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नेताजी की मृत्यु एक अनसुलझा रहस्य
January 25, 2020 • -धीरेन्द्र सिंह परिहार

भारत के इतिहास मे कई ऐसे अनसुझे रहस्य हैं। जो आज तक एक गुत्थी बने हुये हैं। ऐसा ही एक रहस्य है देश के महान क्रान्तिकारी और आजाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमान्डर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की विमान दुर्घटना का है । जो 1944-45 में जापानी सेनाओं के साथ देश की आजादी के लिये ब्रिटिश सेनाओं से देश की पूर्वी सीमा पर लड़ रहे थे। 7 को मई जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया हिरोशिमा व नागासाकी पर अमरीका के एटमी हमले के बाद 14 अगस्त 1945 को जापान ने भी मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया 15 अगस्त 1945 को नेताजी ने सिंगापुर रेडियो से आजाद हिन्द फौज के समर्पण की घोषणा की। वर्मा मे जापानी सेना के पतन के बाद नेताजी ने अपने कुछ सहयोगियों से भविष्य मे रूस जाकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने की बात कही थी जापान की सर्वोच्च सैन्य कमान इससे सहमत नही थी किन्तु दक्षिण मे जापानी सेना के सर्वोच्च कमान्डर तेराची और कुछ उच्चस्थ सैन्याधिकारी इस योजना मे सहायक थे 15 अगस्त को नेताजी आजाद हिन्द सरकार के कुछ मंत्रियों के हबीबुर्रहमान, आबिद हसन, देवनाथ दास, एस. ए. अययर आदि के साथ टोकियो रवाना हो गये थे रास्ते मे बैेकांक और सैगांव मे रूके। 17 अगस्त को सैगांव से नेताजी व हबीबुर्रहमान, एक जापानी बमवर्षक मे बैठ कर हिन्द-चीन मे टूूरैन पहुँचे रात बिता कर वे दाइवेन को रवाना हुये ताकि दाइवेन मंचूरिया के रास्ते टोकियो पहुँच सके। 23 अगस्त को जापानी रेडियो ने बताया कि यह विमान ताइहोकू हवाई अडड्े से उड़ान भरते समय घ्वस्त हो गया इस दुर्घटना मे जर्नल शिदई सहित कुछ लोग मारे गये नेताजी बुरी तरह जल गये थे उन्हें ताइहोकू सैन्य अस्पताल मे भरती कराया गया जहाँ उनकी मौत हो गई और अगले दिन उनका अंतिम सस्कार कर दिया और मध्य सितंबर में उनकी अस्थियंा टोकियो के रैकोंजी के मंदिर मे रख दी गयीं। (साभार- नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, लेखक-शरत चन्द बोस, नेशनल बुक ट्रस्ट) 
 इस खबर पर किसी ने विश्वास नही किया इस खबर को जापान की एक प्राइवेट संस्था डोमई न्यूज एजेंसी ने प्रसारित किया किसी भी सरकारी या नागरिक अधिकारी या जापानी सरकार ने इस बारे में कुछ नही कहा खबर मे कहा गया कि स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार के प्रधान सुभाष चन्द्र बोस नहीं रहे वे विमान दुर्घटना मे मारे गये उनका शव टोकियो लाया गया कुछ दिन बाद एक अंय प्रसारण मे कहा गया कि उनकी अन्त्येष्टि फारमोसा मे ही कर दी गई दोनों बयान परस्पर विरोधी थे, भारत मे   महात्मा गांधी जी और प. जवाहर लाल नेहरू ने इस खबर पर यकीन नही किया और यह बात उन्होंने 30 दिसंबर 1945 को जेल मे बंद सुभाष बाबू के सहयोगी बाद मे रहे संसद सदस्य प्रो. समर गुहा और अंय बंगाली कैदियों से जेल मे कही 1991 में प्रिन्टन विश्वविद्यालय में एक ऐसा अमरीकी दस्तावेज मिला