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महल के प्रेत
November 8, 2019 • धीरेन्द्र सिंह परिहार

भूत-प्रेत की यह अजीबो-गरीब सत्यघटना कलकत्ता से 27 मील दूर चैगाछा गांव मे सन 1892 मे घटी थी, महेन्द्रनाथ चैधरी इस ईलाके के बहुत जागीरदार थे 80 गांव उनकी जागीर मे आते थे अंग्रेजों को हर साल भारी लगान देने के कारण वो अंग्रेजों के चहेते और विश्वासपात्र व्यक्ति थे चैगाछा मे उनका 32 विशाल कमरों का तिमंजिला महल था जिसे उनके परदादा स्व. देवेन्द्रनाथ चैधरी ने 1760 मे बनवाया था चैगाछा बड़ी मनोरम जगह थी नदी, पेड़ पौधे शांत शीतल आबो हवा चारो ओर बिखरी हरियाली आंखें तृप्त हो जाती थी महल गांव की आबादी से कुछ दूर दक्षिण पश्छिम दिशा मे एक ऊंचे टीले पर बना था महल के दक्षिण मे 22 सौ बीघे मे फैला घना जंगल था उसके बाद गंगा नदी बहती थी जंगल के बीच मे एक झील थी जिस पर लकड़ी और पत्थरों से बना एक पुराना पुल था मुख्य सड़क से महल तक लाल रोड़ी की पक्की चिकनी सड़क जाती थी सड़क के दोनो ओर घने विशाल पेड़ थे उनमे से काफी पेड़ 1864 के तूफान मे नष्ट हो गये थे 1857 की गदर मे उनके पिता रवीन्द्रनाथ बागियों डर से महल छोड़ कर कलकत्ते मे एक बंगला खरीद कर रहने लगे थे कभी कबाध वह चैगाछा जाते और जागीर के मुनीम हरिशचन्द्र मुखर्जी से लगान की रकम वसूल कर वापस आ जाते थे रायचैधरी के साथ भयानक और डरावने हादसों की शुरूआत तब हुयी जब महेन्द्रनाथ अपनी पत्नी सुमित्रा और दोनो बच्चों 12 साल की बेटी नन्दनी और 18 साल के बेटे सुरेन्द्रनाथ के साथ 1892 मे अपने पुश्तैनी महल मे रहने आये उनका पुश्तैनी महल ने पूर्वजों के कई विवाहों और और मौतों का गवाह था उनके वापस आने से 36 साल बाद महल फिर आबाद हुआ था महल मे वापस आने पर कुछ समय तक तो सब कुछ सांमाय रहा फिर सावन की एक रात नन्दनी पानी पीने के लिये उठी तो उसे ऊपर के कमरे से किसी के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी जैसे कोई छोटी लड़की खेल रही हो वह लैम्प लेकर उपर गई चारो और देखा पर उसे कुछ नजर नही आया पर जैसे ही वो वापस लौटने को मुड़ी तो उसने देखा कि सामने एक 5-6 साल की सफेद कपड़े पहने कोई खड़ी है। उसका चेहरा एकदम सन की तरह सफेद और सूखा था मानो चेहरे पर सफेदी पोत दी गई हो आखों की जगह दो काले गढढे थे उसके सूख और बेहद पतले हाथ घुटनों के नीचे पंजों तक लटक रहे थे हाथों की लंबी पतली उंगलिया अलग अलग और फैली हुयी थी तभी नंदनी ने देखा कि वो लड़की जमीन से एक फुट उपर हवा मे लटकी हुयी थी नन्दनी यह देखकर थर-थर कांपने लगी फिर तेेज आवाज मे चीखी माँ मां और बेहोश हो गई आधी रात के सन्नाटे को चीरती हुयी नंदनी के चीखने की तथा फिर गिरने की आवाज ने सुमित्रा को उठा दिया सुमित्रा ने अपने पति और सुरेन्द्र को जगाया चीख सुन कर नौकर शिवनाथ और हरीराम भी आ गये सब लोग उपर पहुंचे तो सीढियों के पास नन्दनी को बेहोश देख कर महेन्द्रनाथ जी का कलेजा मुंह को आ गया सुमित्रा फूट-फूट कर रोने लगी नौकर भी घबरा गये नौकरों की मदद से महेन्द्रनाथ नन्दनी को नीचे ले आये और हरीराम के जरिये वैैद्य राजनारायण बुलवाया वैद्यजी आनन-फानन मे आये उन्होने नन्दनी की नब्ज और आंखें खोल कर देखी फिर बोले घबराने की कोई बात नही है, बिटिया कुछ देख कर डर गई है। उन्होने अपनी पेटी से कोई शीशी निकाल कर दवा सुंघाई नन्दनी