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मूत्रकृच्छ्र या मूत्रषोथ
December 1, 2019 • डाॅ. सुरेश चन्द्र शुक्ला, रिटा, वैध रा. आ. चिकित्सालय, लखनऊ

मूत्रकृच्छ्र यह मूत्रमार्ग का रोग है। वात, पित्त, कफ आदि तीनों दोषों के अलग-अलग या संयुक्त से प्रकोप होने से मूत्रनली या मूत्रमार्ग मे संकोच होने से मूत्रमार्ग से मूत्र आने मे कश्ट होता है तथा रूकावट होती है, मूत्रमार्ग मे जलन या पीड़ा होती है। जिससे मूत्र कम आता है। या मूत्र नही आता है कभी-कभी मूत्रनली में कीटाणु अर्थात बैक्टिीरिया के संक्रमण (अटैक) के कारण भी मूत्रावरोध, कष्टप्रद, तीव्र जलनयुक्त या पीड़ा युक्त मूत्र त्याग होता है। यह मूत्रमार्ग रोग स्वतंत्र या उपसर्ग 8 प्रकार का होता है।
1. वातज मूत्रकृच्छ्र
2. पित्तज मूत्रकृच्छ्र
3. कफज मूत्रकृच्छ्र
4. सन्निपातज मूत्रकृच्छ्र
5. शुक्रकृच्छ्र
6. विट वृच्छ्र
7. घात कृच्छ्र
8. अष्मरी कृच्छ्र
मूत्राघात-  मूत्र के आवेगों मे चोट या घात के कारण बाधा या रूकावट होती है। तब यह मूत्राघात रोग कहलाता है।
 इस प्रकार मूत्रकृच्छ्र रोग मे सिर्फ मूत्र निकलने मे रूकावट या पीड़ा या जलन होती है। इसलिये मूत्र निकलने मे केवल मूत्रमार्ग का रोग है दोषों या आगन्तुक कारणों से मूत्रमार्ग का अवरोध या संकोच होने से मूत्र निकलने मे कठिनाई होती है। इस रोग मे मूत्र आने की प्रवृत्ति तो होती है। किन्तु मूत्र आने मे असहनीय तेज जलन या कष्ट होता है।
 गनोरिया या सुजाक मे मूत्रमार्ग के घाव मे मवाद के जम जाने से मूत्रमार्ग बंद या रूक जाता है। इसलिये मूत्र निकलने मे भंयकर दर्द या असहनीय पीडा़ होती है।
 मूत्रकृच्छ्र के कारण- अत्याधिक व्यायाम, तेज औषधियों का सेवन, अत्याधिक मद्यपान, रूखे पदार्थ खाना, तेज चलने वाले घोड़े की सवारी करने से, आनूप जन्तुओं के मांस का सेवन करने से अध्यश या अजीर्ण से मनुष्यों मे उपरोक्त 8 प्रकार के मूत्रकृच्छ्र रोग पैदा होते है।
 अपने अपने कारणों से प्रकुपित वातादि दोष अलग-अलग या एक साथ वस्ति मे पहुँचकर मूत्रमार्ग मे संकोच, दवाब उत्पन्न करते है। तब मूत्रत्यग करते समय रोगी को असहनीय जलन या रूकावट, पीड़ा होती है इस अवस्था मे मूत्राशय मूत्र से भरी होती है। रोगी को मूत्रत्याग की इच्छा भी होती है। किन्तु मूत्रमार्ग मे जलन विकार के कारण कष्ट से मूत्र निकलता है।
1. मू़त्राशयगत कारण- मू़त्राशय को कला मे सूजन, मू़त्राशय मे टयूमर, सिस्ट, मू़त्राशय मे अश्मरी, फिरंगी खंजता, हिस्टीरिया, मूत्र की अधिक अम्लता, मूत्र कृमियों का अधिक बनना मुख्य कारण होते हैं। 
2. मू़त्रप्रणाली गत कारण-मूत्रपरक शोथ (यूरेथ्राइटिस), गनोरिया तथा षिश्नगत मूत्र मार्ग मे उपसंकोचक (यूथ्रिल स्ट्रैक्चर) इन कारणों से भी मूत्र मार्ग मे अवरोध होता है।
अन्य कारण- पौरूष ग्रन्थि की वृद्धि (प्रोस्टेªटाइटिस) तथा अर्श से भी मूत्रकृच्छ्र होता है। मूत्राशय पर बुरा प्रभाव डालने वाले व्यायाम, शराब का गुण तीक्ष्ण है। अत्याधिक मद्यपान, खाद द्रव्यों पदार्थो के त्याग सन्निपातज मूत्रकृच्छ्र।