जिससे साबित होता था कि सुभाष बाबू विमान दुर्घटना के बाद जिंदा थे। भारत के तत्कालीन वायसराय वेवेल ने अपनी डायरी मे इस खबर पर संदेह प्रकट किया और यह खबर सुनने के बाद अपने भारतीय और ब्रिटिश अधिकारियों को नेताजी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया इस खबर के 67 दिन वाद वेवेल के गृह सचिव आर. एफ. मूडी ने ब्रिटेन की एटली सरकार को एक टाॅप सीक्रेट रिपोट भेजी जिसमे सुभाष को दुश्मन न. 1 व युद्ध         अपराधी बता कर उनके विरूद्ध कार्यवाही करने के अनेक विकल्प सुझाये जो 30 साल बाद सत्ता हस्तांरण के ब्रिटिश दस्तावेज खंड 6 में प्रकाशित हुये। 29 अगस्त 1945 को को नेहरू जी से शिकागो ट्रिब्यून के अमरीकी पत्रकार ने अल्फ्रेड वेग ने कहा कि जापानी प्रसारण के बाद सुभाष बाबू जिंदा थे चार दिन पहले 25 अगस्त को उन्हें सैंगांव मे जिंदा देख गया है। 11 सितंबर 1945 को स्वयं नेहरू जी ने झांसी में  ए. पी. आई. के प्रतिनिधी को कहा कि अंय लोंगों की तरह मुझे भी सुभाष बाबू की मौत पर यकीन नही है मुझे कई ऐसी रिर्पोटे मिलीं है जिनसे पता चलता है उनकी मृत्यु की खबर प्रामाणिक नही है। गुजराती दैनिक जंमभूमि के संपादक अमृत लाल सेठ प. नेहरू के साथ 1946 में माउण्ट बेंटन के मेहमान बन कर सिंगापुर गये थे तो माउण्ट बेंटन  ने नेहरू जी को चेतावनी दी थी कि यदि वे सुभाष चन्द्र बोस व आजाद हिन्द फौज को महत्व देते रहे तो सुभाष चन्द्र बोस के वापस लौटने पर भारत को सुभाष चन्द्र बोस के हाथों सौपने को खतरा आपको उठाना पड़ेगा अमृत लाल सेठ द्वारा लिखे एक लेख के अनुसार यह बात प. नेहरू ने खुद शरद चन्द्र बोस को लिखी थी। नेहरू जी माउण्ट बेंटन की इस चेतावनी पर आजीवन अमल करके इस विषय पर खामोश रहे और सदैव इस संबध पर उच्चस्तरीय जांच कराने से बचते रहे 1956 मे कलकत्ता के नागरिको ने अन्र्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जज राधा कुमुद पाल की अध्यक्ष्यता मे एक गैर सरकारी जांच समिति का गठन किया तो नेहरू जी ने शहनवाज खान की अध्यक्षता मे एक जंाच आयोग गठित किया इसकी रिर्पोट से 10 साल से गुप्त रखे कुछ दस्तावेज सामने आये जिनसे पता चलता थ कि नेताजी ने रूस मे शरण लेकर उनकी मौत का किस्सा फैला दिया गया तथा नेताजी ने प. नेहरू और गांधी जी को उनकी भारत वापसी के लिये पत्र भी लिखे थे जिसमें इनसे कहा गया था कि उनकी भारत वापसी के लिये    प्रंबध किया जाय 1951 मे प. नेहरू ने आजाद हिन्द सरकार के जन संपर्क मंत्री एस. के अययर को टोकियो भेज कर कर्नल टाडा से गुप्त रूप से सम्पर्क करके नेताजी की मृत्यु की सत्यता का पता करने को कहा अययर ने नेहरू को  जो गुप्त रिर्पोट दी उसमे कहा गया था कि कर्नल टाडा ने मुझसे कहा कि जापान के समर्पण के बाद तेरोची ने नेताजी की पूरी मदद करने की जिम्मेदारी ली और उन्होने कर्नल  टाडा से कहा कि वे बोस तक जायें और और उन्हें रूस सीमा तक पहुँचने  को कहें उन्हें पूरी मदद दी जायेगी प. नेहरू की आत्मा ने उनकी मौत से पूर्व उन्हें कचोटा और उन्होने 23 मई 1962 को पत्र द्वारा नेताजी के अग्रज सुरेश वन्द्र बोस बताया कि मैं नेताजी की मृत्यु का कोई निश्चित प्रमाण