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नानक की मूल शिक्षा सच्चा सौदा त्याग पर आधारित है
November 10, 2019 • प्रदीप कुमार सिंह

सिक्ख धर्म की स्थापना गुरूनानक जी द्वारा लगभग पांच सदियों पहले की गयी थी। इस वर्ष नानक की जयन्'ती 12 नवम्बर को 550वां प्रकाश पर्व के रूप में बहुत ही श्रद्धापूर्वक मनायी जा रही है। नानक के पिता लाला कल्याण राय (मेहता कालू जी) तथा माता श्रीमती तृप्ता देवी जी थे। नानक अपने विशाल व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु सभी के गुण समेटे हुए थे। नानक जी के प्रति हिन्दू तथा मुसलमान दोनों बराबर से श्रद्धा रखते थे।
 पाकिस्तान के गुरुद्वारा ननकाना साहिब में श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के अवसर पर आयोजित धार्मिक समागमों में शामिल होने के लिए एसजीपीसी ने 1303 श्रद्धालुओं के एक जत्थे को अटारी सड़क सीमा से पाकिस्तान रवाना किया। श्रद्धालुओं ने अटारी सड़क सीमा से पाकिस्तान वाघा सीमा तक का रास्ता पैदल तय किया। करतारपुर गलियारे को खोलने से भारत और पाकिस्तान की जनता में एक नई उम्मीद बनी है कि इस कदम से दोनों देशों में विश्वास बहाली होगी और धीरे-धीरे अन्य मुद्दों को भी बातचीत से सुलझाने का रास्ता खुल जायेगा।  
 उस जमाने में हिन्दूओं तथा मुसलमानों में काफी दूरियाँ थी। इस दूरी को दूर करने के लिए नानक ने हिन्दू तथा मुस्लिम धर्मों के युगानूकूल तथा सार्वभौमिक विचारों को लेकर एक नया सिक्ख धर्म स्थापित किया। सिक्ख के मायने जीवन पर्यन्त एक छात्र की भांति सदैव अच्छी बातों को सीखने वाला व्यक्ति होता है। नानक जी की सिखावत पर चलकर सिक्ख समाज आज विश्व के अधिकांश देशों को अपनी महत्वपूर्ण सेवायें देकर वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय अवधारणा को साकार कर रहे हंै। 
 मानव जीवन में अत्यधिक भौतिकता का प्रभाव बढ़ जाने के कारण मानव जीवन में दुःख बढ़ते जा रहे थे। उस समय लोग धर्म के असली तत्व एवं आध्यात्मिक जीवन को बहुत कम महत्व देते थे। परमपिता परमात्मा ने मानव जीवन को त्याग (सच्चा सौदा) का पाठ पढ़ाने के लिए गुरू नानक देव जी को संसार में भेजा। सिक्ख धर्म के संस्थापक नानक का जन्म वर्ष 1469 में उत्तरी पंजाब के वर्तमान पाकिस्तान के लाहौर जिले के तलवंडी ग्राम में हिन्दू परिवार में हुआ था, जिसे अब ननकाना के नाम से जाना जाता है। ननकाना साहिब, पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित एक शहर है। इसका वर्तमान नाम सिखों के पहले गुरू नानक देव जी के नाम पर पड़ा है। यह लाहौर से 80 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह गुरू नानक देव का पवित्र जन्मस्थान है, इसलिए यह विश्व भर के सिक्खों का एक बड़ा पवित्र तीर्थ स्थान भी है। ननकाना साहिब गुरूद्वारा सारे विश्व में विख्यात है। महाराजा रणजीत सिंह ने गुरू नानकदेव के जन्म स्थान पर भव्य एवं ऐतिहासिक गुरूद्वारे का निर्माण कराया था। 
 नानक का नाम उनकी बड़ी बहन नानकी के नाम पर रखा गया था। बचपन से नानक की ईश्वर के प्रति भक्ति, निष्ठा और उनका आध्यात्मिक ज्ञान देख उनके शिक्षक, सहपाठी एवं नगरवासी सभी आश्चर्यचकित हो जाते थे। एक बार पिता ने कुछ सामान खरीद लाने को पैसे दिए। नानक ने वे पैसे गरीबों को भोजन कराने में खर्च कर दिए। पिता से वापिस आकर बोले: 'पिताजी, मैं सच्चा सौदा कर आया। यह भी कहा जाता है कि आध्यात्मिक रूझान को देखकर उनके पिता ने नानक को व्यापार में लगा दिया। नानक ने व्यापारी बनकर कमाई के मुनाफे से भूखों को भोजन खिलाना शुरू कर दिया। उन्होंने सामाजिक सद्भाव के लिए लंगर की परम्परा शुरू की। 
