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मत चूके चैहान
November 8, 2019 • श्रीमती अनीता परिहार

सम्राट पृथ्वीराज चैहान का जंम आनंद विक्रम संवत 1115 वैषाख मास कृश्ण द्वितीया को सूर्योदय के पूर्व (सन् 1149) अपने नाना दिल्ली नरेष अनंगपाल तोमर के घर दिल्ली में माता कर्पूरी देवी के गर्भ से हुआ था, उनके पिता सोमेष्वर चैहान अजमेर के राजा थे। जो निम्न दोहो से पता चलता है।
संवत इक्कदस पचंाग, वैषाख मास पख कृश्ण लग्ग।
उशा प्रकाष इक धरिय रात्रि, पलतीस बाल जाति।। 
आनंद संवत का प्रयोग पृथ्वीराज रासों में अनेक जगहों पर हुआ है। जो ईसवी संवत से 34 वर्श पूर्व प्रारंभ हुआ था आनंद विक्रम संवत मे 34 वर्श जोड़ने से ईसवी सन् प्राप्त होता है। पृथ्वीराज विजय के अनुसार पृथ्वीराज का जंम संवत् 1120 ज्येश्ठ बदी द्वितीया को हुआ था वे अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1177 मे अजमेर के राजा बने थे। दिल्ली नरेष अनंगपाल तोमर ने सन् 1172 मार्गषीर्श षुक्ल पंचमी, गुरूवार को दिल्ली की राजगद्दी पर उनका राज्याभिशेक करके स्वयं सन्यास ले लिया था। सन् 1178 मे गौर के षासक मुहम्मद षहाबुददीन गौरी ने सिंध, मुल्तान, लुद्रवा (जैसलमेर) और गुजरात पर हमलों के दौरान चैहान राज्य के गांव फलौदी गांव को बुरी तरह लूटा था जिससे दोनों राज्यों में षत्रुता की नींव पड़ गई थी। गौरी द्वारा मुल्तान, सिंध, लाहौर, की विजय के बाद चैहान और गौरी राज्यों की सीमायें परस्पर मिल गयी थी, सतलज नदी के पूर्व में चैहान राज्य और पष्च्छिम मे गौरी का राज्य था, इनकी सीमा पर भटनेर वर्तमान जिले हनुमानगढ़ का दुर्ग था तुर्क और अफगानी इसे तबरहिन्द कहते थे तुर्की भाशा मे तबरहिन्द का अर्थ हिन्द का दरवाजा होता है। तबाकाते नासिरी के अनुसार सन् 1190 के अंत मे गौरी ने चैहान साम्राज्य के सरहदी दुर्ग तबरहिन्द (भटनेर) पर कब्जा कर लिया और 12,00 सौ फौज के साथ काजी जियाउद्दीन तोलकी या बहाउद्दीन टोंकी को किलेदार बना कर खुद गजनी लौट गया कुछ इतिहासकारों ने इसे भटिण्डा या सरहिन्द माना है, लेकिन भारत पर सारे विदेषी हमले मुल्तान, मारोठ, भटनेर, सिरसा, हांसी मार्ग से ही हुये है। महमूद गजनबी, तैमूर ने भी इसी मार्ग से ही देष पर हमला किया था, गौरी ने भी 1178 में इसी मार्ग से लुद्रवा (जैसलमेर) और गुजरात पर हमला किया था यह प्रसिद्ध व्यापारिक मार्ग था और धने जंगलों, झीलों, नदियों और पानी की प्रचुरता से युक्त था। बिना इस मार्ग के दिल्ली पहुँचना असंभव था पृथ्वीराज ने भी इसी मार्ग से भटनेर और पंजाब को जीता था और तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद गौरी इसी मार्ग से सिरसा, हांसी होते हुये ही अजमेर आया था भटिण्डा या सरहिन्द तो इस मार्ग पर पड़ते ही नही हैं। भटनेर पर हमले की सूचना पाकर पृथ्वीराज ने दुर्ग पर घेरा डाल दिया और 13 महीने के घेरे के बाद सन् 1191 मे पुनः किला जीत लिया यह खबर जब