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मैं रूँआसी-सी हो गई
January 19, 2020 • डा वीरांगना रमन

आज अतीत के किताब के पन्ने पलटने पर न जाने क्यों 20 जुलाई, 1966 का पृष्ठ ठिठक कर रह गया और मैं कल्पनाओं के सागर में डूबती चली गई। तली तक पहुँची तो यादों की मणि-मुक्ताओं में घिरी खड़ी थी।
 मैं और मनु साथ-साथ खेलकर, झगड़कर और रूठकर एक साथ ही तो बड़े हुए थे। मनु सदैव से मुझे काली-कलूटी बैगन की लूटी कहता था। मुझे गुस्सा आता भी था किन्तु मेरा स्वभाव ही ऐसा था कि मन का भाव मुख पर झलकने नहीं देती थी।  ज्यों-ज्यों मैं बड़ी होती गई, गुस्से का स्थान दुःख लेता गया।
 एक दिन मै सहलियों के बीच बैठी थी तो आकर बोला, काली-कलूटी! कुछ पैसे हों तो देना। आज खाने का डिब्बा घर भूल आया। मैं रूँआसी-सी हो गई और एक रूपया उसे दे दिया। स्कूल से लौटते समय मैंने उससे कहा, देख मनु, जब तू काली-कलूटी कहता है तो मुझे बहुत दुःख होता है। यह तो भगवान की देन है, मेरा दोष इसमें कहाँ है? मगर वह कब मानने वाला था, मुझे तो भगवान ने रूप दिया, पैसा दिया, तू तो मेरे पेरों की धोवन है, धोवन है.... इतना कहकर अपनी साईकिल तेज भगाकर ले गया। मैं सारे रास्ते सोचती गई, क्या रूप गुणों को उभरने नहीं देता..... इतना घमंड क्यों करता है मनु?..... मैं अब बात भी नहीं करूँगी।
 समय गुजरता जा रहा जा रहा था! न जाने कब, कैसे और क्यों, मैं स्वयं को उसकी चरण-रज मान पूजा करने लगी थी, पता ही न चल सका। अब तो वह लड़कियों के रूप का बखान भी करने लगा है।  कभी कहता, अपनी उस सहेली से मेरी दोस्ती करा दे,.... कभी इससे! मैंने एक दिन कह ही दिया पागल  हो गया है क्या, जो रोज-रोज बेसिर-पैर की बातें करता है यदि मैं तेरे किसी दोस्त के लिए ऐसा कहूँ तो? जान से मार डालूँगा, अगर जबान पर फिर ऐसी बात लाई तो...... उसने गुस्से में मुझे देखते हुए कहा! न जाने क्यों उसका उत्तर सुनकर मेरा मन खुशी से कांप उठा, किन्तु जब भी वह किसी लड़की की खूबसूरती की बखान करता, तो ईष्र्या से मेरा रोम-रोम जलने लगता था।
 धीरे-धीरे उसने मुझसे मिलना कम कर दिया, लेकिन संकोचवश कभी कुछ पूछ ही नहीं सकी। समय हम दोनों के बीच दूरी बढ़ाता जा रहा था। मैं घंटों चिलचिलाती धूप में उसका इंतजार करती रहती, किन्तु उसे न आना था, न आया।
 चार महीने बाद दिवाली पर आया तो माँ से ही बात करता रहा। इतना जरूर सुना था मैंने सुप्रभा को न जाने क्या हो गया है चाची! मुझसे बोलती ही नहीं। एक तो काली-कलूटी ऊपर से नखरे! अपने आपको क्या समझने लगी है?  मैं चुपचाप सुनती रही और सोचती रही, हे प्रभु! मुझे रूप क्यों नहीं दिया। पीड़ा की तपन अब सही नहीं जाती। क्यों मनु मेरे दिल को बार-बार वेदना से बींध देता है? इतने में ही वह ऊपर मेरे कमरे में आया और कहने लगा, बड़ी एकान्त प्रिय बनी है! इतना नहीं हुआ मैं आया तुझसे मिलने तो तू नीचे आ जाती! मैं जानता हूँ तेरा मन मुझसे बात करने का थोड़े ही होता है। मैं ही हूँ पागल जो चला आया! कसम है मुझे जो अब कभी आऊँ.....! और वह दनदनाता