं, उतनी ही सहजता से गजल सृजन के माध्यम से समाज हित की बातें कहती हैं।
शैलेंद्र जय के मुताबिक डाॅ. नीलिमा मिश्रा की गजलें प्रेम की आंच में सिंकी और जीवन रूपी दुख की भट्ठी से निकली हुई गजलें हैं, जिनमें सच की तपिश और अनुभव का घृत साथ-साथ दिखाई देता है। प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स बुकोस्की ने कहा है कि ‘अगर फूट के ना निकले, बिना किसी वजह के मत लिखो।’ इस काव्योक्ति को पूरी तरह से रेखांकित करती हैं नीलिमा जी की ये गजलें झरने की तरह सहज भाव व वेग से प्रस्फुटित होती हैं। शायरा अतिया नूर ने कहा कि नीलिमा मिश्रा के कलाम अक्सर मुझे निःशब्द कर देते हैं। वो जो भी कहती हैं बहुत डूबकर बिल्कुल समंदर में गोते लगाते हुए कहती हैं, उनके तमाम अशआर बेहद दिल आवेज होते हैं, अगर वो इश्क की मिठास से लबरेज शेर हों तो उनका अंदाजे बयां दिलचस्प हो जाता है। इनके अलावा रमोला रूथ लाल ‘आरजू’ शैलेंद्र कपिल, दयाशंकर प्रसाद, मनमोहन सिंह तन्हा, अर्चना जायसवाल, अना इलाहाबादी, ऋतंधरा मिश्रा, नरेश महारानी, संजय सक्सेना, अनिल मानव, सम्पदा मिश्रा, डॉ. ममता सरूनाथ, रचना सक्सेना, प्रभाशंकर शर्मा और इश्क सुल्तानपुरी ने विचार व्यक्त किया।
संयोजन गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। सोमवार को सागर होशियारपुरी के गजल संग्रह ‘खुशबू का चिराग’ पर परिचर्चा होगी।