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नागरिक का सामाजिक न्याय संवैधानिक अधिकार है
February 11, 2020 • -डा. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् • Views

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाने की पहल:- समाज में फैली भेदभाव और असमानता की वजह से कई बार हालात इतने बुरे हो जाते है कि मानवाधिकारों का हनन भी होने लगता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। सन् 2009 से इस दिवस को पूरे विश्व में सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जाता है। रोटी, कपड़ा, मकान, सुरक्षा, चिकित्सा, अशिक्षा, गरीबी, बहिष्कार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने की जरूरत को पहचानने के लिए विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाने की शुरूआत की गयी है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2019 की थीम रखी थी- ‘‘यदि आप शांति और विकास चाहते हैं, तो सामाजिक न्याय के लिये काम करें।’’ वास्तव में किसी भी समाज की शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना जरूरी है।
आपात स्थिति के माध्यम से रहने वाले बच्चों के लिए, शिक्षा एक जीवन रेखा है:- अन्तर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (यूनिसेफ) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में तीन करोड़ बच्चे युद्ध या अन्य कारणों से पैदा होने वाले संकटों की वजह से शिक्षा नहीं ले पाते हैं। हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार मध्य अफ्रीकी गणराज्य में लगभग एक तिहाई स्कूलों को या तो गोलियों से छलनी किया गया था या आग लगाई गई अथवा लूटा या सशस्त्र समूहों द्वारा कब्जा कर लिया गया। यूनिसेफ के वैश्विक शिक्षा कार्यक्रम के प्रमुख जोसफिन बाॅर्न, ने कहा-”आपात स्थिति के माध्यम से रहने वाले बच्चों के लिए, शिक्षा एक जीवन रेखा है।” 
ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति अपने न्याय के अधिकार से वंचित न हो सके:- मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि जहां भी अन्याय होता है, वहां हमेशा न्याय को खतरा होता है। यह बात केवल वैधानिक न्याय के बारे में ही सही नहीं है कि क्योंकि एक विवेकपूर्ण समाज में सदैव समावेशी प्रणाली के लिए रंग, नस्ल, वर्ण, जाति जैसी किसी भी प्रकार की सामाजिक बाधा से मुक्त न्याय सुनिश्चित करने की उम्मीद की जाती है, ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति अपने न्याय के अधिकार से वंचित न हो सके। वास्तव में किसी को भी न्याय से वंचित रखना न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है बल्कि संविधानिक प्रावधानों के भी खिलाफ़ है। 
अभिभावकों की गलत धारणा भी सामाजिक न्याय की राह में बाधा है:- कुछ समय पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ ने बालिकाओं के बारे में कुछ चैकाने वाले आँकड़े प्रस्तुत किए हैं। इन आँकड़ों के अनुसार भारत की आबादी में 50 मिलियन बालिकाएँ व महिलाओं की गिनती ही नहीं है। प्रत्येक वर्ष पैदा होने वाली 12 मिलियन लड़कियों में से 1 मिलियन अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाती हैं। 4 वर्षों से कम आयु की बालिकाओं की मृत्यु दर बालकों से अधिक है। 5 से 9 वर्षों की 53 प्रतिशत बालिकाएँ अनपढ़ हैं। 4 वर्षों से कम आयु की बालिकाओं में 4 में से 1 के साथ दुव्र्यवहार होता है। प्रत्येक 6ठीं बालिका की मृत्यु लिंग भेद के कारण होती है। इस सबके पीछे मुख्य कारण अभिभावकों की यह गलत धारणा भी है कि लड़कों से ही उनका वंश आगे बढ़ता है।