हुआ चला गया। कितना मन हुआ था उसे रोकने का किन्तु न जाने क्यों वाणी ही मौन हो गई थी, गला रूंध-सा गया था। बहुत दिनों तक बेचैन-सी रही! मैं जानती थी, मनु को कसम से कोई लेना-देना नहीं, किन्तु फिर भी मैं उसकी प्रतीक्षा करती रही.....! काश! एक बार आ जाये! आज स्कूल में जैसे ही आमना-सामना हुआ तो बोला, क्यों मेरे सामने पड़ती है? घमंडी कहीं की.... यदि दो कदम चलकर मेरे घर आ जाती तो क्या तेरा सर नीचा हो जाता? अब कभी आना मेरे घर..... यदि आई तो तो मेरा मरे का मुँह देखोगी! मैं नीचे दृष्टि करके सब सुनती रही और वह आगे बढ़ गया।
 बावरी-सी मैं घर आकर अपनी चारपाई पर लेट गई। कभी बाल नोचती, कभी माथा ठोंकती! क्या यह वही मनु है, जिसका इंतजार मैं पल-पल करती हूँ? मैं तो स्वयं स्वयं ही छली जा रही ही हूँ! तुम्हें क्या पता मनु! तुम्हारे बिना कितनी विक्षिप्त-सी हो जाती हूँ! क्यों ऐसे इंसान के लिए तड़प रही हूँ! मेरे अंदर का कोना-कोना मनु तुम्हारे लिए ही तड़पता रहता है। चिंगारी से भरे हाहाकार को दबाने में असमर्थ हो गई हूँ, इसलिए आँखों के भीतर का कोलाहल शांत न रहकर बह चला है! काश इस खारे जल में तुझे बहा दूँ! तुम मत याद आया कम मुझे! यह भी सोचता, मैं एक लड़की हूँ, कैसे आऊँगी तेरे द्वार तक?
 उस दिन के बाद से मनु नहीं मिला। मुझे देखते ही दिशा बदल देता था! रात में जब उसकी गाड़ी का हार्न सुनती तो दौड़कर खिड़की का पर्दा जरा-सा खिसकाकर मनु को देख लेती, किन्तु मैंने कभी भी उसे अपनी खिड़की की तरफ देखते नहीं पाया। दुःख के काले-काले बादल मुझे हमेशा घेरे रहते। भगवान से प्रार्थना करती, मेरे मनु के सभी शूल मेरी राहों में बिछा दो! उसके दिन सदैव प्रसन्नता के महलों में बीतें और रात सुखमय निद्रा की गोद में।
 अंतर में असीम ज्वाला संग प्रीत लिए जलती जा रही है। गहन निराशा में भी आशा का दीप जलाये बैठी हूँ। मेरी यादों के फूल मन में कांटे लिए उग आते है और मेरे हृदय को लहुलुहान कर देते हैं, मेरा दिल खून के आँसू रोने लगता है। मैं इन्हीं आँसुओं को पी-पीकर अपनी वेदनाओं को समेटती रही और एक दिन ऐसा आया जब वेदनायें ज्वार-भाटा बन फूट पड़ी और अपमान का घँूट पीकर मैंने यह संकल्प किया, मेरी खिड़की अब सदैव के लिए बंद हो गई है, लेकिन यह कभी न भुलना कि काली-कलूटी तुम्हारी पद-रज है। यह उपाधि तुम्हारी ही देन है न!
 मैंने अब अपने मन के सभी उद्गार खिड़की के पीछे बंद कर लिए। हार्न सुनने से ही पता चल जाता था कि वह कब आया और कब गया, किन्तु मन की खिड़की बंद न कर सकी। तुमने तो भी कभीपलटकर भी नहीं देखा, तुम्हारे पैरों की धोवन कैसी है। मन में हूक-सी उठती रहती। मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरता जा रहा है। दूर-दूर तक सुख की भोर दिखाई ही नहीं देती। कैसे मन की वयथा तुम्हें सुनाऊँ? हजारों बार कसम तोड़ी है तुमने, क्या एक कसम नहीं तोड़ सकते? कई बार तुम्हारे द्वार पर मेरे कदम ठिठके भी, किन्तु तुमने तो आसानी से कह दिया था, मेरे मरे का मुँह देखोगी, बोलो कैसे लांघ जाऊँ। तुम्हारी चैखट? 