गौरी तक पहुँची तो वह 1191 में भटनेर आया सन् 1191 वैषाख सुदी दषमी रविवार 12 मई 1191 के दिन भटनेर से 35 किमी. पूरब में तलबाड़ा झील के पास घग्गर नदी के उत्तर मे दांये तट तराइन वर्तमान मे नडाना गांव (तराइन) के पास दोनों सेनायें टकराई। राजपूत सेना के दांये बांये बाजू पर घुड़सवार फौजे और बीच मे मजबूत गजसेना खड़ी थी। अष्वारोहियों के पीछे तीन भागों मे तलवारों और भालों से लैस पैदल सेना थी और बीच मे रायपिथौरा अपने हाथी प्रिय उदयराज पर सवार थे गोविन्दराय भी हाथी पर था कैमास, जैत परमार, और निहूर थे आप्ताताई और बलभद्र दांये भाग पर थे पुण्ड पुंडीर, हरावल पर मोहन सिंह परिहार, चंदेल, चामुण्डराय साथ थे । मध्य भाग पर स्वयं कान्ह राजपूत सेना देखकर गौरी के हौसले पस्त हो गये उसने भी तीन कतारों मे अपनी फौज सजाई दोनों ओर की घुड़सवार सेनाओं वेग से आगे बढीं। पृथ्वीराज की पृश्ठ भाग की घुड़सवार सेना ने घूमकर गौरी की सेना के दोनों बाजुओं पर एक साथ हमला किया गौरी की फौज हमला झेल नही पाई और अपनी फौज के मध्य भाग की ओर मुड़ गई इस तरह गौरी दोनों बाजुओं की सेना आपस मे गुत्थम-गुत्था हो गई गौरी सेना के घोड़े हाथियों को देखकर भड़क गये राजपूतों के सामने व पीछे से हमले का वेग बढ़ाकर गौरी के व्यूह को ध्वस्त कर दिया भारी संख्या में तुर्क सैनिक मारे गयेे और बड़े-बड़े अमीर, खल्जी व अफगानी मैदान से भाग लिये पृथ्वीराज ने जैत परमार को भागती फौज को पीछा करके खत्म करने का आदेष दिया यह देखकर गौरी हक्का बक्का रह गया अब गौरी ने बची फौज के साथ खुद चैहान सेना पर हमला किया गौरी ने आगे बढ़कर चामुण्डराय के हाथी पर घोड़ा कुदाया हाथी के माथे पर घोड़े पर पैर रख कर भाला मारा जिससे उसके दान्त टूट गये चामुण्डराय ने भी गौरी पर सांग (भाला) फेंकी जो गौरी के दांयी बांह के आर-पार हो गई वह घोड़े से गिर पड़ा और चंडपुंडीर ने उसे कैदकर लिया। इस युद्ध में गौरी की सेना के 10 सिपहसालार और 18,000 सैनिक मारे गये चैहान सेना के कान्ह के पुत्र भारवाह, लोहाना का पुत्र  जरूधवल, भाई केसरी सिंह, भीम सिंह बघेला, मदन सिंह, वीरगति को प्राप्त हुये परम्परानुसार गौरी का डेरा लूट लिया गया और घायलों को मौत के घाट उतार दिया गौरी को एक महीने कैद मे रखकर महारानी कर्पूरी के कहने पर छोड़ दिया गया तराइन की पराजय से गौरी को बड़ा सदमा लगा उसने अपने भगोड़े सेनानायकों को सरेआम अपमानित करवाया वह एकदम फकीरी जीवन बिताने लगा उसने युद्ध की भारी तैयारियाँ की, और 1 लाख 20 हजार की प्रषिक्षित फौज तैयार की कई सामंत भी अपनी फौज भी अपनी फौज लेकर आ गये काजी जियाउद्दीन भी 12,00 घुड़सवार लेकर आ गया   इधर पृथ्वीराज के षत्रु जम्मू के राजा विजयपाल या विजयदेव ने जिसके राज्य को पृथ्वीराज ने खूब लूटा था खबर भिजवाई कि पृथ्वीराज पर हमले मे वह गौरी की पूरी मदद करेगा गौरी जब गौरी लाहौर पहुँचा तो जम्मू नरेष का पुत्र नरसिंहदेव अपनी 30,000 फौज समेत