ALL News Religion Views Health Astrology Tourism Story Celebration Film/Sport Vedio
गड़ा धन अथवा माया
November 15, 2019 • डी.एस. परिहार

पूर्व काल मे भारत को सोने की चिड़िया का जाता है। इसका एक कारण यह भी था कि भारत मे गुप्त खजानों की भरमार हुआ करती थी अनेक छोटे बड़े राजाओं के यहाँ गुप्त खजाने हुआ करते थे भारत मे पुराने समय से ही खजानो को जमीन मे दबाने की प्रथा रही है। जमीन मे गाड़ने के लिये आमतौर पर मट्टी या ताम्बें या पीतल के लोटे या घड़ो का प्रयोग होता था छोटे किसान या छोटे साहूकार मट्टी के घड़ो का प्रयोग करते थे जबकि रजवाड़े या बड़े अमीर लोग बड़े-बड़े ताम्बे के घड़ों का  प्रयोग करते थे जिन्हें आम भाषा में हंडा कहा जाता था इन विशाल हंडो मे सोना चाँदी, रत्न व आभूषण रख कर इन्हें काफी गहराई मे गाड़ा जाता था और समय आने पर अपने उत्तराधिकारियो को सौंपे जाने के लिये उस जगह का एक नक्शा और बीजक जिसमे गाड़े धन का पूर्ण विवरण होता था अपने किसी विश्वासपात्र आदमी को सौंपा जाता था यह भी सच है कि इन प्राचीन खजानें के प्रेतों का वास रहता है। क्योंकि जिसने बड़ी मेहनत से उस धन को ईकठ्ठा किया वह अपने जीवन मे उसका उपयोग नही कर पाया तो वह धन की लालसा मंे मर मौत के बाद प्रेत बन कर उन खजानों की रक्षा करता है कभी-कभी खजाना पाने के लालच मे अपनी जान गवंा देने वाले लोग भी प्रेत बन कर उस खजाने की रक्षा करते है। यह प्रेत बड़े हिंसक होते है। और मानव बलि की भी मांग कर देते है। अनेक लोग और तांत्रिक इन खजानों को पाने के लिये कभी-कभी अपनी जान गंवा देते है या इंसान की बलि तक दे देते है। अधिंकाशतः मामलों मे उन्हें खजाना नही मिलता है। कहा जाता हैं कि जब लंबे समय तक यदि उस धन का उपयोग नही किया जाता है और उसके मालिक या उसके उत्तधिकारियों की मृत्यु हो जाती है तो उस हंडे मे जीवात्मा आ जाती है। और कई नाग उसे घेर लेते है किवदंती के अनुसार नाग द्वारा उस हंडे की रक्षा किये जाने के कारण ही हंडे मे जीव पैदा हो जाता है वो जीवित उठ हो जाता है उस समय हंडे मे हैरतअंगेज शक्ति पैदा हो जाती है। वह जमीन के भीतर ही भीतर चलने लगता है। और चलते चलते कही किसी कुंये या तालाब के किनारे स्थाई रूप से रहने लगता है आम धारणा है कि खजानों के रक्षक नाग व प्रेत दिव्य और रहस्यमय शक्तियो से सम्पन्न होते है। और खजाने के वास्तविक वारिसो को ही उस खजाने को सौंपते है चाहे वो वारिस कई सौ सालों बाद जंम लेकर आये इन हंडों के बारे मे ऐसी विचित्र और सनसनीखेज बाते प्रचलित है। कि सुन कर दांतों तले उंगली दबा लेनी पड़ती हैं कहा जाता है कि जब हंडा जीवित होकर किसी तालाब के किनारे निवास करने लगता है तो उसमे पिशाचों जैसी भयानक शक्तियां आ जाती हैं। सूर्यास्त के बाद रात्रि मे अगर कोई इंसान या जानवर उस तालाब मे नहाने या पानी पीने जाता है तो उस हंडे से खन खन की आवाज आती है और एक अदृश्य रहस्यमय जंजीर पैदा होती है। जो नहाने या पानी पीने वाले आदमी या जानवर को