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मीठे पानी का कुआं
November 10, 2019 • जे. पी. शर्मा

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के बछरावां कस्बे में एक ठाकुर बाहुल्य गांव पड़ीरा कलां है। सन 1941-42 में ठा. रामशंकर सिंह वहां के सरपंच थे। जिनकी बहन का विवाह उस गांव से 6-7 किमी दूर कपूरपुर गांव में हुआ था जहाँ प. बेनी माघव शुक्ला नाम के विख्यात पंडित हुआ करते थे। पड़ीरा कलां गांव ऊचे पहाड़नुमा टीले पर बसा हुआ था जिसके चारों ओर केवल खारा पानी ही पाया जाता था। ठाकुर साहब एक मीठे पानी का कुआ खुदवाना चाहता थे। उन्होंने इस संबध पंडित जी से सम्पर्क किया पंडित जी ने गणना करके  बताया कि एक दिशा में खुदवाओं तो पहले एक मेंढक मिलेगा। उसके कुछ नीचे एक कछुआ मिलेगा। उसके कुछ हाथ नीचे पानी मिलेगा। ठाकुर ने ऐसा ही किया किन्तु पानी नही मिला उन्होंने पंण्ड़ित जी से पुनः सम्पर्क किया तो उन्होंने ने कहा कि मुझे खुद चलना पड़ेगा। पंडित जी उंट गाड़ी से गांव आये उन्होंने कुआं देखकर कहा कि कुआं नीचे से संकरा हो गया है। उसे उसे पटवा कर उसके बगल में खुदाई करवाई 10-12 फावड़े मारने के बाद मीठे पानी का कुआं मिला जो आज तक बना हुआ है। 1972-73 में पंडित जी के पुत्र राजा राम शुक्ला की पुत्री का विवाह हुआ था, विवाह के कुछ ही दिन बाद पंडित जी का देहान्त हो गया था। 
 मूल में पैदा हुआ अभागा लड़का 1970 के गरमी के दिनों की बात है। रायबरेली के बछरावां कस्बे में देवीपुर गांव में एक पंडित छेदीलाल रहा करते थे जो रायबरेली की सुदौली रियासत राज ज्योतिषी थे। एक रात पंडित जी के बगल में निवास करने वाले जमींदार तिवारी जी के घर के थाली बजी तो पंडित ने पत्नी से कहा कि लगता है कि तिवारी के पुत्र पैदा हुआ है। फिर पंडित जी ने पत्रा निकालकर गणना करके कहा कि लड़का कठिन गडान्त मूल में पैदा हुआ है। यह बालक अकाल मौत मरेगा। उसके पैदा होते ही तिवारी जी के घर में दुर्भाग्य के बादल छा जायेंगें। पूरा घर-बार बिक जायेगा जो पंडित विचारेगा। वह भी मर जायेगा उन्होने पंडिताइन से कहा कि आज रात ही लोटा डोर घर के बाहर रख दो कल सुबह ही मैं गांव छोड़ कर चला जाउगा। ना विचारने के डर से पंडित अगले दिन सूरज निकलने के पूर्व चार बजे ही गांव के बाहर निकल गये। दूसरे दिन तिवारी जी के परिजन जब पंडित से बालक के जंम का विचार करवाने के लिये आये तो पंडिताइन ने उन्हें बताया कि पंडित जी तो कल शाम ही गांव छोड़ कर चले गये। अतः उस बालक का भाग्य गांव के ही एक वृद्ध प. प्रागदास ने भाग्य विचारा। विचारने के कुछ दिन  बाद प. प्रागदास का निधन हो गया। जब लड़का बालक ही था तो उसके पिता का निधन होे गया। जब बालक जवान हुआ तो अपनी पत्नी को छोड़ कर तिवारी जी ने पत्नी छोड कर वैष्या से प्रेम किया और उसके चक्कर में अपनी सारी की जायदाद बेच डाली और फिर वैश्याओं चक्कर में उसकी हत्या हो गई्र पूरा वंश नष्ट हो जायेगा। 
 लखीमपुर का त्रिकालदर्शी ज्योतिषी बात सन 1993 के फरवरी माह के अंतिम सप्ताह के दोपहर की है। मैं अपने व्यापारिक संस्थान पर बैठा हुआ था। कि एक लगभग करीब 65 साल के वृद्ध सज्जन चमड़े का बैग लिये मेरे संस्थान में आये और बगल में मेरे ज्योतिष कार्यालय के साइन बोर्ड के बारे में मुझसे ही पूछने लगे कि यह वह वास्तव मे कुछ ज्ञानी ज्योतिषी हैं कि केवल बेकार में ही साइन बोर्ड में बड़ी बड़ी बातें लिखें हुये हैं। वो मुझे पहचानते नही थे और मैं रोज दिन में बारह बजे अपना ज्योतिष कार्यालय