गौरी से आ मिला, लाहौर से गौरी ने कवामुल्कमुल्क रूहुददीन हम्जा को दूत बना कर अजमेर भेजा कि वह पृथ्वीराज कानों मे गुलामी के छल्ले पहनकर गौरी के दरबार मे हाजिरी दे व इस्लाम स्वीकार कर ले। दूत अपमानित करके लौटा दिया गया जैसलमेर का हेमहेल भाटी भी गौरी सेना का अंग था इधर दुर्भाग्य से अनंद संवत 1156 चैत्र बदी सप्तमी (सन 1191) को पृथ्वीराज ने अपने षत्रु राजा कन्नौज सम्राट जयचन्द्र गाहलवाड़ की दत्तक पुत्री संयोगिता का अपहरण कर उसे अपनी रानी बना लिया था हरण हेतु अपने 1100 सैनिको और 106 सामंतों के साथ कन्नौज पहुँचा और और संयोगिता हरण के बाद कन्नौज की विषाल सेना के साथ हुये तीन दिन के निरर्थक युद्ध मे चैहान सेना के सर्वोत्तम सेनापति सेनापति मारे गये। जिनमे लोहाना अजानबाहू, गोयंददास गलाहौत, पंज्जवनराय कछवाहा, उसका भाई पाल्हन राय, मलय सिंह, नरसिंह राय, नागौर का चंड पुण्डीर, सारंगराय सोलंकी, संखलासुर, योगिनराय, अताताई, हाड़ा हम्मीर, पहाड़राव तंवर, हरि सिंह तंवर, कनकराय बड़गूजर, निठुरराय राठौर, उचलैस चैहान, बीझराय सोलंकी, सलखराय मारे गये। विवाह के बाद पृथ्वीराज राजकाज छोड़कर भोग-विलास मे लग गया सेना मे नई भर्ती, उसका पुर्नगठन और प्रषिक्षण का कोई कार्य नही किया गया इसी बीच कर्नाटकी वेष्या के तुच्छ से कारण से पृथ्वीराज ने वीर सेनापति कैमास को मरवा दिया तथा चुगलखोर मंत्रियों की बातों में आकर काका कान्ह को जेल मे डाल दिया महल मे कई बार गौरी के हमले की सूचना भिजवाई गई लेकिन विलास में डूबी संयोगिता और पृथ्वीराज ने उन्हें सुनने से इंकार कर दिया जब पृथ्वीराज को भीशण हमले का ज्ञान हुआ तब तक षत्रु सर पर आ चुका था गौरी के सहायक हिन्दू राजाओं ने सीमा पर विद्रोह कर दिया जिससे चैहान सेना बिखर जाये, ऐसा ही हुआ विद्रोह दबाने के लिये एक प्रमुख सेनापति स्कंध जैसलमेर गया था, एक अन्य सेनापति उदयराज भी एक विद्रोह दबाने गया था हमले की  भीशणता को समझते हुआ पृथ्वीराज के कुछ सेनानायक भी गौरी से मिल गये गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव सोलंकी ने पुरानी दुष्मनी भूल कर देषहित मे पूरी मदद की पेषकष की लेकिन अति आत्मविष्वास के कारण पृथ्वीराज ने जवाब भिजवाया कि आपको आने की आवयकता नही गौरी के लिये मैं अकेला ही काफी हूँ षीघ्र ही सेना एकत्रित हुयी कान्ह को कैद से मुक्त करके पुनः सेनापति बनाया गया पृथ्वीराज अजमेर से 70 हजार की सेना लेकर दिल्ली पहुँचा वहाँ के सेनापति गोविंदराय और उसकी सेना लेकर तबरहिन्द पहुँचा जहां पुनः तलवाड़ा झील के पास अपना पड़ाव डाला राजपूत सेना मे 30,000 घोड़े व षेश हाथी व पैदल थे हिन्दुओं ने गौरी को पत्र भेजा कि अगर वह लौट जाय तो हम हमला नही करेंगें गौरी ने जवाब दिया कि मैं अपने बड़े भाई का मातहत हूँ। उनकी आज्ञा से आया हूँ। मैं उनसे इस बारे मे आदेष मांगूगा तब 28 फरवरी, 1192 को चार बजे जब राजपूत सो रहे थे तो उसने अपनी छावनी मे कुछ सेना व हाथी रख कर आग लगवाई जिससे हिन्दू गफलत मे रहे कि गौरी की सेना आराम कर रही है। आधी रात के बाद वह अपनी सेना को राजपूत सेना के पीछे ले गया और उसने 10 हजार तीरअंदाजों  की चार टुकड़ियाँ बनाई और उन्हें चारों दिषा से इस आदेष के साथ हमला करने को भेज दिया कि वे राजपूतों से सीघा युद्ध नही करें बल्कि  कुछ दूर से बारी-बारी से तीरों का हमला करके उन्हें खूब परेषान करें जब राजपूत सेना लड़ने आयें तो भाग लें चैहान सेना आराम कर रही थी इस अचानक हुये हमले से उनमे भारी भगदड़ और भारी अव्यवस्था पैदा हो गई भारी संख्या मे राजपूत मारे गये यह स्थिति कमोवेष दोपहर तक बनी रही फाल्गुन षुक्ल पूर्णिमा होली के दिन 1 मार्च 1192 को किसी तरह पृथ्वीराज ने अपनी सेना के मोर्चे बांधे सेना के बांये भाग मे भुवनैकमल्लू या भोला,कान्ह, चामुण्डराय दाहिमा, जैत्र परमार, ग्वालियर का पज्ज्ूवनराय, दांयी कमान का नेतृत्व पद्माषा रावल कर रहे थे उनके साथ दिल्ली का तेजपाल तंवर था केन्दीय भाग मे पृथ्वीराज हाथी पर सवार था हरावल मे हस्ति सेना के साथ गोविंदराय था गोरी ने भी अपनी सेना सजाई केन्द्रीय भाग मे कुतुबददीन एबक के सचल दस्ते के साथ गौरी खुद था दांयी कमान पर इलाही व ताजुदद्ीन यल्दूज व कष्मीर का युवराज नरसिंहदेव था तथा बांये दस्तक पर मुकल्बा व मुहम्मद बिन महमूद था हरावल मे तीरंदाज सेना के साथ खरबक व नसिरूदद्ीन कुबाचा था पीछे 12,000 रिजर्व घुड़सवार सेना के साथ खरमेल था गोरी ने अपनी चार भागों मे बांटी सेना को आदेष दे रखा था कि वे वे राजपूतों के साथ सीधा युद्ध ना करे जब राजपूत हमला करें तो दूर भाग जायें जब राजपूत दस्ते अपनी सेना से दूर निकल आयें तो उन्हें कई और से घेर कर मार डाले गौरी इसी नीति से युद्ध करता रहा दोपहर मे चामुंडराय या गोविंदराय ने  अपनी हस्ति सेना के साथ गौरी के हरावल पर हमला किया खरमेल ने अपने मुँह पर ढाल रख कर अपनी रक्षा की और अपने तीरंदाजों को आदेष दिया वे केवल हाथियों और महावतों को निषाना बनाये जैसे ही तीन चार हाथी ओर महावत घायल हुये हाथियों की कतारें बिखर गयीं पीछे से खरबाक ने खूब नगाड़े बजवाये हाथी अपनी ही सेना का विनाष करने लगे जिससे राजपूत सेना बिखर गई अन्य हाथियों के साथ पृथ्वीराज का अपना हाथी भी घायल होकर इधर-उधर भागने लगा चैहान सेना का दांया भाग जिसमे हरिराज और दिल्ली के तेजपाल तंवर थे युद्ध मैदान से अपनी सेना सहित भाग लिये, इसी समय गौरी ने अपनी दांयी, बांयी सेना और 12,000 रिर्जव धुड़सवार सेना व अपनी केन्द्रीय सेना के साथ राजपूतों पर तीन ओर से हमला किया राजपूत सेना के पैर उखड़ गये बड़े-बड़े वीर सामंत चन्डपुंडीर आदि मारे गये चामुंडराय या गोविदंराय घायल होकर हाथी से उतरा नरसिंह देव ने उसका सर काटकर गौरी के पास भिजवा दिया उसके टूटे दांतों से उसकी पहचान हुयी पृथ्वीराज ने हाथी से उतर कर अपना घोड़े मंगवाया कुछ गद्दार साथियों ने उन्हे उनका घोड़ा ना देकर