सामाजिक न्याय का अर्थ:- समाज में हर तबका एक अलग महत्व रखता है। कई बार समाज की संरचना इस प्रकार होती है कि आर्थिक स्तर पर भेदभाव हो ही जाता है। ऐसे में न्यायिक व्यवस्था पर भी इसका असर पड़े, यह सही बात नहीं है। समाज में फैली असमानता और भेदभाव से सामाजिक न्याय की मांग और तेज हो जाती है। सामाजिक न्याय के बारे में कार्य और उस पर विचार तो बहुत पहले से शुरू हो गया था लेकिन दुर्भाग्य से अभी भी विश्व के कई लोगों के लिए सामाजिक न्याय सपना बना हुआ है। सामाजिक न्याय का अर्थ निकालना बेहद मुश्किल कार्य है। सामाजिक न्याय का मतलब समाज के सभी वर्गों को एक समान विकास और विकास के मौकों को उपलब्ध कराना है। सामाजिक न्याय यह सुनिश्चित करता है कि समाज का कोई भी शख्स वर्ग, वर्ण या जाति की वजह से विकास की दौड़ में पीछे न रह जाए। यह तभी संभव हो सकता है जब समाज से भेदभाव को हटाया जाए।
भारत में सामाजिक न्याय के लिए अनेक प्रयास:- सामाजिक न्याय के संदर्भ में जब भी भारत की बात होती है तो हम पाते हैं कि हमारे संविधान की प्रस्तावना और अनेकों प्रावधानों के द्वारा इसे सुनिश्चित करने की बात कही गई है। भारत में फैली जाति प्रथा और इस पर होने वाला स्वार्थपूर्ण भेदभाव सामाजिक न्याय को रोकने में एक अहम कारक सिद्ध होता है। भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास आयोग जैसी कई सरकारी तंत्र एवं लाखों स्वयं सेवी संगठन हमेशा इस बात की कोशिश करते हैं कि समाज में भेदभाव से कोई आम इंसान पीड़ित न हो। भारत में आज भी कई लोग अपनी कई मूल जरूरतों के लिए न्याय प्रकिया को नहीं जानते जिसके अभाव में कई बार उनके मानवाधिकारों का हनन होता है और उन्हें अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है। आज भारत में अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता ज्यादा है। इन्हीं भेदभावों के कारण सामाजिक न्याय बेहद विचारणीय विषय हो गया है।
2.5 अरब से अधिक बच्चों को सुरक्षित भविष्य का अधिकार दिलाना सी0एम0एस0 का लक्ष्य:- यूनेस्को के शान्ति शिक्षा पुरस्कार एवं ‘गिनीज बुक आॅफ रिकार्ड’ में नामित, वर्तमान में लगभग 56,000 से अधिक छात्र संख्या वाले सिटी मोन्टेसरी स्कूल का लक्ष्य सामाजिक न्याय के तहत विश्व के 2.5 अरब से अधिक बच्चों को सुरक्षित भविष्य का अधिकार दिलाना है, जो कि सम्पूर्ण विश्व में ‘एकता व शान्ति’ की स्थापना से ही संभव है। न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 27 से 29 अगस्त 2014 तक ‘द रोल आॅफ सिविल सोसाइटी इन पोस्ट 2015 डेवलपमेन्ट एजेण्डा’ विषय पर आयोजित हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के 65वंे वार्षिक सम्मेलन में मैं अपनी बेटी व विद्यालय की चीफ आॅपरेटिंग आॅफिसर प्रो. गीता गाँधी किंगडन के साथ प्रतिभाग किया। न्यूयार्क यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में इस बात को मजबूती से रखा गया कि ‘विश्व के दो अरब से अधिक बच्चों को सुरक्षित भविष्य का अधिकार’ सभी सरकारों की प्राथमिकता में होना चाहिए।’ वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सिटी मोन्टेसरी स्कूल को अपना ‘आॅफिसियल एन0जी0ओ0’ घोषित किया है एवं यह उपलब्धि अर्जित करने वाला सी0एम0एस0 विश्व का पहला विद्यालय है। 
