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माँ का आँचल
November 19, 2019 • संकलित प्रेरणा कहानी - रंजीत सिंह यादव


शाम को मोबाइल बजा! उठाया तो उधर से रोने की आवाज मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभी जी आखिर हुआ क्या? उधर से आवाज आई आप कहाँ हैं और कितनी देर में आ सकते हैं?
मैंने कहा, आप परेशानी बताइये और भाई साहब कहाँ हैं? माता जी किधर हैं? आखिर हुआ क्या? लेकिन उधर से केवल एक रट कि आप आ जाइए, मैंने आश्वाषन दिया कि कम से कम एक घंटा लगेगा. जैसै तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा, देखा तो भाई साहब (हमारे मित्र जो जज हैं) सामने बैठे हुए हैं. भाभी जी रोना चीखना कर रही हैं, 13 साल का बेटा भी परेशान है. 9 साल की बेटी भी कुछ नही ंकह पा रही है., मैंने भाई साहब से पूछा कि आखिर क्या बात है. भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे। फिर भाभी जीने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं, मुझे तलाक देना चाहते हैं, मैंने पूछा, ये कैसे हो सकता है, इतनी अच्छी फैमिली है, 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है। लेकिन मैंने बच्चों से पूछा दादी किधर हैं? बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है।
मैंने घर के नौकर से कहा, मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ, कुछ देर में चाय आई, भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं पिलाने की. लेकिन उन्होंने नहीं पिया. और कुछ ही देर में वो एक मासूम बच्चे की तरह फूट-फूटकर रोने लगे। बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है, मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले कर के आया हूँ.। पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली. कि मैं माँ जी का ध्यान नही ंरख सकती। ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. रोज मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी, नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे. माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया, बेटा तू मुझे ओल्डऐज होम में शिफ्ट कर दे।
मैंने बहुत कोशिशें की ंपूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नही ंकी जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी, दूसरों के घरों में काम कर के मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ, लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं।
उस माँ को मैं ओल्डऐज होम में शिफ्ट कर के आया हूँ.। पिछले 3 दिनों से मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ, जो उसने केवल मेरे लिए उठाये. मुझे आज भी याद है जब मैं 10 वी की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात-रात भर बैठी रहती। एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था. उसका षरीर गर्म था, तप रहा था. मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है। लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया. मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम खराब ना हो जाए। कहते-कहते रोने लगे और बोले, जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे? हम जिनके शरीर के टुकड़े है, आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नही ंजानते। जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ.।
आजादी अगर इतनी प्यारी है और माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आजादी देना चाहता हूँ.। जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ। सारी प्रॉपर्टी इन लोगो ंके हवाले करके उस ओल्डऐज होम में रहूँगा, कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ और अगर इतना सब कुछ करके माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है, तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा. मां के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी, माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी। जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे। बातें करते करते रात के 12.30 हो गए। मैंने भाभी जी के चेहरे को देखा. उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे. मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे। भाभी जी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे।
 बहुत ज्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला. भाई साहब ने उस गेट कीपर के पैर पकड ़लिए, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ, चैकीदार ने कहा क्या करते हो साहब, भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ, उस चैकीदार ने कहा, जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नही ंकर पाये, औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब, इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया। अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी. उसने बड़े कातर शब्दों में कहा, 2 बजे रात को आप लोग ले जा के कहीं मार दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी? मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये. ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं।
अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति मे ंमैं नहीं हूँ।. केवल एक फोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है। मुझे देखी ंतो उनको लगा कि बात न खुल जाए लेकिन जब मैंने कहा, हम लोग आपको लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक-दूसरे को पकड ़कर रोने लगी। आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जागकर बाहर तक ही आ गए, उनकी भी आँखें नम थीं।
कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई, पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये. सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो षान्त रहे। लेकिन भाई साहब और माताजी एक-दूसरे की भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे.घर आते-आते करीब 3.45 हो गया। भाभी जी भी अपनी खुषी की चाबी कहाँ है ये समझ गई थीं। मैं भी चल दिया. लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृष्य घूमते रहे। माँ केवल माँ है. उसको मरने से पहले ना मारें. माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें, अगर वह कमजोर हो गई तो हमारी संस्कृति की रीढ ़कमजोर हो जाएगी, बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नही।ं अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, बात को प्रभावी ढंग से समझायें, कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें। अगर माँ की आँख से आँसू गिर गए तो ये कर्ज कई जन्मों तक रहेगा, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर सुकून नहीं होगा। सुकून सिर्फ माँ के आँचल में होता है उस आँचल को बिखरने मत देना।