1. वातिक मूत्रकृच्छ्र-इस मूत्रकृच्छ्र मे वंक्षण, वस्ति और मूत्रेन्द्रिय मे भंयकर पीड़ा होती है, बार-बार थोड़ा मूत्र आता है। 
3. पैत्तिक मूत्रकृच्छ्र मे मूत्र पीला और कभी-कभी रक्त युक्त होता है, मूत्र त्याग मे पीड़ा और जलन होती है। 
4. कफज मूत्रकृच्छ्र मे वस्ति और मूत्रेन्द्रिय मे भारीपन, शिथिलता व शोथ पीड़ा हो जाता है।
5. सन्निपातज मूत्रकृच्छ्र मे सभी दोषों के लक्षण होते है, और यह अत्यन्त कष्ट साध्य हेाता है।
मूत्रवाही स्त्रोंतों मे आपरेशन कराने या बाहरी आघात लगने से क्षत होन से भंयकर मूत्रकृच्छ्र होता है। इसे वातक मूत्रकृच्छ्र के समान लक्षण होते है। मन के वेग को रोकने से वायु विलोम होकर पेट मे आहमान या दर्द या मूत्रवरोध कर देता है। जिस मूत्रकृच्छ्र का कारण पथरी होती है। उसे अष्मरी मूत्रकृच्छ्र कहते है। अपने स्थान से गिरा हुआ शुक्र जब दोनों के प्रकोप से अवरूद्ध होकर मूत्रमार्ग मे रूक जाता है। उस दशा मे रोगी को षुक्र सहित मूत्रत्याग कष्ट के साथ होता है। वस्ति और लिंग मे पीडा़ होती है। पथरी और शर्करा के लक्षण समान है। पथरी ही पित्त से परिपाचित और वायु से सूख जाने के कारण तथा कफ रूपी जोड़ने वाली वस्तु के नष्ट हो जाने पर छोटे-छोटे टुकड़ों मे बाहर निकलती है। इसको शर्करा कहते है। पथरी व शर्करा से उत्पन्न मूत्रकृच्छ मे हृदय मे पीड़ा या र्दद, कम्पन, कमर मे दर्द, अग्नि की दुर्बलता, मूच्र्छा तथा भंयकर मूत्रकृच्छ्र होता है। मूत्र के वेग के साथ शर्करा निकल जाने पर दर्द  तब तक शांत रहता है, जब तक दूसरी शर्करा मूत्रवाह स्त्रोत के मुख को फिर से बंद ना कर दे।
मूत्रकृच्छ्र चिकित्सा-
1. गोक्षुरादि गुगल, 1-1 गोली सुबह शाम आधा कप पानी से।
2. पुर्ननर्वादि गुगल, 1-1 गोली सुबह शाम आधा कप पानी से।
3. चन्द्रप्रभावटी 1-1 गोली सुबह शाम आधा कप दूध से।
4. शिलाजत्वादि वटी 1-1 गोली सुबह शाम आधा कप दूध से।
5. पुर्ननवा मंडूर 120 मिग्रा व प्रवालपिष्टी 60 मिग्रा मिला कर सुबह शाम आधा शहद से लंे।
6. यशद भस्म 20 मिग्रा सत्वगिलोय 5. मिग्रा पुर्ननवा मंडूर 80 मिग्रा सुबह शाम आधा कप दूध या शहद से लें।
7. मूत्र मे जलन होने पर स्वर्णसूतशेखर रस 1 गोली पुर्ननवा मंडूर 80 मिग्रा सुबह शाम आधा शहद से।
8. भृंगराज आसव 4 चम्मच समान जल से भोजन के बाद दोनो समय लें।
9. अष्चगंधारिष्ट और पुर्ननवासव 2-2 चम्मच 4 चम्मच पानी मिला कर भोजन के बाद दोनो समय लें।
10. सिरप नेफ्राल 2 चम्मच भोजन के आधा घंटे के बाद दोनो समय लें।
11. सिरप यूरेाली डेढ चम्मच भोजन के बाद दोनांे समय एक सप्ताह लें।
12. लोध्रासव 3 चम्मच चाय के 3 चम्मच पानी मिला कर भोजन के बाद दोनो समय एक सप्ताह लें।
13. त्रिनेत्राख्यो रस 1 गोली सुबह शाम  दूध या पानी से।
14. वरूणाथ लोध 1 गोली सुबह शाम दूध या पानी से।
15. मूत्रकृच्छ्रान्तक रस 1 गोली या 80 मिग्रा सुबह शाम पानी से।
16. मूत्रकृच्छ्रान्तक योग 80 मिग्रा सुबह शाम पानी से।