लपेट कर गहरे में खींच कर मार डालती है। शिकार मर जाता है। सुबह तैरती हुयी उसकी लाश मिलती है। किसी तालाब पर बार बार ऐसी घटनाये होने पर विश्वास हो जाता है। कि वहाँ किसी हंडे का वास है। ऐसा एक रहस्यमय हंडे का वास छतीसगढ के रायपुर जिले के दक्षिण मे स्थित महराज बांध तालाब मे था पुरानी बस्ती मे एक बहुत पुराने जमींदार दाऊराम रसाल अग्रवाल का परिवार रहता है बताया जाता है कि दाऊराम बहुत धर्म भीरू इंसान थे उनके जीवन मे धन और संतान दोनांे का अभाव था वे नित्य ब्रह्म मुहुर्त मे महराज बांध तालाब मे स्नान करते थे एक दिन आधी रात मे ही उनकी नींद खुल गई और ब्रह्म मुहुर्त के भ्रम मे वो वह घर से स्नान करने के लिये निकल पड़े उन दिनो पुरानी बस्ती और तालाब के मध्य घनघोर जंगल पड़ता था दाऊराम भगवान का नाम जपते हुये तालाब की ओर चले जा रहे थे कि बीच मे उन्हें खन खन की आवाज सुनाई दी तभी दाऊराम ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि सामने से एक काफी बड़ा हंडा लुढकता हुआ चला आ रहा है। दाऊ जी के निकट आते हर वह हंडा रूक गया और उसके  भीतर से आवाज आई दाऊजी मै हंडा हूँ मेरे भीतर एक बड़ा खजाना है। यदि आप मेरा रहस्य किसी से ना कहें तो मैं आपको वरदान दे सकता हूँ दाऊ हंडे को बोलते देख कर हैरत मे पड़ गये उन्होने पूछा तुम मुझे कैसे आर्शीवाद दे सकते हो हंडे के भीतर से आवाज आई मैं आपको धन भी दे सकता हू और जन भी यदि आप धन मांगेगें तो जन की कमी रहेगी बहुत सोच कर दाऊजी ने कहा तुम मुझे धन का ही आर्शीवाद दो तो हंडा बोला आप मेरे भीतर हाथ डाल कर एक मुठ्ठी रत्न निकाल लो इन्हें अपने घर मे सुरक्षित रखों आपके घर मे दिन दूनी रात चैगुनी दौलत बढेगी किंतु आपके वंश मे वारिसों की कमी रहेगी दाऊ जी ने वैसा ही किया एक मुठ्ठी रत्न निकाल लिये वह हंडा लुढकता हुआ तालाब मे जाकर डूब गया दाऊजी भी स्नान करके घर लौट आये इसके बाद उस हंडे का कोई पता नही चला दाऊजी के दिन बहुर गये पर उन्हें केवल एक ही पुत्र रास बिहारी पैदा हुआ रास बिहारी के भी केवल एक ही पुत्र है। कहा जाता है कि आज भी।  उनके पुश्तैनी मकान के तहखाने मे सोने की ईंटे और हंडे के रत्न रखे हुये हैं। 1938 मे लखनऊ के अशर्फाबाद मोहल्ले मे एक 40 वर्षीय होम्योपैथी के विवाहित डाक्टर डा. महेश कुमार निगम अपने पुश्तैनी मकान मे रहते जिनके एक पुत्र था मकान के एक हिस्से मे उनके फुफेरे भाई रहते थे उनके मकान मे बने कदीमी कुंए मे एक हंडे का वास था कुऐं से कभी-कभी, खन-खन की आवाज आती थी हंडा अक्सर डाक्टर साहब और उनके फुफेरे भाई के सपने मे आकर कहता था कि अगर आप मुझे एक बलि दें और एक शिव मंदिर बनवा कर उसमे नियमित पूजा करें तो मैं आपको प्राप्त हो जाऊँगा फुफेरे भाई ने तो हंडे को स्पष्ठ मना कर दिया पर डाक्टर साहब ने धन के लालच मे हंडे से कहा आप मेरी पत्नी को ले जायें डाक्टर साहब की पत्नी अचानक मर गई और कुंये के पास खुदाई कराने पर उन्हें धन सोने चाँदी से भरा हुआ एक बड़ा हंडा मिला वे रातो