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लाॅकडाउन में हो रहे कई सकारात्मक काम
April 27, 2020 • इम्तियाज अहमद गाजी • Views

प्रयागराज। कोरोना संक्रमण के कारण लाॅकडाउन लागू किए जाने के बाद से भारत समेत लगभग पूरी दुनिया में नई संस्कृति विकसित होती दिख रही है। लोग तरह-तरह के तरीके इजाद करते हुए अपने काम कर रहे हैं। लाॅकडाउन के कारण वायु और जल प्रदूषण में भी कमी आयी है, वातावरण शुद्ध हो रहा है। ये बात और है कि रोज कमाने-खाने वालों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, इसमें तो कोई शक नहीं है, तरह-तरह से इनकी मदद करने की कोशिश की जा रही है, मगर यह मदद पर्याप्त नहीं है। कुछ इलाकों में भूखमरी की समस्या भी सामने आ सकती है, इससे समाज और देश कैसे निपटेगा, यह सवाल सामने मुंह बाये खड़ा है। सरकार अपने तौर पर इसके लिए कोशिश भी करने में जुट गई है। लेकिन इन सबके बीच कई क्षेत्रों में नई संस्कृति विकसित हो रही है लोग अलग-अलग तरीकों से अपने कार्य करने का प्रयास कर रहे हंै। ऐसे कार्य सराहनीय और उल्लेखनीय हैं, जिन्हें देखने-सुनने पर प्रसन्नता हो रही है। शिक्षा के मामले में आॅनलाइन क्लासेज कारगर हो रहे हैं। जिन संस्थानों में जहां पहले से ही आॅलाइन क्लासेज चल रहे थे, उनके क्लास की प्रासंगिकता बढ़ने के साथ ही इनके छात्रों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो रहा है। भारतीय चार्टड अकाउंटेंट संस्थान की तरफ से पहले से ही आॅनलाइन क्लासेज होते थे, इनके लगभग सात लाख विद्यार्थी थे, लाॅकडाउन के होने के बाद इनके विद्यार्थियों की संख्या दस लाख तक पहुंच गई है। इनका एक वैश्विक सम्मेलन होना था, लेकिन लाॅकडाउन की वजह से इसे अब आॅनलाइन करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। रोजाना हजारों की संख्या में देश समेत लगभग पूरी दुनिया के छात्र पंजीकरण करवा रहे हैं। अगर यह दिल्ली में कांफ्रेंस होता तो लोगों के रुकने, खाने-पीने, साज-सज्जा, हाॅल, स्टेज आदि मिलाकर करोड़ों रुपये खर्च होते, भीड़-भाड़ और ट्रैफिक आदि की समस्या अलग।
एनसीईआरटी, सीबीएसई और विश्वविद्यालयों ने भी आनलाइन शिक्षण कार्य कई स्तर पर शुरू कर दिए हैं। तमाम कोचिंग संस्थानों ने भी आॅनलाइन पढ़ाई शुरू कर दिया है, दिनोंदिन यह प्रक्रिया और अधिक बढ़ने वाली है। बहुत मुमिकन है कि आॅनलाइन कामकाज आसानी से होते दिख रहा है, अब कोरोना की समाप्ति के बाद भी इसी तरह से काम करने-कराने की प्रक्रिया जारी रहे, क्योंकि यह सरल और सस्ता है। इसमें कोई भौगोलिक बाध्यता भी नहीं है। दूर के गांव, शहर या किसी दूसरे देश में रहते हुए भी काम किया-कराया जा सकता है। देश की तमाम कंपनियां प्रशिक्षण आदि के लिए अमेरिका, जापन, इटली, ब्रिटेन से विशेषज्ञों को बुलाती थी। अब इस पर भी बे्रक लगता सकता है, इनसे अब आॅनलाइन ही प्रशिक्षण आदि दिलाया जा सकता है।