पत्र नहीं भेज सकता। जापानी विदेश मंत्रालय ने नेताजी की अन्त्येष्टि का एक प्रमाण पत्र जापानी  भाषा मे प्रस्तुत किया जो ताईहोकू नगर पालिका द्वारा जारी किया गया था। जब उसका अंग्रेजी मे अनुवाद किया गया तो वह एक जापानी सैनिक ईकीरो ओकूरा का निकला जो हार्ट अटैक से मरा था विमान दुर्घटना की खबर मे बताया गया था कि उसी दिन जनरल शैदई भी दुर्घटना मे मारे गये थे जबकि उनकेे पेंशन प्रमाण पत्र में यह दर्शाया गया था कि उनकी मृत्यु युद्ध करते हुये युद्ध क्षेत्र मे हुयी थी। शहनवाज आयोग के सामने नेताजी के साथी एस. के अययर ने बयान दिया जापानी अशिकारियों के अनुरोध पर उस विमान दुर्घटना का ब्यौरा मैने ही तैयार किया था।
 शहनवाज आयोग बोगस साबित हुआ संासदों के विशेष आग्रह पर 11 जुलाई 1970 को पंजाब हाईकोर्ट के पूर्व जज श्री जी. डी. खोसला को नियुक्त कर खोसला आयोग बनाया गया।
 भारत हैवी इंजीनियरिंग निगम के इंजीनियर अरदेन्दू सरकार 1961 में रूस गये थे वहाँ उनकी मुलाकात एक जर्मन यहूदी इंजीनियर बी. ए. जेरोबीन से हुयी थी जो नेताजी का विश्वयुद्ध के समय का मित्र था उसने श्री सरकार को बताया कि उसने 1948 मे नेता जी से साईबेरिया में एक यातना शिविर मे मुलाकात की थी जेरोबीन ने जर्मन  भाषा मे नेता जी से हाल चाल पूछा और पूछा कि वे इंडिया कब जा रहे है। नेताजी ने जर्मन मे ही बताया जल्दी ही तभी उनके मंगोलियाई अनुवादक ने उन्हें रोक दिया जेराबीन ने सरकार से कहा  कि नेताजी के रूस मे होने की बात किसी से ना कहें वरना हम दोनों की जान को खतरा है। सरकार ने इस बारे मे रूस के भारतीय दूतावास से बात की तो उन्हें कड़ी चेतावनी दी गई सरकार मौन हो गये 1962 में सुभाष बाबू के भतीजे लेखक प्रदीप बोस को रंगून मे बर्मा के राष्ट्रपति डा. बा माव ने बताया था 2 मई 1946 को मिस हैनचेट द्वारा निर्मित्त एक टॅाप सीक्रेट भारतीय दस्तावेज के अनुसार सुभाष बाबू रूस मे जीवित थे एक हिन्दुस्तानी पत्रकार हीरेन शाह ने रेंकोजी मंदिर के अवशेषों व नेताजी के मृत्यु प्रमाणपत्र की जंाच की तो जापानी विदेश मंत्रालय ने नेताजी की अन्त्येष्टि की एक प्रमाणपत्र जापानी भाषा मे प्रस्तुत किया जो ताईहोकू नगर पालिका द्वारा जारी किया गया था जब उसका अंग्रेजी मे अनुवाद किया गया तो वह एक जापानी सैनिक ईकीरो ओकूरा का निकला जो 19 अगस्त को हार्ट अटैक से मरा था श्यामलाल नामक एक स्टैनोग्राफर ने खोसला आयोग के सामने कहा प. नेहरू ने उसे एक हस्तलिखित नोट देकर उसकी काॅपी बनाने को कहा जिसमे ब्रिटेन के      प्रधानमंत्री एटली को  लिखा था कि आपके अपराधी  सुभाष बोस स्टालिन की मदद से देरेन मंचूरिया के रास्ते रूस मे पहुँच गये हैं। बाद मे  उन्हें रूस मे गुलाग मे भेजा गया खोसला कमीशन के सामने 1950 के पूर्व रूस मे रहे भारत के भारतीय राजदूत सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा कि नेताजी उस समय साईबेरिया मे थे। खोसला आयोग के सामने सुभाष बाबू के भाई शरत ने शपथ लेकर कहा कि उनके भाई जीवित हैं यह सत्य है कि नेहरू जी ने अपनी मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व 1959 मे गुप्त रूप से नेताजी को भारत मे प्रवेश करा लिया था नेहरू जी की मृत्यु के बाद नेताजी स्वयं उन्हें अर्थी पर श्रद्धान्जिली देने आये थे कुछ लोगांें के अनुसार वह गाँधी जी के अंतिम संस्कार मे भी आये थे उन दिनो कई अखबारों मे कुछ चित्र छपे थे जिसमे नेहरूजी की अर्थी के पास नेताजी स्पष्ठ खडे दिखाई दे रहे थे। 