कुछ पल बाद होश मे आ गई। उसने जो बताया उस पर किसी ने यकीन नही किया परन्तु गांव मे कुछ लोगांे ने भूतप्रेत की आंशका जाहिर की। बात आई गई हो गई उसके दो माह तक तो कुछ नही हुआ फिर एक रात सुरेन्द्र लघुशंका हेतुे उठा मूघर महलके पच्छिमी कोने मे पड़ता था जब वह वापस लौट रहा था जो उसे किसी बच्चे के फुसफसाने की आवाज सुनाई दी माँ मां मै सन्ध्या हूं। फिर किसी के खिखिलाने की आवाज सुनाई दी सुरेन्द्र ने चारो तरफ देख पर उस ेकोई नही दिखाई ्रदिया वह बुरी ताह डर गया और भाग कर सुमित्रा को जगा कर उनसे लिपट कर बुरी तरह रोने लगा घर के सब लोग जाग गये सारी घटना जानकर सब लोग बुरी तरह डर गये उस रात दुबारा घर कोई सांे नही सका। दूसरे दिन यह बात सारेगांव मे फैल गई पर कोई नही जानता था कि सन्ध्या कौन है। इसके तीन माह बाद की बात है, यह कड़क जाड़े की रात थी करीब उस 3 बजे थे सुमित्रा को ऊपर के कमरे मे कुछ खट-पट सुनाई दी वह हथ मे दिया लेकर पता लगाने गई कि क्या बात है। उन्होने सारा महल छान मारा परन्तु उन्हें वहां कुछ भी असांमाय नजर नही आया जब लौट रही थी तो उन्हे अपने पीछे किसी छोटी लड़की की आवाज सुनाई दी कि मां-मां मै सन्ध्या हूँ! सुमित्रा ने पीछे मुड़कर देखा तो उन्हे कोई नही दिखा रात के सन्नाटे मे उस रहस्यमयी आवाज को सुनकर आवाज उनका खून जम गया वह बुरी तरह घबरा गयीं और भाग कर अपने कमरे मे आ गयीं दूसरे दिन सुमित्रा की मां की दिल के दौरे से मौत हो गयी। उसके कुछ दिन बाद सुरेन्द एक शाम खेतो मे मजदूरों से काम करवा कर घर आ  रहा था तों रास्ते मे उसे बाई ओर के खेत मे 30-40 फुट दूर एक सफेद सी चीज दिखाई दी कुछ पास जाने पर उसने देखा कि यह सफेद कफन मे लिपटी 5-6 साल के बच्चे की लाश थी उस वक्त आसपास वहाँ कोई नही था सूरज डूब रहाथा चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था सुरन्द्र का दिमाग सुन्न हो गया वह कुछ सोच नही पा रहा था कि क्सा करे तभी उसे बच्ची की आवाज सुनाई दी कि मां-मां मै सन्ध्या हूँ। जब दोबारा आवाज आई तो मारे डर के सुरेन्द्र के पैर कांपने लगे आंखों के सामने अँंधेरा छा गया आवाज कफन से लिपटी लाश से आ रही थी वह बुरी तरह घबरा कर वहां से भाग चला तभी उसे रास्ते मे गंाव के डाक बाबू ताता शंकर बनर्जी मिले सुरेन्द्र को उस हालत मे दखकर वो बुरी तरह चैंक गये सुरेन्द्र उनसे लिपट कर बुरी तरह रोने लगा उन्होने उसे सान्तवना दी कुछ देर वाद संरेन्द्र संमान्य हुआ उने अपनी आपबीती तारा बाबू ूको बताई ताराशंकर गांव के कछ लागों को साथ लेंकर सुरेन्द्र के बताये खेत मे गये पर आस-पास खूब छान बीन की गई पर फिर भी कुछ ना मिला अगले दिन महल के नौकर शिवदीन की सांप के काटने से मौत हो गई उसी रात सुमित्रा के नींद अपने पति की घुटन भरी आवाजो से टूट गई यंमत्राकुद देर तक रूक रूक की आती उन आवाजो ंकेा सुनती रही महेन्द्र जी नींद मे कुछ बड़बड़ाते हुये हाथ पैर पटक रहे थे संमित्रा ने उन्हें जगाया तो उन्हांेने बताया कि नीद मे वह अपने नौकर शिवदीन से लड़ रहे थे जो उनका गला घोंटते हुये जबरदस्ती उन्हें अपने साथ ले जाना चाहता था इसके बाद दिसम्बर 1894 से जनवरी 1897 तक चैधरी परिवार मे कोई अनहोनी घटना नही धटी जिन्दगी सांमाय रूप से चलती रही फिर एक डरावनी घटना घटी यह पूस मास की सद्र्री और कुहससे से भरी चांँदनी रात थी हाड़ कंपाती सर्दी पड़ रही