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इन्सान-इन्सान का दुश्मन होता जा रहा है
January 30, 2020 • दस्तावेज - कुसुम कुमारी महरोत्रा

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ हम सोचते है कि आखिर हम दीपावली क्यों मनाते हैं। ऐसी मान्यता है, जब भगवान राम चैदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटकर आये थे, इसी खुशी में अयोध्या को दीपों से सजाया गया था, इसी कारण दीपावली का पर्व भी मनाये जाने का एक कारण भी है। बदलते महौल में आज का इन्सान, इन्सान नहीं, एक मशीन बनकर रह गया है, इतनी अधिक मँहगाई हो गई है कि इन्सान को अधिक मेहनत करना पड़ती है। एक वक्त था, अगर एक आदमी कमाता था तो चार लोगों का पेट भरता था। आज सब कमायें फिर भी पूरा नहीं होता। कुछ तो ऐसा है कि मनुष्य को अपनी जरूरते इतनी बढ़ा ली है कि यह कमी पूरी नहीं हो पाती। पहले एक माता-पिता 5-6 बच्चों को पाल लेते थे, अब एक भी बच्चा पालना भी मुष्किल हो जाता है। वर्तमान दौर में षिक्षा बहुत अधिक मंहगी हो गई है माता-पिता चाहते हुये भी अच्छे स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा नही पाते, किताबे भी बहुत महंगी हो गई, जिस कारण बच्चें अच्छी किताबे भी नही खरीद पाते। कैसे सीखेंगे अच्छी बातें पढ़े-लिखे लोग एक-दो बच्चे ही पैदा करना चाहते है और जो अनपढ़ है उनके बच्चे छोटे-छोटे काम सीखने लगते है। पढ़ाई नही होगी तो वह लोग अच्छा बुरा क्या समझेंगे। आप सोचिये कि आगे चलकर देश का क्या होगा। पढे-लिखे कम और अनपढ़ ज्यादा। देश का विकास कैसे होगा और बड़े होकर भी अनपढ़ बच्चे कुछ समझ नही पायेंगे उन्हें समझाना-भैंस के आगे बीन बजाना ही जैसा होगा। आखिर वह देश के लिए क्या करेंगे, ईश्वर ही मालिक है। इन्सान पैसे के पीछे ही दौड़ता रहता है। उचित-अनुचित किसी भी तरीके से पैसा पैदा करे और क्या कभी इस पर किसी ने सोचा है जो नेता देश को चला रहें है। उन्हें तो सोचना चाहिए परन्तु जिन्हें ज्ञान ही नहीं है वह क्या सोचेंगे। जो बच्चे तेज होते है वह तो पढ़ लेते है परन्तु उनका यहाँ कोई भी महत्व नही है, परिणामस्वरूप वह विदेश चले जाते है। भारत में जितनी प्रतिभा है, वह अन्य देशों के काम आ जाती है। यदि हमारी सरकार इन प्रतिभाशाली लोगों की आवश्यकतायें पूरी कर दे तो अपने देश का ही लाभ होगा। हमने तरक्की तो की है लेकिन दूसरे देशों की नकल में अपने देश की अदब, तहजीब, नजाकत, नफासद जो यहाँ की खूबी है सब भूलते जा रहे हैं। खास तौर पर लखनऊ इसके लिए मशहूर है। परन्तु अब वह बात कहाँ हैं। इन्सान-इन्सान का दुश्मन होता जा रहा है, जिन्दगी लेना किसी के लिये कोई बड़ी बात नहीं रह गई है, पर यह सोचिये कि जब आप किसी को जिन्दगी दे नही सकते तो आपको जिन्दगी लेने का हक किसने दिया। कानून व्यवस्था ठीक नहीं है, किसी का क्या जब भगवान कहिए, खुदा कहिए या ईसा मसीह कहिए सब एक ही है, जब उनका ही डर नही रहा यानी इन्सान-इन्सान नहीं जानवर से भी बदत्तर होता जा रहा है। क्या होगा आगे वही जाने क्यों नही सोचते कि बात का हल लड़ाई से नही निकलता बैठकर आपस बातचीत से समस्या का समाधान कर सकते हैं। यह सब तभी संभव होगा जब इन्सान पढ़ा-लिखा होगा, समझेगा। इसलिए अति आवश्यक है कि शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाये। हम सब को इस दीपावली  के अवसर पर संकल्प लेने चाहिए एक बच्चे को शिक्षित बनाने में यथासंभव सहयोग करेंगे। आगे अपनी-अपनी सोच भगवान सबको बुद्धि दे!