 मैंने सोचा, हो सकता है विद्या ही मेरा काला रंग अपने में छिपा ले और गुणों को उभार दे! इस विचार के लेते ही मैंने अपना जीवन विद्या को अर्पण कर दिया। मैं बनारस में डाक्टरी पढ़ने चली आई आने से पूर्व बहुत तड़पा था मेरा मन, मनु से मिलने को।
 अब तो मैंने पाषण का मन बना लिया है.... न कोई स्पन्दन है, न भाव! मृत्यु तुल्य-सी जी रही हूँ। माँ के बहुत पत्र आते कि छुट्टियों में घर आ जाओ,........ किन्तु मुझे तो मनु ने निर्मोही बनाकर बनारस भेजा था। हमेशा माँ को यही लिखती रही, यहाँ छुट्टियाँ बहुत कम होती हैं। बस पढ़ाई और मरीजों के बीच ही सुबह से शाम हो जाती है। बार-बार मन होता था, माँ से पुंछू कि मनु कैसा है?
 कब आता है? क्या कर रहा है? किन्तु स्वाभिमान, अपमान, सौगंध सभी बीच में आ खड़े होते।
 धीरे-धीरे समय गुजरता गया और साढ़े चार वर्ष बीत गये। इन पलों में कोई भी क्षण ऐसा नहीं था जो मनु मन से दूर रहा हो। मेरे अंतर में उसकी यादों की पंखुरियाँ महकतीं तो नशा-सा चढ़ता जाता और उतरने का नाम ही नहीं लेता था। स्वप्न में कभी मनु मुझसे मिलने नहीं आया। जीवन के इस मरूस्थल में मैं मृग बनी भटकती रही। जग की भी कैसी निराली बातें? जिसने उर का धन रीत दिया, उसी की झोली खाली है। यह कैसा न्याय है? जो राम-रोम में समाया है, उसे अपना नहीं कह सकती। तुमने तो मुझे बादल समझा होगा जो झोंको से बह जाते हैं। मैं तो दृढ़ नग थी1 अपनो भावों को अंतर में पालती रही, बोलो मनु! क्या उर का छाला तुम्हें दिखाया? मेरा तो पल-पल तुम से ही निर्मित  रहा.... तुम्हें ही जीवन अर्पित कर दिया। काश तुम मेरे जीवन में ऐसे तृषित मन का मधुरस से सिंचित कर दो।
 आज मुझे घर जाना है। खुशी है, डाक्टर बन गई हूँ, दुःख है, काली-कलूटी हूँ, विश्वास है, मनु की गाड़ी हार्न सुनुंगी, स्वाभिमान है, मिलने नहीं जाऊँगी, व्याकुल हूँ, शायद वो आयेगा और कहेगा, काली-कलूटी कैसी है तू? हाँ-हाँ... मैं यही सुनने को न जाने कितने वर्षो से तरस रही हूँ! न जाने  कितने प्यार के दीप जला-जलाकर पूजा करती आई हूँ, अब स्वयं दीपक बनकर मनु की पूजा करूँगी। तुम्हारी प्रीति में मालूम नहीं कितने गीत संजोये हैं? अब तो स्वयं स्वर लय बनकर तेरे सुर में बसूँगी, काश! मैं तुम्हारी धड़कन बन प्राणों में रहती श्वास बन तुझमें ही रहती, बहती मुस्कान बन तेरे अधरों पर होती, अश्रु बन संग-संग रोती नयन बन तुम्हारे साथ सोती, स्वप्न बनती तो निद्रा में भी तुम्हारे संग होती! सच में......, तुममें रमता हुआ जीवन चिन्मय हो जाता।
 माँ स्टेशन पर लेने आई है। बरसों बाद माँ को देख रही हूँ, कितनी बूढ़ी नजर आने लगी है। माँ ने प्यार से मुझे देखा और बोली, बहुत दुबली हो गई है। हास्टल का खाना ही बेकार होता होता है। क्या रात-दिन तू पढ़ती ही रहती थी? घर आने तक माँ इधर-उधर की बात करती रही लेकिन मनु का नाम एक बार भी तो नहीं लिया। सभी मुझसे मिलने आये लेकिन जिसके इंतजार में पलके बिछाये बैठी थी, वही नहीं आया। मैं बेसुध-सी होती जा रही थी। मनु एक बार अब तो आ जाओ...... तुम्हारे बिना कैसा जीवन और कैसा सांसारिक बंधन? मैंने तो यह समझा था जब तुमसे दूर चली जाऊँगी तो मेरे मन के सूनेपन में तुम शायद कुछ काम आओगे, किन्तु उल्टा ही हो गया, जितना तन से दूर तुम हुए उतने ही मन के और निकट आ गये।
 समय बीतता गया.... धीरे-धीरे न जाने कैसे स्वाभिमान भी बढ़ता गया। किसी के मुँह से नाम तक नहीं सुना। गाड़ी का हार्न भी कभी नहीं बजा! मैंने बंद खिड़की खोल दी! पता नहीं मनु ने देखा भी नहीं! घंटों उसके घर की तरफ देखती रही शायद वह पुकारे...... किन्तु न ही उसने मुझे पुकारा और न ही मैं जा सकी।
 तीन महीने बीत गये मुझे यहाँ आये हुए। अचानक अस्पताल से लौटते समय मनु के घर से कराहने की आवाज सुनाई पड़ी। सारा अभिमान, स्वाभिमान भूलकर उसके दरवाजे पर आ खड़ी हुई! मनु के कमरे के बाहर खड़ी होकर विचार कर ही रही थी कि खाँसने की तेज आवाज ने मुझे झकझोर कर रख दिया। अंदर जाकर देखा कि सड़ी-गली खाल और बदबू के ढेर पर बैठा हुआ निष्प्राण-सा कंकाल सदृश मानव..... सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न कर रहा है। अरे.... यह ..... तो मनु है..... मेरा मनु.....मेरा अपना मनु! सभी भावों को करूणार्द्र दिल में छिपाये मैंने उसे पानी का गिलास दिया तो उसने दयनीय दृष्टि से मुझे देखा और रूंधे कंठ से बोला, डाक्टर साहब मेरे पास न आना! मैं कोढ़ और तपेदिक दोनों रोगों से पीड़ित  हूँ।व वर्षो संजोया हुआ सावन का धन जो नयनों में सिमटा पड़ा था अविरल गति से बह चला! क्यों हुआ? कैसे हुआ मनु को इतना कष्ट!  डाक्टर साहब कहना, मेरे मन-प्राण को भी भेद गया। कब कुम्हला गया मनु, मैं जान ही नहीं पाई। कितनी आँधी उठी होगी जीवन में इसके, कहाँ से काले घन आ गये, दुःखमय तिमिर कैसे छा गए! मैंने सहारा देकर उसे बिस्तर पर लिटाया। अभी आई कहकर मैं अपने घर चली गई।
 मेरा मन-सागर ढलक पड़ा! मैं रो रही थी..... मेरा साथ दे रहा था मेरा कमरा..... कोना-कोना सिसक रहा था। आज मनु को देखते ही क्रंदन कितना पीड़मय हो उठा। सोचती जा रही हूँ और दवा बैग में रखती जा रही हूँ। मेरे आँसू मनु की आँखें भी छलका दे कहीं..... बस यही सोचकर मुँह धोया, कृत्रिम प्रसन्नता मुँह पर स्ािापित किए, मनु के घर फिर पहुँच गई हूँ! उसके घाव धोये, चादर बदली, दवा दी! अस्त-व्यस्त घर को कायदे से सजाया, और बोली, मनु तुमने कभी पत्र में  लिखकर भी नहीं भेजा कि तुम बीमार हो! तीन महीने मुझे यहाँ आये हुए हो गए, किसी से कहलवाया भी नहीं! बहुत सताया है तुमने मुझे मनु!.... बहुत।
 वह अपलक मुझे देखता रहा और बोला, मुझे तो अपने भी सब छोड़कर चले गए..... फिर तुम तो अपनी भी नहीं थी, तुम्ही बोलो कौन होती थीं मेरी जो तुमसे कहता! उसके कठोर वचन मेरी आत्मा भी हिला गए। मैं मन ही मन बोली, मनु तुम तो हमेशा से मुझसे दूर रहे हो, लेकिन मैं तो सदैव से तुम्हारे पास हूँ, मेरी तो सारी सांसों पर तुम्हारा ही अधिकार रहा है। यदि तुम दो नयनों की सच्चाई से मेरा मन दर्पण देखते तो स्वयं की ही झलक देखते। तुम ही मेरी मंजिल थे, मैं तो ओस थी, तुम तो स्वाति थे, मैं तो सीप थी! मुझे मौन देखकर बोला, दो दिन से भूखा हूँ डाक्टर साहब, अब इतनी हिम्मत नहीं कि उठकर कुछ खा सकूँ। मैंने चाय, डबल रोटी खिलाई, उसे खाता हुआ देखकर बहुत प्रसन्न हो रही थी।
