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मुझे घोर पश्चाताप था
November 20, 2019 • ऊषा जैन शीरी

मैं मन ही मन पिता से घृणा करता था। घृणा... ही तो...। कभी-कभी उनकी मृत्यु तक की कल्पना कर मैं एक प्रकार की तृप्ति महसूस करता था, लेकिन आज... एक कोमल संवेदना अनजाने ही उनके प्रति मन में जाग उठी थी।
 पिताजी भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे थे। उन्होंने अपने प्राॅविडेंड फण्ड का सारा पैसा मुझे नशे की लत से छुटकारा दिलवाने के लिए मेरे इलाज में खर्च कर दिया। डिएडिकशन सेन्टर में उनकी वह रात-दिन की सेवा... इतना लाड़-प्यार। अब तक यह कहाँ छुपा रखा था उन्होंने। अपनी भटकन पर मुझे घोर पश्चाताप था। पिताजी की भावनायें, मध्यवर्गीय सपने, मुझे बड़ा आदमी बनते देखने की उनकी महत्वाकांक्षा को मैने नशे की आग में जला डाला था। आज मैं उन्हें सही परिपेक्ष में देख सकता था, लेकिन अब अपनी नादनी के कारण मैने उन्हें कितना दुःख पहुंचाया था।
 मेरे ठीक होकर घर आने पर सबसे पहले उन्होंने उस पब्लिक स्कूल से मेरा नाम कटवाया जहाँ मैं बिलकुल 'मिसफिट' था।
 हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़कर ही मैं चीफ इंजीनियर के पद पर पहुंच गया हूँ। आज माता-पिता मेरे पास ठाठ से रहते हैं सभी बहनों की मैंने अच्छे घरों में शादी कर दी है।
 पिताजी अब इस बात से खूब वाकिफ हो चुके है कि सिर्फ इंग्लिश स्कूल की शिक्षा की तरक्की की राह के लिए आवश्यक नहीं। उसके लिए को हिन्दी  मीडियम स्कूल भी उतना ही सक्षम है। विद्यार्थी की लगन, उसकी मेहनत ही वास्तव में उसका भविष्य संवारती है।