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मां गंगा दिवस के अवतरण पर गंगा का उदगम विषय परिचर्चा
June 2, 2020 • प्रयागराज। • Celebration

शाश्वत सांस्कृतिक साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था द्वारा आयोजित आनलाइन परिचर्चा मां गंगा दिवस के अवतरण पर गंगा का उद्गम विषय परिचर्चा हुई जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं अधिवक्ता ऋतंधरा मिश्रा जी ने कहा की  गंगा का उद्गम गोमुख जिसके हम सशरीर दर्शन करके आते हैं। वह असली गोमुख नहीं है वो तो मात्र संसार को वही तक रोकने का एक उपाय है क्योंकि वास्तविक गोमुख को हमेशा बचाकर सुरक्षित रखना है सदियों से लोग सशरीर वहीं से प्रणाम करके वापस आ जाते हैं क्योंकि असली गोमुख तक शरीर जाना संभव ही नहीं।
पूरी गंगा अल्केमिकल प्रयोग है इस जगत में एक मात्र अनूठा अनुपम क्योंकि गंगा एक ऐसी इकलौती नदी है जो उद्गम से लेकर अंत तक एक रासायनिक द्रव्य में बदल दी गई थी जिसके जल में यह विशेषता पैदा कर दी गई थी कि सालों तक उसका जल बाहरी जीवाणुओं से प्रभावित नहीं हो सकता था। गंगा ही एक ऐसी नदी है जिस के जल में यह विशेषता पाई जाती है कि यदि उसमें आप अस्थियों को प्रवाहित करें तो वह पूर्णतया घुल जाती है इसलिए सनातन ने अस्थि विसर्जन के उपयुक्त केवल गंगा को कहा पर हड्डियों को गलाने की क्षमता रखते हुए भी गंगा अपने भीतर और बाहर दोनों जगह पर पल रहे जीवन को पालती है और पोषित भी करती है गंगा पहाड़ों से बहती हुई कोई सामान्य नदी नहीं है बल्कि सुनियोजित प्रयोग के तहत एक बहाई गई नदी है क्योंकि गंगा के ठीक बगल से उसी पहाड़ से निकलने वाली नदी अलकनंदा में तो वह गुण नहीं पाई जाती जैसा कि गंगा में पाए जाते हैं जिसके आचमन और स्नान के तुरंत बाद यदि मंदिरों और तीर्थों में शरीर प्रवेश करें तो इस शरीर के अवचेतन और अंतर्मन की यात्रा प्रारंभ कराई जा सकती है गंगा के जल में तो खूबियां पैदा की गई थी कि इसके प्रयोग से शरीर के अंदर और बाहर कुछ समय के लिए चित की दशा और दिशा में परिवर्तन कर इस शरीर को आगे की साधना के लिए तैयार किया जा सके इसीलिए हिंदुओं के सारे तीर्थ इसी नदी पर बसाए गए गंगा हिंदुओं द्वारा पांच महा भूतों में से एक जल पर किया गया अब तक का सबसे गहरा प्रयोग है जिसमें कुंजी छिपी थी इस शरीर के साथ चेतना के दूसरे स्वरों तक जाने की वह हमें परमात्मा के द्वार तक भी ले जा सकती थी परंतु अब शायद हो कुंजी हमसे गुम हो गई वास्तव में सर शरीर असली गोमुख तक जाना असंभव है पर यदि सूक्ष्म शरीर की चेतना को ऊंचाई प्रदान की जाए तो निसंदेह आज भी उस प्रयोगशाला को देखा जा सकता है। जहां एक सामान्य जल को इतने विस्तृत और लंबे समय के लिए इतने कीमती जल में बदल दिया गया कि सदियों सदियों तक उस जल की वह गुणवत्ता आज भी ना सिर्फ कायम है बल्कि आने वाली पीढ़ियों को आश्चर्य से अभिभूत कर रही है। इसके अतिरिक्त  चर्चा में कैंब्रिज कालेज की प्रधानाचार्य वंदना जी ने अपनी बात रखी तथा इस आनलाइन पर चर्चा में हिस्सा लिया साधना प्रतिभा सुमित अखिलानंद दिवेदी अमिताभ आमेश संजय सक्सेना महक जौनपुरी ने अपने विचार व्यक्त किए परिचर्चा कार्यक्रम का संचालन श्रीमती रचना सक्सेना ने किया।