 छः महीने के उपचार से मनु अब काफी ठीक हो चुका था। मैंने भी रात-दिन एक करके अपने मनु को मृत्यु से खींच लिया था। आज वर्षा के झिर-झिर निनाद से मन की वीणा गूँज रही थी। जब तरंगे तन से टकरा-टकराकर मन मधुवन को सींच रही थीं कि अचानक मनु बोला, वर्षो पहले तुमसे कुछ कहना चाहा था किन्तु कभी कुछ कह ही नहीं सका। आज अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। मैने कहा, कहो न मनु क्या बात है।  वह थोड़ी देर तक मुझे देखता रहा और बोला, क्या बात है? वह थोड़ी देर तक मुझे देखता रहा और फिर बोला, क्या तुम विश्वास कर सकती हो मुझ पर कि मैंने जीवन में बस तुम्हें ही..... हाँ-हाँ सिर्फ तुम्हें ही चाहा होगा? मैंने कहा, झूठ! एकदम झूठ! ऐसा हो ही नहीं सकता।
मेरा सारा स्वाभिमान टूट-टूटकर बिखर गया और मैं फफक-फफक कर रो पड़ी। मनु भी रो रहा था! मुझे ऐसा लगा था शायद तुम मेरे साथ चलते-चलते थक गई हो! समझ नहीं पाता, मैं क्या हूँ, कौन हूँ? ऐसी जगह खो जाने का मन होता था जहाँ तुम्हें भूल सकूं या जलकर धुआँ हो जाऊँ।
 मेरे मन की व्यथा मत बढ़ाओ मनु, मुझमें अब असत्य सुना नहीं जा रहा है, मैंने कहा! वह धीरे से उठा और अपनी अलमारी से सात वर्षो की पुरानी डायरी निकलकर मेरी गोद में डाल दी और बोला, पढ़ो सत्य का प्रमाण मिल जायेगा। मैंने देखा तो अवाक् देखती रह गई। प्रत्येक पृष्ठ पर काला-कलूटी बैगन लूटी लिखा था। मेरे नयनों से मोती झर-झर कर डायरी  देखते रहे। कहने लगा क्या तुम समझती हो कि वर्षो तक तुमने खिड़की का पर्दा सरकाकर मुझे देखा....... मैं जानता नहीं? तुम ही नहीं जान पाई कि मैं दूर से हार्न बजाता था और तुम्हारी खिड़की को देखता रहता था! मैं तुमसे मिलने नहीं आया, या तुम्हें देखकर कट जाता था, अथवा लड़कियों के बीच घिरा रहा...... कभी भी तुमने अधिकार समझकर टोका?.... तुम बनारस गई...... मैं चुपचाप स्टेशन तक ढिप-छिपकर तुम्हें गाड़ी में बैठे दूर तक जाते देखता रहा। मुझे विश्वास था तुम बनारस जाने से पूर्व एक बार तो जरूर मिलने आओगी, किन्तु न कुछ दूर तुम चल सकी, न ही कुछ दूर मैं आ सका! मैं विस्मय-सी सुनती जा रही थी।
 वह पुनः बोला, मैंने सोचा था काश! मैं ऐसे रोग से ग्रसित हो जाऊँ जो कभी ठीक न हो सके और जब मरूँ तो तुम्हें डायरी सौंपकर मरूँ.... न तुम ही झुकी, न हम झुके। 
 मैं तुम्हारा स्वाभिमान नहीं तोड़ना चाहता था। मैंने कोढ़ी अस्पताल में सारी सम्पत्ति दान दे दी और उनकी सेवा करते-करते स्वयं उसी रंग में रंग गया। सभी मुझसे नफरत करने लगे। बस एक मैं था जो स्वयं से और अधिक प्यार करने लगा था..... क्योंकि मैं तुम्हारे करीब होता जा रहा था।
 आज दस जुलाई है, तुम्हारे सामने झुककर तुमसे काली-कलूटी बैगन लूटी का अधिकार चाहता हूँ! मैंने अपने प्रिय के मुख से यह सुनकर श्रद्धा से पद-रज लेकर अपनी सुनी माँग सजा ला! आज भी मेरी माँग ऊषा की सुर्खी से कहीं अधिक सुर्ख है। - संकलित