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जाके बैरी सम्मुख ठाडे, ताके जीवन को धिक्कार
November 29, 2019 • रंजीत सिंह यादव

जब कभी वीर और वीरता की बात होती है तो, बुंदेलखंड की वीर भूमि महोबा और आल्हा एक दूसरे के पर्याय हैं। महोबा की सुबह आल्हा से शुरू होती है और उन्हीं से खत्म। बुंदेलखंड का जन-जन आज भी चटकारे लेकर गाता है।
बुंदेलखंड की सुनो कहानी बुंदेलों की बानी में
पानीदार यहां का घोडा, आग यहां के पानी में
 महोबा के अनेकों स्मारक आज भी इन वीरों की याद दिलाते हैं। सामाजिक संस्कार आल्हा की पंक्तियों के बिना पूर्ण नहीं होता। आल्ह खंड से प्रभावित होता है। जाके बैरी सम्मुख ठाडे, ताके जीवन को धिक्कार। आल्हा का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि 800 वर्षो के बीत जाने के बाद भी वह आज भी बुंदेलखंड के प्राण स्वरूप हैं।
 आल्हा गायक इन्हंे धर्मराज का अवतार बताता है। कहते है कि इनको युद्ध से घृणा थी और न्यायपूर्ण ढंग से रहना विशेष पसंद था। इनके पिता जच्छराज (जासर) और माता देवला थी। ऊदल इनका छोटा भाई था। जच्छराज और बच्छराज दो सगे भाई थे जो राजा परमा के यहाॅ रहते थे। परमाल की पत्नी मल्हना थी और उसकी की बहने देवला और तिलका से महाराज ने अच्छराज और बच्छराज की शादी करा दी थी। मइहर की देवी से आल्हा को अमरता का वरदानल मिला था। युद्ध में मारे गये वीरों को जिला देने की इनमें विशेषता थी। लार हो कर कभी-कभी इन्हें युद्ध में भी जाना पड़ता था। जिस हाथी पर ये सवारी करते थे उसका नाम पश्यावत था। इन का विवाह नैनागढ़ की अपूर्व सुन्दरी राज कन्या सोना से हुआ था। इसी सोना के संसर्ग से ईन्दल पैदा हुआ जो बड़ा पराक्रमी निकला। शायद आल्हा को यह नही मालूम था कि वह अमर है। इसी से अपने छोटे एवं प्रतापी भाई ऊदल के मारे जाने पर आह भर के कहा है, कहीं मैं पहले ही जानता कि मैं अमर हूँ तो मेरा छोटा भाई क्यों जूझता। यह आल्हा का छोटा भाई, युद्ध का प्रेमी और बहुत ही प्रतापी था। अधिकांश युद्धों का जन्मदाता यही बतलाया जाता है। इसके घेड़े का नमा बेंदुल था। बेंदुल देवराज इन्द्र के रथ का प्रधान घोड़ा था। इसक अतिरिक्त चार घोड़े और इन्द्र के रथ मंे जोते जाते थे जिन्हंे ऊदल धरा पर उतार लाया था। इसकी भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि देवराज हन्द्र मल्हना से प्यार करता था। इन्द्रसान से वह अपने रथ द्वारा नित्ःयर्ही आ निशा में आता था। ऊदल ने एक रात उसे देख लिया और जब वज रथ लेकर उड़ने को हुआ, ऊदल रथ का धुरा पकड़ कर उड़ गया। वहां पहुंच कर इन्द्र जब रथ से उतरा, ऊदल सामने खड़ा हो गया। अपना मार्यादा बचाने के लिए इन्द्र ने ऊदल के ही कथनानुसार अपने पांचों घोडे जो उसके रथ में जुते थे दे दिये। पृथ्वी पर उतर कर जब घोड़ों सहित गंगा नदी पार करने लगा तो पैर में चोट लग जाने के कारण एक घोड़ा बह गया। उसका नाम संडला था और वह नैनागढ़ जिसे चुनार कहते है किले से जा लगा। वहां के राजा इन्दमणि ने उसे रख लिया। बाद में वह पुनः महोबे को लाया गया और आल्हा का बेटा ईन्दल उस पर सवारी करने लगा।
