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देवताओं व ऋषियों के साथ देवत्व की स्थापना के लिए हुआ था कृष्ण जन्म
September 5, 2020 • संदीप रिछारिया, सहायक संपादक • Religion

150 साल पहले की चार्ल्स डार्विन की मानव विकास की थ्योरी हमने हाईस्कूल की जीव विज्ञान की किताब में पढ़कर रट ली कि जीवन की पहली उत्पत्ति का केंद्र जल है। इसी थ्योरी ने हमे बताया कि मानव बनने के पहले अमीबा, पेरामिशियम जैसे कितने चरणों से हम गुजरे। हैरत की बात यह है कि जिस सिद्धांत को हमे हजारों सालों से बताया जाता रहा उसको हमने केवल अपने दुःखों से मुक्ति पाने का आधार मानकर उन्हें देवता माना और उनको मन्दिरों में बैठाकर हम उनकी आडम्बर युक्त पूजा करते रहे और मुख्य तथ्य की तरफ कभी ध्यान ही नही दिया कि वेदों और पुराणों में लिखी इबारत हम केवल रट्टू तोते की तरह दोहराते रहे। जबकि इन इबारतों का अर्थ कितना व्यापक है इसको समझने का कभी प्रयास ही नही किया।
 चार्ल्स डार्विन की थ्योरी वास्तव में हमारे वैदिक धर्म की पूरी तरह से नकल है। उनकी थ्योरी जल में पहला जीवन पैदा होने की बात करती है तो वैदिक धर्म में पहला अवतार मत्स्य का है। इसी प्रकार कच्छप, हंस से होते हुए परशुराम यानि जंगल मे रहकर जीवन यापन करने वाले मानव से है। पांचवे अवतार परशुराम के पास जंगल मे रहने के कारण हिंसा ज्यादा है। इसी कारण उनकी विशेष पूजा किए जाने का प्रावधान अभी दिखाई नही देता। इसके बाद जन्म होता है श्रीराम का! श्री राम को पहले आदिकवि वाल्मीकि जी मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में परिभाषित करते है। मर्यादा पुरूषोत्तम इसलिए कि उन्होंने पिता की आज्ञा मानी और जंगल चले आए। वैसे केवल एक बार पिता की आज्ञा मानकर वे जंगल आये ऐसा नहीं है, वे जंगल में दो बार गए। पहली बार अध्ययन पूर्ण होने के बाद महिर्षि विश्वामित्र उन्हें यज्ञ की रक्षा के लिए जंगल ले गए थे। जहां उन्होंने ताड़का, सुबाहु का वध किया और मारीच को दुम दबाकर भागने के लिए विवश कर दिया। 
 श्री राम एक पत्नी व्रत का पालन भी करते है। इसी एक पत्नी व्रत के पालन में पूर्णावतार श्री कृष्ण के जन्म की कथा  छिपी हुई है। कहां और कैसे की थी श्री राम ने कृष्ण जन्म की घोषणा:- श्री राम ने माँ जानकी के साथ अपने वनवास के सर्वाधिक समय लगभग 12 वर्ष चित्रकूट  धाम के श्री कामदगिरि पर बिताया। यह नवयुगल श्रीराम व माता जानकी के दाम्पत्य जीवन की मधुरिम बेला का काल था। वाल्मीकि रामायण सहित तमाम ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते है कि श्री चित्रकूट    धाम सतयुग के प्रारम्भ से ही धरती पर विद्यमान था। ऋषि मुनि यहां पर तपस्यारत थे। श्री राम जब यहाँ आये तो देवता भी कोल-किरातों के रूप में आकर उनकी सेवा करने लगे। 
 मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम ने चित्रकूट में अपने प्रेम का भी खुला प्रदर्शन किया। गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में कहें तो ’एक बार चुनि कुसुम सुहाए, मधुकर भूषण राम बनाए, सीतहि पहिराए प्रभु सादर, बैठे फटक शिला पर सुंदर’।
 वैसे महिर्षि वाल्मीकि की रामायण में केवल उनको फूलों के गहनों से सृंगार करने तक की बात से सहमत नही होते अपितु कामदगिरि पर्वत पर उन्मुक्त रूप से 99 महारास किए जाने की घोषणा करते है। वैसे ब्रह्द चित्रकूट महात्म्य में कामदगिरि पर्वत को सप्तावरन यानी सात प्रकार के आवरण में होने की बात कही गई है। पर्वत में जाने के चार द्वार बताए गए है। हर द्वार पर अलग पत्थर,अलग वनस्पति व अलग जलधाराओं के साथ अलग वन है। जिसमे अलग अलग समय प्रभु श्री राम और माता जानकी के विहार करने की बात कही गई है। उत्तर दिशा में पर्वत के ऊपर विशाल रत्न जड़ित मंदिर होने की बात कही गई है और सरयू धारा के आसपास के सुगन्धित पुष्पों वाले वन में प्रभु व माता के रात्रि के दूसरे प्रहर से मध्य रात्रि तक विचरण करने की बात बताई गई है। वैसे प्रभु श्री राम  व माता जानकी के यहाँ पर महारास की बात महाकवि कालिदास, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जैसे तमाम कवि साहित्यकार पुष्ट करते है।
 चित्रकूट में निवास के दौरान कोल किरातों के साथ ऋषि मुनि लगातार प्रभु की लीलाएं छिप-छिप कर देखा करते थे। मर्यादा पुरूषोत्तम का महारास तो प्रतिदिन रात्रि में होता था। 98 महारास होने तक प्रभु के महारास के दर्शन किसी भी भक्त को नही हो सके। 99वें महारास के समय लगभग सभी भक्तों ने उनके इस प्रेममय स्वरूप के दर्शन छिप कर किए। प्रेमरस में डूबे श्री राम और माता जानकी उन्मुक्त भाव से कामुक्तविहीन प्रेम रस का स्वादन कर रहे थे। यह देख सभी ऋषि मुनि प्रभु के प्रेमरस को देखकर आनंद में डूब गए। भोर के समय जब सभी भक्त और ऋषि श्री राम के दर्शनों को पहुँचे तो उन्होंने रात्रि कब महारास के प्रसंग पर चर्चा कर खुद भी सहभागी बनने का निवेदन किया। इस प्रस्ताव को प्रभु ने सहर्ष स्वीकार कर अगला जन्म सभी को गोकुल में लेने का आदेश देते हुए खुद श्री कृष्ण के रूप में अवतरित होने की बात कही। श्री राम ने बताया कि उनका मूल स्वरूप श्री हरिविष्णु का है। उनका निवास छीर सागर स्थित मेरू पर्वत है। श्री कामदगिरि व श्री गोवर्धन मेरू के ही स्रंग है। अगला जन्म फिर से धर्म की स्थापना के लिए होगा और आप अब मेरे सखा ग्वाल बाल या गोपियों के रूप में अवतरित होंगे। श्री कृष्ण के रूप में अंतिम रास होगा और उस महारास में यहाँ पर उपस्थित सभी के साथ पृथक-पृथक रूप में मै स्वयं महारास करूंगा।