1970 के आसपास बंगाल के जलपाईगुड़ी शौलमारी आश्रम के स्वामी जी के नेताजी होने की चर्चा फैली थी जो 1973 में देहादून आ गयें थे देहादून के रिटायर्ड सी. बी. आई. इन्सपैक्टर ओम प्रकाश शर्मा व तथा एक अंय प्रशासनिक अधिकारी राजेन्द्रनाथ शर्मा ने पटियाला हाउस, राजपुर रोड पर रहने वाले स्वामी के बारे मे कई वर्षो तक जांच करके पाया कि शौलमारी आश्रम के स्वामी जी ही नेताजी थे उनसे आजाद हिन्द फौज के कई अधिकारी मिलने आते थे तथा नेताजी पठान वेश मे जब अफगानिस्तान भागे थे तो उत्तम चन्द्र मेल्होत्रा के घर रूके थे उत्तम चन्द्र मेल्होत्रा स्वयं कई बार बाबाजी से मिलने देहरादून आये थे श्री मेल्होत्रा ने लोगों से की गई बातचीत मे बताया कि स्वामी जी ही नेताजी हैं। 10 अप्रैल 1977 को  स्वामी जी की मृत्यु हो गई थी और उनका अंतिम संस्कार  एक सन्यासी की तरह नही कर पूरे रीति रिवाज के अनुसार किया गया था (साभार-राष्ट्रीय सहारा, 24 जुलाई) कुछ लोगों का विश्वास है। कि चर्चा फैलने के कारण खुद स्वामी जी गुप्त रूप से वहाँ से पलायन कर गये थे और वे फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रूप मे रहने लगे थे 1956 में गठित शहनवाज आयोग और 1970 में गठित जी डी खोसला आयोग की रिर्पोटों को जनता द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। बोस परिवार द्वारा दायर याचिका पर 30 अप्रैल 1998 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी सरकार को नेताजी से संबधित विवाद हल करने के लिये एक उच्चस्तरीय जाँच कराने का आदेश दिया सरकार ने 1999 मे सुप्रीम कोर्ट के सेवा निवृत्त जज श्री मनोज मुखर्जी को जांच हेतु नियुक्त किया आयोग का मुख्य उददेश्य नेताजी जी के अति प्रचारित सोवियत संबध की और उनकी 1945 मे मृत्यु के विवाद की जांच करना था कि नेताजी विश्व युद्ध समाप्ति के बाद वास्तव मे जीवित थे और 1950 के पूर्व साईबेरियन जेल मे थे उन्होने पहली बार रूस जाकर सबूतों की जांच की सोवियत सरकार के अनुसार उनके पास नेताजी से संबधित कोई दस्तावेज या रेकार्ड नहीं था एक सोवियत जनरल ने मुखर्जी आयोग के सामने शपथ लेकर कहा कि उसने बोस को जिंदा देखा था मुखर्जी आयोग ने 7 वर्ष की जांच के बाद बताया कि नेताजी अब मर चुके हैं नेताजी विमान दुघर्टना मे नही मरे थे रेकोंजी मंदिर मे रखे अवशेष नेता जी के नही है जिसे सरकार ने किसी अज्ञात दवाब मे ठुकरा दिया ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे साबित हों कि भगवान जी गुमनामी बाबा जो फैजाबाद मे 16 सिम्बर 1985 को मरे थे सुभाष चन्द्र बोस थे। ना ही शालमौरी आश्रम के बाबा सुभाष जी थे जनवरी 2010 को टी वी चैनल आज तक मे दियेे एक इन्टरव्यू मे जस्टिस मनोज मुखर्जी ने कहा कि यद्यपि कोई कानूनी सबूत नही है। पर मुझे सौ फीसदी यकीन है कि गुमनामी बाबा ही सुभाषचन्द्र बोस थे।