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इलाहाबाद में जाग जाता है अंदर का शायर
January 19, 2020 • समाचार

प्रयागराज। इलाहाबाद में आते ही मेरे अंदर का शायर जाग उठता है और शायरी करने लगता हूं। मुंबई की भीड़भाड़ से जब भी थकता हूं तो इलाहाबाद में आकर पनाह लेता हूं, यहां भरपूर उर्जा मिलती है, यहां की मिट्टी में अजीब की कसक है। लेखन के लिए जितनी उर्जा यहां मिलती है, उतनी दुनिया के किसी दूसरे शहर या गांव में नहीं मिलती। यह बात फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने गुफ्तगू की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित नागरिक अभिनंद, विमोचन और मुशायरा कार्यक्रम में कही। 
टीम गुफ़्तगू की तरफ से उनका नागरिक अभिंनदन किया गया। इससे पहले संजय मासूम ने जया मोहन के कहानी संग्रह ‘मेरी चुनिंदा कहानियां’ का विमोचन किया गया। संजय ने जया मोहन की कहानियां की तारीफ़ करते हुए उनकी प्रशंसा की। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि संजय मासूम जी गुफ़्तगू के ख़ास पाठकों में से हैं, पत्रिका पढ़ने के बाद अक्सर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। यह कार्यक्रम उनके सम्मान में इसलिए किया गया है, क्योंकि यहां से उनका ख़ास नाता है, ये मुंबई में इलाहाबाद का नाम रौशन कर रहे हैं, ऐसे में इलाहाबाद वालों का फ़र्ज़ बनता है कि इनका अभिनंदन किया जाए। इनकी लेखनी और मेहनत इलाहाबाद के लोगों के लिए एक नज़ीर है, जो बताता है कि अच्छे और गंभीर लेखन से फिल्मी दुनिया में स्थान बनाया जा सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जमादार धीरज ने कहा कि संजय मासूम का नागरिक अभिनंदन करके गुफ़्तगू ने एक ज़रूरी काम किया है, ऐसे लोग हमारे लिए बेहद ख़ास है। संजय की शायरी और संवाद लेखन बेहद शानदार और मार्मिक है। विशिष्ट अतिथि अशरफ़ ख़्याल ने कहा कि मुंबई की फिल्मी दुनिया में अपना स्थान बनाना बेहद कठिन काम है, लेकिन संजय मासूम ने यह करके दिखा दिया है, हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, अनिल मानव, इश्क़ सुल्तानपुरी, पूजा रूही, वाक़िफ़ अंसारी, डा. नईम साहिल, शैलेंद्र जय, शिवाजी यादव, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, शकील ग़ाज़ीपुरी, रमोला रूथ लाल, रचना सक्सेना, मुजाहिद लालटेन, प्रकाश सिंह अर्श, शरद चंद्र श्रीवास्तव, दया शंकर प्रसाद, जया मोहन, ललिता पाठक नारायणी, असद ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी, बशारत खान, शाहिद इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में इश्क़ सुल्तानपुरी सबके प्रति आभार प्रकट किया।