 नानक का विवाह 24 सितम्बर 1487 को श्री मूलचंद की बेटी सुलखनी जी के साथ हुआ। रूढ़िवाद के विरोधी नानक ने मूर्ति पूजा तथा जाति प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और मानवता को सबसे ऊँचा स्थान दिया। गुरू नानक ने अधिक से अधिक लोगों तक अपने सर्वधर्म समभाव से भरे ईश्वरीय तथा तथ्यपूर्ण विचारों को फैलाने के लिए अपनी स्थानीय भाषा के अलावा संस्कृत, हिन्दी, पारसी और अरबी भाषायें भी सीखी थी। 
 सर्वधर्म समभाव के समर्थक नानक जी ने वर्ष 1499 से वर्ष 1524 तक 25 वर्षो तक कई लम्बी तथा कष्टदायी यात्राएं की। अपनी इन यात्राओ के दौरान उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों के धार्मिक स्थलों पर श्रद्धापूर्वक जाकर उस परम शक्ति को नमन किया। जिसे हम ईश्वर, अल्ला, खुदा, वाहे गुरू, गाॅड आदि अनेक नामों से पुकारते हैं। नानक की शिक्षाओं में मुख्य रूप से नाम जपने, किरत करने यानी गृहस्थ ईमानदार की तरह रोजगार में लगे रहने और वंद चको अर्थात परोपकारी सेवा और अपनी आय का कुछ हिस्सा गरीब लोगों में बाँटने की नसीहत दी। वहीं अहंकार, क्रोध, लालच, भौतिक वस्तुओं से अत्यधिक लगाव और वासना से बचने की सलाह दी। नानक ने 7500 पंक्तियां की एक कविता लिखी थी, जिसे बाद में गुरू ग्रन्थ साहिब में विशेष रूप से शामिल कर लिया गया।
 नानक के पवित्र हृदय में ईश्वर का वास होने के कारण उनके दिव्य तथा मानवीय उपदेश सीधे परमात्मा की ओर से अवतरित होते थे। नानक की आत्मा में गुरूमुखी भाषा में गुरू ग्रन्थ साहिब का ज्ञान उतरा। गुरू ग्रन्थ साहिब का एक लाइन में सन्देश है - ईश्वर की राह में बड़े से बड़ा त्याग करना ही सच्चा सौदा है। गुरू ग्रन्थ साहिब का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और यह सार्वभौमिक ज्ञान विश्व के अनेक देशों को लाभान्वित कर रहा है। ईश्वर की राह में त्याग का यह गुण केवल सिक्खों के लिए ही नहीं है वरन् सारी मानव जाति के लिए अनुकरणीय है। गुरू ग्रंथ साहिब का संपादन सिक्खों के पांचवें गुरू अर्जुन देव जी ने किया था। गुरू ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दसवे गुरू गोविंद सिंह जी ने नौवे गुरू तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमंे कुल 1430 पृष्ठ हंै।
 गुरूग्रन्थ साहिब में मात्र सिख गुरूओं के ही उपदेश नहीं है, वरन् 30 अन्य हिन्दू संत और मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। इसमें जहां जयदेवजी और परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं जाति-पांति के आत्महंता भेदभाव से ग्रस्त तत्कालीन हिंदु समाज में हेय समझे जाने वाली जातियों के महापुरूषों जैसे कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी भी सम्मिलित है। पांचों वक्त नमाज पढ़ने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरू ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता, दिव्य संदेश की दृष्टि से गुरू ग्रन्थ साहिब संसार में अद्वितीय है। इसकी भाषा की सरलता, सुबोधता, सटीकता जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं गुरू ग्रन्थ साहिब की शिक्षाआंे को संगीत के सुरों व 31 रागों के प्रयोग ने आत्मविषयक गूढ़ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है।
 वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। नानक कहते थे कि अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे, एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौ मंदे।। नानक नाम चढ़ दी कला तेरे भाने सर्वत्तदा भला! अर्थात यदि तेरे हृदय में संसार के समस्त प्राणी मात्र की भलाई की भावना होगी तो नानक का नाम तुझे ईश्वर की ओर ले जायेगा। क्योंकि संसार के समस्त प्राणी एक ही परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं। जब हम सारी मानव जाति की भलाई करेंगे तब नानक का नाम हमंे जीवन में सर्वोच्च ऊँचाई पर ले जायेगा। नानक के सन्देश का मुख्य तत्व इस प्रकार है - ईश्वर एक है, वह कण-कण में बसा है, ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान है, संसार में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। 
 नानक की जन सामान्य बढ़ती लोकप्रियता के कारण रूढ़िवादिता से ग्रस्त कई कट्टर बादशाहों, पण्डितों और मुल्लाओं ने उनका कड़ा विरोध किया। नानक ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया था। धरती की कोई भी ताकत उन्हें प्रभु के मार्ग पर आगे बढ़ने से रोक नहीं सकी। नानक ने देश भर में खतरनाक जंगलों तथा पहाड़ों में पैदल चलकर वह साहसपूर्वक अंधविश्वासों, पाखण्डों तथा सामाजिक कुरीतियों को छोड़ने के लिए लोगों को तार्किक ढंग से समझाया। नानक के इस प्रयास से लोगों की सोच में काफी बदलाव भी आया। 
  गुरू नानक देव जी ने देश सहित मक्का, मदीना, काबुल तथा ईरान की लम्बी यात्रायें की और वहां के निवासी उनके विचारों से अत्यन्त प्रभावित हुए। नानक ने कहा कि हर व्यक्ति को प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान कर सम्पूर्ण संसार की भलाई का कार्य करना चाहिये। नानक ने सारी मानव जाति से कहा कि किसी मनुष्य के शरीर की पूजा करने से कुछ नहीं मिलेगा वरन् गुरू ग्रन्थ साहिब का पूरे श्रद्धाभाव से रोजाना पाठ करने से लाभ होगा। अर्थात गुरू ग्रन्थ साहिब में दी शिक्षाओं के अनुरूप पवित्र भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करके अपनी आत्मा का विकास करना चाहिए। नानक की शिक्षाओं के अनुसार सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। एक ही छत के नीचे हो अब सब धर्मों की प्रार्थना होनी चाहिए। परम पिता परमात्मा सभी का एक है। सबमें उसके प्रति सद्भावना होनी चाहिए। 
 सिख धर्म के महान 10 गुरूओं की भक्ति, सेवा, मानव प्रेम, वीरता और बलिदान की सीख विश्वविख्यात है। सिक्ख धर्म के 10 महान गुरू इस प्रकार हैं - (1) पहले गुरू नानक देव 20 अगस्त 1507 को गुरू बने। उनका निर्वाण 22 सितम्बर 1539 को 69 वर्ष की आयु में हुआ था। (2) दूसरे गुरू अंगद देव का जन्म 31 मार्च 1504 को हुआ। वह 7 सितम्बर 1539 को दूसरे सिक्ख गुरू बने। उनका निर्वाण 29 मार्च 1552 को 48 वर्ष की आयु में हुआ। (3) तीसरे गुरू अमर दास जन्म 5 मई 1479 को हुआ। वह 26 मार्च 1552 को गुरू बने। उनका निर्वाण 1 सितम्बर 1574 को 95 वर्ष की आयु में हुआ। (4) चैथे गुरू राम दास जन्म 24 सितम्बर 1534 को हुआ। वह 1 सितम्बर 1574 को गुरू बने। उनका निर्वाण 1 सितम्बर 1581 को 46 वर्ष की आयु में हुआ। (5) पांचवे गुरू अर्जुन देव का जन्म 15 अप्रैल 1563 को हुआ। वह 1 सितम्बर 1581 को गुरू बने। उनका निर्वाण 30 मई 1606 को 43 वर्ष की आयु में हुआ। 
