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गोचर के अन्र्तचक्र
January 14, 2020 • डी.एस. परिहार

विषोंत्तरी, अश्ठोत्तरी या चर आदि दषाओं के अलावा गोचर घटनाओं के समय को जानने का अति सरल व सटीक साधन है। ज्योतिश मे मंद गति वाले ग्रहों जैसे गुरू, षनि राहू केतु का अति महत्व है। क्योंकि यह ना केवल जीवन मे बड़े व महत्वपूर्ण तथा अच्छे बुरे परिवर्तन कराते है। बल्कि जीवन की दिषा ही बदल देते है। इनका प्रभाव भी गहरा व स्थाई होता है। लेकिन इनकी राषिगत अवधि काफी लंबी होती है। जैसंे गुरू 13 माह, षनि 2 वर्श छह माह राहू व केतु करीब डेढ साल। चँुकि समय व जीवन निरन्तर परिवर्तनषील है। अतः ना निरन्तर कोई सुखी रहता है। ना निरन्तर दुःखी जैसे किसी राषि पर राहू के डेढ साल की अवधि मे जातक पूरे डेढ साल तक दुःखी, रोगी या कश्ट पीड़ित नही रहेगा या गुरू के 13 माह के गोचर मे पूरी अवधि वो में सुखी ही रहेगा ऐसा असंभव है। इन अवधियों के बीच बीच मे भी अल्पकालीन सुख व दुःख के पड़ाव आते है। इन पड़ावों को समझने के लिये ग्रहों की गोचर अवधि को ग्रहों राषियों के अनुसार उपखंडों मे विभाजन की व्यवस्था हमारे तपस्वी ऋ़शियों ने हजारों साल पहले ही कर दी थी पर आलस वष हम उनका प्रयोग नही करते ग्रहों की गोचर अवधि को हम दो आधार पर उपखंडों मे विभाजित पाते है। 
1. नवांष के आधार पर 
2. अश्ठकवर्ग के आधार पर 
3. इस तीसरा विभाजन को हम लोकाचार मे साढे षनि के गोचर मे कर्मकांडी पंडितों द्वारा उपयोग करते हुये पाते है। जैसे षनि सिर पर है या चरणों पर उतार पर है। सोने का पाया लोहे का पाया आदि 
1. अश्ठकवर्ग मे किसी ग्रह के एक राषि मे गोचर मे उस राषि की आठ कक्षाओं का वर्णन मिलता है। जिसके अनुसार हर राषि को 3.45 अंषों के आठ समान भागों मे बाँटा जाता है। इसे कक्षा कहते है। किसी भी राषि का पहले भाग या कक्षा का स्वामी षनि होगा द्वितीय कक्षा गुरू की तीसरी मंगल की चैथी रवि की पाचंवी षुक्र की छठी बुध की सातवीं चन्द्र की आठवीं लग्न की। सूर्य अपनी एक कक्षा मे 3 दिन 18 घंटे मे गोचर करता है। अंय ग्रहों की अवधि इस प्रकार है। 
 ग्रह              कक्षा की अवधि 
 सूर्य             3 दिन 18 घंटे
 चन्द्र       6 घंटे 45 मिनट
 मंगल   5 दिन
 बुध   2 दिन 12 घंटे
 गुरू   1 माह 15 दिन
 षुक्र   3 दिन
 षनि   3 माह 21 दिन
 राहू/केतु     2 माह 7 दिन 12 घंटे
कोई ग्रह किसी राषि मे जिस ग्रह की कक्षा से गोचर करेगा यदि उस ग्रह को अपने प्रस्तारक वर्ग में 4 या अधिक ंिबदू मिले है। तो उस कक्षा की गोचर काल मे जातक को सुख सफलता, षुभ समाचार, विवाह, रोजगार प्राप्ति आदि घटनायें होंगी यदि किसी ग्रह की कक्षा मे उसे अपने प्रस्तारकवर्ग चार से कम बिंदू मिले है। तो उस कक्षा के गोचर मे जातक को हानि रोग, अषुभ समाचार मिलेंगें। जैसे किसी के जमांक मे षुक्र को अपने प्रस्तारक वर्ग मे छह ंिबंदू मिले हो और गुरू सप्तमेष गत  विवाह दायक राषि से निकल रहा है तथा गुरू ने उस राशि में 10 जुलाई को प्रवेष किया था तो षुक्र की कक्षा छठी हुयी तो गुरू गोचर की कक्षा अवधि 1 माह 15 दिन को  5 से गुणा करें तो योगफल 225 दिन या  7 माह 15 दिन इसे 10 जुलाई मे जोड़ा तो 25 फरवरी आया षुक्र की कक्षा 25 फरवरी से 12 अप्रैल तक चलेगी जातक का विवाह इसी अवधि मे होगा (28 की फरवरी) अंय ग्रहों के फलों अध्ययन भी  इसी प्रकार पर अध्ययन किया जाता है। 
2. नवांष के आधार पर प्राचीन ज्योतिश ग्रन्थों में एक राषि को 9 समान भागों मे विभाजित किया गया है।  यह भाग नवांष कहलाते है। जमांक मे भाग्य से संबधित नवांष जातक के विभिन्न वस्तुओं से संबधित भाग्य को बताते है। एक राशि को नवांशों विभाजित किया जाता है। प्रत्येक नवांष 3.20 अंष को होता है।  मेश राषि से मीन राषि तक नवंाष का एक चक्र 12 नवांष का होता है जो पुनः रिपीट होता है। 360 अंष के राषि चक्र मे प्रत्येक मेशादि नवांष 9 बार आते है। गोचर मे प्रत्येक ग्रह एक नवांष ( 3.20 अंष) से गोचर करने पर करीब निम्न समय लेते है 
  ग्रह                अवधि 
  सूर्य               3 दिन 8 घंटा
  चन्द्र              साढे छह घंटा
  मंगल            4दिन 10 घंटा 30 मिनट
  बुध                2 दिन 5 घंटा 30 मिनट
  गुरू                40 दिन या 1 माह 10 दिन
  ग्रह                 अवधि 
 षुक्र                2 दिन 16 घंटे
 षनि               3 माह 10 दिन
 राहू/केतु           2 माह 2 दिन
गोचर किसी भी नवांष के षुभ अषुभफल को जानने काी विधी वही है। जो उपर अश्ठकवर्ग मे पैरा मे दी गई है। जैसे षनि ने 12 जून से मेश राषि मे प्रवेष किया और हमे उसके मिथुन नवांष का फल जानना है। जो मेष राशि का तीसरा नवांश तो षनि के नवांष काल 3 माह 10 को हम दो से गुणा करेंगें तो 6 माह 10 दिन आयेगा इसे प्रवेषकाल 12 जून मे जोड़ा तो तो 1 जनवरी आया 1 जनवरी को षनि ने मिथुन नवांष मे प्रवेष किया जो आगामी तीन माह दस दिन 13 अप्रैल तक रहेगा मिथुन षनि की मित्रराषि हें अतः यह काल षुभ रहेगा।