रात अमीर बन गये वादे के अनुसार उन्होंने एक भव्य मंदिर बनवाया फिर उन्होने दूसरी शादी की जिससे उन्हे एक कन्या पैदा हुयी कन्या की शादी मे उन्होंने दहेज मे सौ तोला सोना दिया लेकिन भरी जवानी मे उनका विवाहित बेटा मर गया उनके अगली पीढियों ने शिव मंदिर मे पूजा करना बंद कर दी अंततः उनका परिवार नष्ट हो गया 1983 मे करीब 85 वर्ष की आयु मे डाक्टर साहब का निधन हो गया डाक्टर साहब के चचेरे पोते जिन्होने डाक्टर साहब को देखा था स्वयं मुझे यह बात 1 अगस्त 2018 को बताई थी यह बात 2010 की है उन दिनो मैं भवनों के वास्तु निरीक्षण हेतु साईट पर जाया करता था मेरे एक ज्योतिष के क्लाईट हर्ष शुक्ला ने मुझे अपने मकान के सर्वे हेतु अपने मकान पर बुलाया मै 22 फरवरी 2010 को अपने सहयोग पं. श्री  कृष्ण कुमार तिवारी के साथ उनके मकान पर गया उनका मकान जो डालीगंज लखनऊ मे हब्बीबुल्लाह हाॅस्टल के पीछे पन्ना लाल रोड जाने वाली सड़क पर दांये हाथ पर स्थित था उनका मकान अपनी बनावट के हिसाब से मेरे द्वारा सर्वे किये गये सभी मकानों मे रहस्यमय और विचित्र था उसके कुछ रहस्यों को मैं काफी माथा-पच्ची करने के बाद भी आज तक नही सुलझा सका हूँ। श्री शुक्ला ने मुझे बताया यह और उसके सामने वाला मकान उन्हे पुरखों की संपत्ति थी पहले यहाँ एक बहुत पुराना खंडहर हुआ करता था और वे लोग सड़क के पार वाले मकान मे रहते थे परन्तु अपने पिता की मृत्यु के बाद उन लोगांे ने पुराना मकान बेच कर इन खंडहरों पर नया चैमंजिला मकान बनवाया था मकान के पूर्वी हिस्से मे एक बड़ा तहखाना था जिसमे टेलीफोन एक्सचेंज चलता था मकान करीब चार फुट उँचे चबूतरे पर बना था जिसका मुख्य दरवाजा दक्षिण की ओर था द्वार पर जाने के लिये दांये बांये दोनों ओर चार पांच सीढियां थी पहली मंजिल पर किरायेदार थे दूसरी पर कुछ हिस्से मे किरायेदार और कुछ हिस्सा शुक्ला जी के कब्जे मे था तीसरी मंजिल पर वो खुद परिवार सहित रहते थे चैथी मंजिल पर छत थी बातचीत के दौरान शुक्लाजी ने बताया इस मकान के बारे मे उनके बाप दादा जो कभी जमींदार थे के समय से ही यह चर्चा थी कि मकान मे खजाना गड़ा है जो उन्हें और उनके पुरखों को कई बार सपने मे दिखा था कई पंडितों तांत्रिकों ने भी इस बात की पुष्टि की करीब तीन साल पहले बिहार का एक तांत्रिक आया जिसने ना केवल खजाने की आवाज सुनवाई बल्कि अँाखे मुंदवा कर खजाना भी दिखाया खजाना मकान के दक्षिण पश्च्छिमी कोने मे सड़क से लगे कार गैराज मे था तांत्रिक से आधे-आधे पर सौदा तय हुआ तांत्रिक ने खजाना निकालने की बहुत कोेशिश की खुदाई भी करवाई कलश का मुँह तक दिखा पर फिर कलश तेजी से नीचे धँसने लगा और गायब हो गया काफी खोदने पर भी नही मिला हर्ष जी ने मुझे फर्श का टूटा हुआ वो हिस्सा भी दिखाया जहाँ खुदाई हुयी थी उस जगह को फौरी तौर पर भर दिया गया तांत्रिक ने शुक्ला जी से फिर अपने गुरूभाई सहित दुबारा आकर शर्तिया तौर पर खजाना निकाल देने की बात की पर वह दुबारा लौट कर नही आया सबसे रहस्यमय बात यह थी