 (6) छठे गुरू हरगोबिन्द सिंह का जन्म 19 जून 1595 को हुआ। वह 25 मई 1606 को गुरू बने। उनका निर्वाण 28 फरवरी 1644 को 48 वर्ष की आयु में हुआ। (7) सातवे गुरू हर राय का जन्म 16 जनवरी 1630 को हुआ। वह 3 मार्च 1644 को गुरू बने। उनका निर्वाण 6 अक्टूबर 1661 को 31 वर्ष की आयु में हुआ। (8) आठवे गुरू हर किशन सिंह का जन्म 7 जुलाई 1656 को हुआ। वह 6 अक्टूबर 1661 को गुरू बने। उनका निर्वाण 30 मार्च 1664 को 7 वर्ष की आयु में हुआ। (9) नौवे गुरू तेग बहादुर सिंह का जन्म 1 अप्रैल 1621 को हुआ। वह 20 मार्च 1665 को गुरू बने। उनका निर्वाण 11 नवंबर 1675 को 54 हुआ। (10) दसवे गुरू गोबिंद सिंह का जन्म 22 दिसम्बर 1666 को हुआ। वह 11 नवंबर 1675 को गुरू बने। उनका निर्वाण 7 अक्टूबर 1708 को 41 वर्ष की आयु में हुआ।
 सिक्खों के विश्वविख्यात 9 गुरूद्वारे के नाम इस प्रकार हैं - (1) पंजाब के अमृतसर में गुरूद्वारा हरमंदिर साहिब, (2) पंजाब में गुरूद्वारा बाबा अटल साहिब, (3) पंजाब में तख्त श्री दमदमा साहिब, (4) तख्त श्री पटना साहिब बिहार में (5) नई दिल्ली में गुरूद्वारा बंगला साहिब, (6) दिल्ली में गुरूद्वारा मजनू टीला, (7) जम्मू और कश्मीर में गुरूद्वारा मटन साहिब (9) कर्नाटक में गुरूद्वारा नानक जीरा साहिब (10) हिमाचल प्रदेश में गुरूद्वारा रेवाल्सर आदि।
 नानक की जीवन के अंतिम दिनों में उनकी आध्यात्मिक ख्याति बहुत बढ़ गई थी। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर 22 सितंबर 1539 को इनका परलोकवास हुआ। जीवन के अंतिम दिनों में हिन्दू देवी दुर्गा के भक्त लहना ने गुरू नानक के भजन सुने और अपना सम्पूर्ण जीवन अपने गुरू और उनके अनुयायियों की सेवा में लगा दिया। गुरू नानक ने लहना की परीक्षा ली। इसके बाद नानक ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया। नानक की मृत्यु के बाद लहना ने गुरू अंगद देव के नाम से सिक्ख धर्म को आगे बढ़ाया। 
 नानक का सिक्ख समाज वर्तमान में विश्व एकता तथा विश्व शान्ति से भरे विश्व के एक माॅडल का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। दुनिया के लगभग सभी देशों में सिक्ख समाज कठोर परिश्रम, साहस, सच्चाई तथा व्यापार कौशल से अपना सम्मानजनक स्थान तथा विश्वास निरन्तर विकसित कर रहा है। सिक्ख परिवारों की सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाने में काफी बड़ा योगदान है। लगभग 135 करोड़ भारतीयों तथा प्रवासियों को सिक्ख समुदाय पर अत्यधिक गर्व तथा नाज है। 
 मानव जाति सिक्ख समुदाय की बहादुरी, साहसिक जज्बे तथा न्यायप्रियता की सदैव ऋणी रहेंगी। नानक जी के सर्व-धर्म समभाव के विचारों तथा सार्वभौमिक गुरू ग्रन्थ साहिब के आधार पर एक वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था का विचार निकट भविष्य में अवश्य साकार रूप लेगा। संसार के प्रत्येक परिवार में आर्थिक समृद्धि आने से आध्यात्मिक सभ्यता की स्थापना होगी। नानक जी के योगदान के बारे में जितना लिखा जाये वह कम है। यदि समुद्र के सारे जल को स्याही बनाकर उनके व्यक्तित्व के बारे में लिखा जायें तब भी उनके लोक कल्याणकारी जीवन चरित्र को लिखने में समुद्र के जल रूपी स्याही कम पड़ेगी।