ऊदल वीरता के साथ-साथ देखने में भी बड़ा सुन्दर था। नरवरगढ़ की राज कन्या फुलवा कुछ पुराने संबंध के कारण सेनवा की शादी मं्रंे नैनागढ़ गयी थी। द्वार पूजा के समय उसने ऊदल को देख तो रीझ गयी। अन्त में कई बार युद्ध करने पर ऊदल को उसे अपना बनाना पड़ा। ऊदल मे धैर्य कम था। वह किसी भी कार्य को पूर्ण करने के हतु शीघ्र ही शपथ ले लेता था। फिर भी अन्य वीरों की सतर्कता से उसकी कोई भी प्रतिज्ञा विफल नही हुई। युद्ध मंे ही इसका जीवन समाप्त हो गया। इसका मुख्य अस्त्र तलवार था। 
मलखान का ब्याह पानीपत के महाराज मधुकर सिंह की कन्या जगमोहन से हुआ था। इस ब्याह में भी महोबी वीरां को खूब लड़ाई लड़नी पड़ी थी। जगमोहन का भाई नवमंडल इतना योद्धा था कि महोबियों की हिम्मत रह-रह के छूट जाती थी। स्वयं ऊदल कई बार मूर्छित हो उठा था। 
 मलखान उसके मोर्चा थाम सका। वरदान के कारण पाँवांे के तलवे को छोड़ उसकी सारी शरीर अष्टधातु की हो गयी थी। उसके शरीर से किसी प्रकार का वार होने पर आग की चिनगारियां निकलने लगती थी। इसकी मृत्यु तभी हुई जब कि धोखे मंे जगमोहन ने बैरी को अपने पति के तलवे में प्राण रहने की बात बता दी।
सुलखान आल्हा में अंगद के नाम से गाया गया है। यह मलखान का छोटा भाई था। युद्ध काल में मलखान के रथ को यही हांकता था। मलखान के पराक्रम का श्रेय इसी को है। रथ को लेकर अभी आकाश मंे उड़ जाता था तो कभी बैरियों के दल में कूद पड़ता था। कही-कहीं इसे भगवान कृष्ण की भी संज्ञा मिली है। इसके अतिरिक्त उसे युद्ध कला का भी अच्छा ज्ञान था। जिस दल का सम्पूर्ण जीवन ही युद्धमय रहा उसमें एक कुशल दूत का होना भी आवश्यक था। ऐसे कार्यो के लिए जगनी अपने दल में आवश्यकता पड़ने पर यह संदेश पहुंँचाया करता था। आल्हा मंे इसके लिए धावनि (दूत) शब्द का भी प्रयोग किया गया है। इसकी चाल घोड़े से भी कई गुने तेज थी। दूसरे के मन की बातें जान लेना था और भविष्य की बातें भी बता देता था। राह में चलते हुए यदि महोबी वीर कहीं युद्ध में फँस जाते थे तो राज्य में खबर ले जाने का कार्य जगनी को ही सांैपा जाता था।
 सबसे बड़ी बात यह थी जो उसे 12 जादू और 16 मोहिनी का अच्छा ज्ञान था। उस समय जादू की भी लड़ाई हुआ करती थी। आल्हा की पत्नी सोनिवां भी जादू में माहिर थी। ऐसे समय में सुखेना का रहना आवश्यक था। इसने कई बार अपने दल को दुश्मनों द्वारा चलाये गये जादू से मुक्त किया था।
डेरिया ऊदल का सच्चा साथी, जाति का ब्राहा्रण था। यह एक अनोखा जासूस था, जिसे बावनों किलो का भेद भली-भांति मालूम था। ऊदल की तरह यह उदकी नही था बल्कि बहुत सोच-समझ कर कदम उठाता था। इसके लिए कभी-कभी ऊदल नाराज भी हो जाता था। कुछ आल्हा गायक डेरिया के लिए ढेवाशब्द का भी प्रयोग करते है। परन्तु डेरिया और ढेबा दो सगे भाई थे जो पियरी के राजा भीखम तेवारी के लड़के थे। एक दिन दोनों पिता से आज्ञा ले विदेश को निकल पड़े । कुछ दूर आकर दोनों, जान-बूझकर दो रास्ते पर हो लिये। इस प्रकार डेरिया महोबा पहुंचा और ढेबा लोहगाजर। डेरिया हंशा नामक घोड़े पर सवारी करता था जो इन्द्र के घोड़े मंे से एक था। इसे डेरिया भी कहा जाता है। ऊदल को डेरिया पर गर्व था। संकटकाल मंे वह इसी को पुकाराता था। यह देवो का परम भक्त था और देवी इसे इष्ट भी थी।
महोबे की बढ़ती हुई धाक देख जहां दूसरे राजा जलते थे वही लाखन एक राजा होते हुए भी महोबे की ओर से लड़ता था। यह कन्नौज के महाराज जयचंद्र का लड़का था। इसकी 160 रानियाँ थी। ऊदल से इसकी मित्रता हो गयी थी और उसी के साथ महोबे केू लिए सदा लड़ता रहा सी मंे उसकी मृत्यु भी हो गयी।