न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाने के लिए सीएमएस का सतत् प्रयास:- वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र संघ को और मजबूत किये जाने की आवश्यकता है, जिससे यह संस्था युद्धों को रोकने, अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का निपटारा करने, आतंकवाद को रोकने नाभिकीय हथियारों की समाप्ति एवं पर्यावरण संरक्षण आदि तमाम वैश्विक समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से सुलझाने में सक्षम हो सकें। क्योंकि तभी विश्व में शान्ति व एकता की स्थापना संभव हो सकेगी। विश्व एकता व विश्व शान्ति के प्रयासों के तहत ही सी0एम0एस0 विगत 20 वर्षों से लगातार प्रतिवर्ष ‘मुख्य न्यायाधीशों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन’ आयोजित करता आ रहा है जिसमें अभी तक दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देशों की भागीदारी हो चुकी है। इसके अलावा 29 अन्तर्राष्ट्रीय शैक्षिक समारोह के माध्यम से भी सी0एम0एस0 विश्व के बच्चों को एक मंच पर एकत्रित करके विश्व एकता व शान्ति का संदेश देता है। इसके अलावा सी.एम.एस. विभिन्न सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रमों जैसे पर्यावरण, बालिकाओं की शिक्षा, किशोरों व युवाओं के चारित्रिक उत्थान आदि अनेकानेक ज्वलन्त मुद्दों पर भी पुरजोर ढंग से अपनी आवाज उठाता रहा है। 
समूची पृथ्वी एक राष्ट्र है और हम सभी इसके नागरिक हैं:- आज जहाँ हम अपनी छोटी से धरती को अनेक द्वीपों और देशों में बांटते फिर रहे हैं। इसके छोटे से टुकड़े के लिए महाविनाश के सरंजाम जुटाते फिरते है, वहीं अब वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी भी दे डाली है कि मानव अभी से अपने को विश्व परिवार का ही नहीं वरन् ब्रह्ममाण्ड परिवार का सदस्य मानकर अपनी सोच में बदलाव लाए। नया युग प्रस्तुत करने वाली इस नयी सदी में मनुष्य देश, जाति और धर्मो की संकीर्ण 
परिधि में बॅधा न रहेगा बल्कि समूची पृथ्वी एक राष्ट्र का रूप लेगी। इसमें एक धर्म होगा, एक भाषा बनेगी और एक संस्कृति पनपेगी। अगले दिनों हमें अपना परिचय धरती के निवासी के रूप में देना पड़ेगा तभी हम ब्रह्ममाण्ड के अन्य सुविकसित प्राणियों से एकता, आत्मीयता स्थापित कर पाएँगे।
सभी को साामाजिक न्याय सहजता से सुलभ हो:- सी0एम0एस0 विगत 60 वर्षों से लगातार विश्व के दो अरब से अधिक बच्चों के सुरक्षित भविष्य हेतु विश्व एकता व विश्व शान्ति का बिगुल बजा रहा है परन्तु यू0एन0ओ0 के आॅफिसियल एन0जी0ओ0 का दर्जा मिलने के बाद विश्व पटल पर इसकी प्रतिध्वनि और जोरदार ढंग से सुनाई दे रही है। सी0एम0एस0 की सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति का मूल यही है कि सभी को सामाजिक न्याय सहजता से मिल सके, मानवाधिकारों का संरक्षण हो, भावी पीढ़ी के सम्पूर्ण मानव जाति की सेवा के लिए तैयार किया जा सके, यही कारण है सर्वधर्म समभाव, विश्व मानवता की सेवा, विश्व बन्धुत्व व विश्व एकता के सद्प्रयास इस विद्यालय को एक अनूठा रंग प्रदान करते हैं जिसकी मिसाल शायद ही विश्व में कहीं और मिल सके। कानून को न्यायालय की चार दीवारी से बाहर आना होगा। जो व्यक्ति अशिक्षा, आर्थिक अभाव या किसी भी अन्य कारणों से न्यायालय नहीं पहुंच पाता है उसे भी न्याय मिले इस बात को हम सभी को मिलकर सुनिश्चित करना है। 
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