थी रात के आस 10 बजे का समय था सुमित्रा लालटेन लेकर एक कमर से दूसरे कमरे मे जा रही थी तभी लालटेन की टिटिमाती रोशनी मे उसने देखा कि उसके आगे एक छोटी सी सफेद छाया चल रही है। गौर से देखने पर पता चला कि यह एक बच्चे का साया है। अचानक वह ऊपर जाने वाली सीढियों पर चढने लगा और उपरी मंजिल पर जाकर गायब हो गया सुमित्रा यह देख कर थरथर कांपने लगी फिर चीख कर बेहाश हो गई सोरे घर मे कोहराम मच गया इसके दो महीने बाद एक शाम महेन्द्र जी ऊपर की मंजिल पर कुछ काम कर रहे थे ढलती शाम का वक्त था तो उन्होन सफेद कपड़े पहने एक बच्चे का साया देखा जो एक कमरे से निकल कर दूसरे कमरे मे जा रहा था वह इस तरह चल रहा था मानो ंहवा मे उड़ रहा हो उसका पीछा करने पर महेन्द्र जी ने देखा कि कमरे मे फर्श पर पड़ी कालीन के पास जाकर घुटनों के बल इस तरह बेठा था कि जैसे कालीन के नीचे कुछ छुपा हो जिसे वो ढूंढना चाहता हो तभी उनको अपने पीछे से किसी की हलके हलके रोने की आवाज आई उन्होने वहां पलट कर देखा तो वंहा कुछ भी ना था उनके पीछे देखते ही आवाज थम गई अचानक उन्हें बच्चे की आवाज आई उन्हांेने कालीन की ओर मुड़ कर देखा तो वहां ना कोई बच्चा था ना उसकी रूह वह स्तब्ध रह गये एक पल मे बच्चा कहंा चला गया काफी दंेर बाद वो समान्य हुये उन्हेन अपने परिवार का इतिहास खंगालना शुरू किया तां गांव की एक अति वृद्ध महिला नें बताया कि मेरी मां आपके पिता के जमाने मे महल मे काम करती थी वह बताती थी कि आपके पिता की एक बड़ी बहन थी जिसका नाम सन्ध्या था जो आज से 50 साल पहले सात साल की उम्र मे महल की छत से गिर कर मर गई थी उसके दो तीन साल बाद महल मे एक और बच्चे की मौत हुयी थी वो पिता का छोटा भाई था उसका नाम शरद था तीन साल की उम्र मे तेज बुखार से उसकी मौत हो गई थी जब उसे दफनाया गया तो उसने सफेद कपड़े और तावीज पहने हुये थे महेन्द्रनाथ जी ने गांव के पुजारी प. काली श्ंाकर चटर्जी को सारी बता कर उपाय करने को कहा पं जी ने पूरे महल का मुआयना किया फिर कालीन वाले कमरे उन्होने ने नौकर से कालीन हटाने को कहा वहाँ ऐ ताम्बे की पुरानी तवीज मिली जो एक टूटी सी चेन से बंधी थी जिसे प. जी अपने साथ ले गये फिर अगली अमावस्या को उसी कमरे मे देवी का ध्यान लगाया लात मसूर की दाल व कोल तिल के ढेर पर उन्होने तावीज स्थापित कफिर मीठे तेल का एक चैमुखी दिया जलाया तावीज की गुलहड़ के फूलों रोली, चावल, कपूर, शराब से पूजा की उसके दांयी ओर उन्होने 99 नीबुओं का एक बड़ा सा गोला बना कर उसमे महेन्द्र जी को बैठा बांयी ओर हवन कुण्ड बनाया एक पत्तल मे दो नीबू, कुछ सूईयां कीलें, कुछ मछलियां, काला मुर्गा काले कपड़े के दो पुतले रखे फिर उन्होने किसी देंवी का आहवाहन किया फिर दोनों पुतलों की फूल, रोली, चावल सेन्दूर आदि से पूजा की फिर मछलियांे की आहूति अग्निकुण्ड मे डालते हुये हवन किया फिर अंतिम आहूति डाल कर मुर्गे की बलि दी दोनो गुड़ियांे पर नीबू काट कर उनका रस चढाया फिर बारी बारी से मंत्र पढते हुये गुड़ियों दो दो सूईयां चुभोयीं और उन्हें अग्निकुंड मे डाल कर कुण्ड मे शराब डाली दोनो गुड़ियों जल कर भस्म हो गयीं इस तरह दोनो आत्मायें मुक्त हो गई तब से महल मे कोई अशुभ घटना नही घटी आज भी चैगाछा मे खड़े महल के खंडहर इस घटना की मूक गवाही दे रहे हंै।
रहस्य-रोमांच कहानी के स्थान व पात्र पूर्णतः काल्पनिक है।