नृत्य प्रदर्षन करने वाला घोड़ा दे दिया और पूर्व योजना के अनुसार खूब बाजे बजवाये गौरी सेना के नगाड़े पहले से ही बज रहे थे घोड़ा बाजे सुन कर नृत्य करने लगा पृथ्वीराज सारा माजरा समझ गये वे युद्ध संचालन भूल कर पैदल ही युद्ध करने लगे और षत्रुओ से घिर गये उन्हें बचाने नाहरराव परिहार आया वह भी मारा गया दिन के तीसरे पहर कुछ सेना को युद्ध जारी करने का आदेष देकर पृथ्वीराज अपनी टुकड़ी सहित 161 किमी. दूर सिरसा भाग लिया जो तलवाड़ा से एक 30 से 36 घंटे की दूरी पर था गौरी को पता चलते ही  उसने पृथ्वीराज का पीछा किया और तीसरे दिन 3 मार्च पृथ्वीराज को कैद कर लिया इधर पृथ्वीराज के सेनापति उदयराज ने जब रायपिथौरा की पराजय के बारे मे सुना तो उसने अपना माथा पीट लिया उसने तेजपाल तंवर व पृथ्वीराज के पुत्र रैणसी (हरिराज) के साथ 3 मार्च को रायपिथौरा के सहकुंवर वीसलपाल के पुत्र दिवाकर को कैदकर दिल्ली घेर ली गौरी सरसुती, सामन, कोहराम, हांसी राज्यों को जीतते हुये 5 मार्च को अजमेर आया जहां उसका किले की सरंक्षित सेना से घोर युद्ध हुआ चैहान सेना हार गयी पहले गोरी ने पृथ्वीराज को मुक्त कर उसे अपना  अधीनस्थ राजा बनाने को फैसला किया किन्तु पृथ्वीराज के एक गद्दार मंत्री प्रतापसिंह पुश्पकरण ने गौरी को सूचना भिजवाई कि पृथ्वीराज इस्लाम का घोर षत्रु है अतः गौरी ने पृथ्वीराज को 11-12 मार्च को अंधा करवा दिया 13 मार्च को उसके छोटे पुत्र गोविंदराज को अजमेर का राजा बना दिया फिर गौरी दिल्ली आया जहां 17 मार्च को उसका पृथ्वीराज के बड़े पुत्र रैणसी,उदयराज व तेजपाल तंवर से युद्ध हुआ रैणसी व उदयराज मारे गये और तेजपाल ने गौरी की आधीनता स्वीकार कर ली फिर गौरी ने अलवर के पास संभल और कोहराम के किलों पर हमला किया जहां कान्ह का दामाद मारा गया गौरी ऐबक को दिल्ली का सूबेदार बना पृथ्वीराज को लेकर गजनी लौट गया बाद मे उसका वध करवा दिया मध्य प्रदेष के आजौरगढ के परिहार राजा खुख्खर के वंषज एक खोखर राजपूत ने 14 मार्च को गौरी को कटार मार दी जिसके घावों के कारण 15 मार्च 1206 की 57 वर्श की उम्र मे गौरी की मृत्यु हो गई। नागौर के पृथ्वीराज के सामंत चंडपुडीर के वंषज और दस्यु सुंदरी फूलन देवी का हत्यारोपी मैनपुरी के श्री षेर सिंह राणा पुण्डीर 17 फरवरी 2004 को पृथ्वीराज की अस्थियां लाने हेतु तिहाड़ जेल से भाग गये अक्टूबर 2004 मे वह अफगानिस्तान गये और 8 दिसम्बर 2004 की रात अपने ड्रग्स स्मगलर दोस्त डेविड के साथ गजनी से 8 किमी. दूर दीक गाँव मे गौरी के मकबरे के बाहर बनी पृथ्वीराज की कब्र खोदकर अस्थियाँ और मट्टी लाये जिसे उन्होने मैनपुरी की राजपूत सभा को कोरियर द्वारा भेजा अस्थियाँ गंगा मे विसर्जित की गई मट्टी पर मैनपुरी कानपुर रोड पर पृथ्वीराज का भव्य स्मारक बनाया गया। पृथ्वीराज पराजित हुये पर उनके वीरता या षब्दभेदी वाण विघा नहीं। उनकी वीरता व सम्मान आज तक जीवित है। पृथ्वीराज रासों मे ठीक ही लिखा है।