मकान के तिमंजिले पर पश्च्छिम दिशा मे कमरों के मध्य एक जीना नीचे जाता था जो पहने उत्तर को जाता था फिर मुड़ कर दक्षिण की ओर मकान के बाहर सबसे निचली मंजिल पर दक्षिण पश्च्छिमी कोने पर स्थित उसी कार गैराज पर खुलता था जिसमे खजाना था हम पहले तीसरी मंजिल से पांच-छह सीढी नीचे फिर उतरे फिर दांयी ओर मुड़कर चार-पांच सीढी और उतरे और सबसे निचली मंजिल पर पहुँच गये यह कैसी इंजीनियरिंग थी कि सारी सीढियां मिलाकर हम केवल आठ-दस फुट ही नीचे उतरे और और लगभग पैंतीस फुट उँचे तिमंजिले से कैसे नीचे आ गये यह रहस्य मैं आज तक नही सुलझा सका। पुराने अलीगंज लखनऊ के मंेंहदी टोले मोहल्ले मे मेरे एक मित्र गया प्रसाद नाऊ नामक सज्जन रहते है जो पेशे से दर्जी है। उनका परिवार उनके बाबा राम भरोसे के समय 1927 से ही मेंहदी टोले मे आबाद है। मैंने कई बार उनकी कुण्डली का अध्ययन किया है। जिसके अनुसार उनका जंम 1955 की फाल्गुन पूर्णिमा की रात सुबह चार बजे लखनऊ मे हुआ था उन्होने अपने साथ घटी यह रहस्यमय घटना मुझे बताई थी उन्होंने बताया 1964 में जब वो नौ साल के थे तो अलीगंज के बेसिक शिक्षा स्कूल मे पढते थे जाडे़ के दिन थे वे जब भी स्कूल से आकर अपने कच्चे घर के दालान के दक्षिणी कोने पर खड़े होकर धूप सेंका करते थे तो अक्सर अपनी जगह पर लट्टू की तरह घूम जाते थे यह बात उन्होंने अपने पिता रामलाल जो पी.ए.सी. मे नौकरी करते थे को बताई तो उन्होने कहा शायद यहाँ माया (धन) हो शाम को डयूटी से आकर खोद के देखगें शाम करीब सात बजे वे स्ट्रीटलैंप की रोशनी मे उस जगह को खोदने लगे तभी सड़क के उस पार मकान के सामने रहने वाले प. दुर्गा प्रसाद मिश्रा आ गये करीब तीन साढे तीन फुट खोदने पर उन्हें ढक्कन लगा एक विशाल हंडा (देग) दिखाई दिया दुर्गाप्रसाद बोले मेरा पहलवान बेटा माता प्रसाद मिश्रा (बब्बू पहलवान) अभी इसे बाहर खींच कर निकाल लेगा माता प्रसाद पूरी ताकत से हंडा बाहर निकालने लगे पर शायद हंडे की माया दुर्गा प्रसाद के किस्मत मे नही थी हंडा बड़ी तेजी से बब्बू पहलवान सहित जमीन मे धँसने लगा बब्बू पहलवान जब कमर तक धँस गये तो चिल्लाये मौसिया बचाओ रामलाल ने हंडे पर लात मारी और कहा साली मुझसे ब्राह्मण की हत्या कराना चाहती है मुझे दौलत नही चाहिये हंडा जमीन मे धँसकर लुप्त हो गया और बब्बू पहलवान बच गये उसके बाद कई बार हंडा रामलाल को सपने मे दिखा और बोला आगे गोई या पीछे गोई मतलब या तो बैलों की जोड़ी की बलि दो या बड़ा लड़का बहू दो रामलाल बोले मै नमक रोटी खा लूंगा पर बलि नही दूँगा मुझे धन नही चाहिये गया प्रसाद ने बताया वे कभी जमीन के उत्तर मे सोते तो कभी दक्षिण मे सोेते जहाँ वे सोते कुछ दिन मे वहाँ की मटटी फट जाती थी और कई बार उन्होने सपने मे देखा कि जमीन से एक विशाल सुनहरा हंडा निकला है साथ मे कई और छोटी धन से भरी हंड़िया निकली हैं यह बात मै पहले कई बार सुन चुका था 4 अगस्त 2018 को रात 10 बजे मैने उनसे घटना का जिक्र छेड़ा तो उन्होने पूरी घटना विस्तार से बताई।