बंद करके अपने व्यापारिक संस्थान में बैठता था पहले अपने बारे में तिरस्कार भरी बातें सुनकर मुझे कुछ गुस्सा आया किन्तु मैंने क्रोध ना करके उन्हें सादर पूर्वक संस्थान में बैठाया उनसे इधर-उधर की बातें करते उन्हें चाय पेष की और उनका परिचय प्राप्त किया तो उनकी विद्वता जान कर मेरे होष ही उड़ गये उनका नाम चन्दजीत सिंह था और वे 35-40 पुराने वैघ थे और वे द्वितीय विश्व युद्ध में सूबेदार नायक थे और युद्ध के संबध में अफगान, इैरान और जर्मनी तक गये थे साथ ही वे छह भाशाओं के विद्वान थे। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, अरबी और फारसी। उन्होंने अपनी डायरी में संस्कृत अपनी हैण्ड राइटिंग में लिखी उर्दू, अरबी, अंग्रेजी, फारसी में लिखे हुये विवरण दिखाये और संस्कृत में लिखे आयुर्वेदिक नुस्खे दिखाये।
 इसके बाद उन्होंने अपने युवाकाल में उनके निकट गाँव में रहने वाले एक अति विद्वान ज्योतिषी के बारे में बताया जिस पंडित जी के बारे में अपनी नादानी, कम उम्र और अनुभवहीनता के कारण उन ज्योतिष का नाम, उनकी उस समय आयु, घटनाओं के वर्ष, महीने आदि के विवरण नही पूँछ सका जिसका आज मुझे अफसोस हो रहा है। लेकिन उनसे मिली अमूल्य जानकारी मैं पाठकों के समक्ष रख रहा हूँ। अन्यथा यह विलक्षण घटना व ज्ञान विलुप्त हो जायेगी। बात मुल्क की आजादी के पूर्व की है। चन्दजीत के बचपन में करीब 1930 के आस पास लखीमपुर के देहात क्षेत्र में एक वृद्ध और विद्वान ज्योतिषी और पंडित जी रहा करते थे। एक दिन उनके पास गाँव का एक निवासी आया। और रात में उसे आये अपने सपने के फल के बारे मे पूछा लगा पंडित जी ने पत्रा खोलकर कुछ विचारा और बताया कि कल रात सपने में तुमने कुछ चमकती हुयी चीज देखी है। और वह सोना है। जो तुम्हारे खेत में लगे नीम के पेड़ के नीचे दबा है। जिसके बारे में तुम पूछना चाहते हो किन्तु वह तुम्हे नही मिलेगा वह तुम्हारी किस्मत में नही है। वह तुम्हारे बेटे की किस्मत मे है। उसे ही मिलेगा किन्तु किसान ने पंडित जी की बात अनसुनी करके काफी खजाना खोजा किन्तु उसे नही मिला वह पंडित जी बात झूठी समझ का निराश हो गया इसके करीब पाँच साल बाद जब उसका बेटा एक दिन खेत मे कुछ खुदाई कर रहा था तो अचानक उसे एक अशर्फियों से भरा घड़ा मिला और इस तरह पंडित जी की भविष्यचाणी सही सिद्ध हुयी। इस घटना के कुछ साल बाद गाँव का एक आदमी अचानक गायब हो गया गाँव वालों ने बहुत ढूँढा पर उसका कुछ नही पता तो उन्होने पंडित जी से सम्पर्क किया तो उन्हांेने गणना करके बताया कि आप लोगों ने सब जगह देखा पर गाँव के दक्षिण दिषा में नही देखा गाँव वालों बताया के हम वहाँ पर भी गये थे पंडित ने कहा कि और  ढूँढो गाँव वाले पुनः वहाँ गये तो कुछ आगे जाने पर उन्हें उसकी लाष मिली पुलिस आई और तफतीश के बाद हत्यारे पकड़े गये पुलिस की एफ. आई. आर में दर्ज हुआ कि पंडित जी की मदद ये लाष बरामद हुयी। अपराधियों पर मुकदमा जिला जजी में दाखिल हुआ तो अंग्रेज जज को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ज्योतिषी के ज्ञान के कारण मकतूल की लाश बरामद हुयी जज के आदेष पर पंडित जी मुकदमे में बतौर गवाह पेश हुये गाँव वालों और अन्य गवाहों ने पंडित जी के बयान की पुष्टि की और अपराधियों को सजा मिली मुकदमे के बाद जज साहब ने पंडित की को अपने घर में मेहमान की हैसियत से रोक लिया और अपनी और अपने परिजनों की जंमपत्री बनवाई और उन्हें सम्मान पत्र और 500 रू. नकद प्रदान किये। और उन्हें सम्मान पूर्वक मोटर से घर पहुँचाया।