इसी के साथ ही साहित्यिक आयोजनों में खासतौर पर कवि सम्मेलन, मुशायरे, कविता-शायरी पर परिचर्चा, घर में रहकर लेखन और पंेटिंग आदि का काम भी खूब जोरों से हो रहा है। आफिस या फिल्ड में रहने के कारण समय का अभाव जिन कलाकारों-रचनाकारों के लिए बड़ी समस्या थी, वह दूर हो गई हैं। हजारों की संख्या में कवियों लेखकों ने अपनी किताबें तैयार कर ली है। इन किताबों पर लोगों से भूमिका आदि लिखने का काम भी आसानी से हो रहा है। हजारों की संख्या में लोगों ने अपनी किताबें छपने के लिए तैयार कर लिये हंै। कई लोगों ने तो दो से तीन किताबें भी तैयार कर ली है। लाॅकडाउन के इस समय को लेखन के लिए स्वर्णिम समय माना जाने लगा है। तमाम लोगों रीडिंग हैविट लगभग खत्म हो गई थी। लाॅकडाउन के बाद लोगों ने अध्ययन करना शुरू कर दिया है। अलमारियों में धूल खा रही किताबों के दिन जैसे लौट आए हैं। बहुत से लोगों ने पुस्तक मेलों आदि में किताबें खरीद जरूर ली थी, लेकिन अध्ययन नहीं किया। अब उन किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया था। तमाम साहित्यिक संस्थाओं ने आॅनलाइन कवि सम्मेलन और मुशायरे कराने शुरू कर दिए हैं। प्रयागराज की साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ ने तो प्रतिदिन आॅनलाइन काव्य परिचर्चा शुरू किया है, जिसमें देश के बड़े-बड़े साहित्यकार भी शामिल हो गए हैं। इस परिचर्चा में दिवंगत कवियों के साथ नए लोगों की रचनाओं पर भी चर्चा की जा रही है, वरिष्ठ लोग युवाओं की रचनाओं पर उन्हें तथ्यात्मक सुझाव भी दे रहे हैं। इस आॅनलाइन परिचर्चा में ममता कालिया, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, यश मलावीय, विज्ञान व्रत, गौतम राजऋषि, माहेश्वर तिवारी जैसे लोग भी शामिल हो गए हैं। ‘महिला काव्य मंच’ की इकाइयों ने भी देश के अलग-अलग हिस्से में लगभग प्रतिदिन कोई न कोई साहित्यिक आयोजन कराना शुरू कर दिया है। मोबाइल कंपनियों के लिए भी यह समय काफी लाभदायक साबित रहा है, क्योंकि जब से लोगों घर से बाहर निकलना बंद किया है, तब मोबाइल और इंटरनेट का प्रयोग व्यापक पैमाने होने लगा है। घर में रहने के लिए मजबूर लोगों के लिए सोशल मीडिया और टेलीविजन ही मात्र मनोरंजन और जानकारी के साधन हैं। जो लोग क्रिएटिव वर्क से नहीं जुड़े हैं, उनके लिए समय बीताने के मात्र साधन सोशल मीडिया और टेलीविजन ही रह गए हैं। मोबाइल एप्लीकेशन में जूम, ब्लू जीन, सिस्को आदि जबरदस्त तरीके से काम कर रहे हैं। इनके जरिए कंपनी के लोग अपने कर्मचारियों से बात कर रहे हैं, बैठकों और सेमिनार का आयोजन
आॅनलाइन होने शुरू हो गए हैं। शीघ्र की सरकार दफ्तरों के बहुत से काम आॅनलाइन शुरू किए जाने वाली हैं। कई राज्य सरकारों ने अफसरों से रणनीति तैयार करने के लिए कह दिया, जिसके जरिए काम शुरू किया जा सके। कुल मिलाकर लाॅकडाउन से एक नई संस्कृति बनती दिख रही है, जो हमारे समाज को नई दिशा देगी।