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निर्णायक आन्दोलन की आहट
February 24, 2020 • लाखनऊ। • News

सरकारी नौकरियों में अनु. जाति-जनजाति को आरक्षण का मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। सरकार का संवैधानिक कर्तव्य नहीं है कि सरकार आरक्षण की व्यवस्था करे। यह दुर्भाग्यपूर्ण फैसला 7 फरवरी 2020 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हो गया। दरअसल आरएसएस और उसकी भाजपा सरकार की सोच दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग विरोधी है। इस सरकार की घटिया दलील के कारण ही आरक्षण विरोधी ऐसा फैसला हो सका। आरक्षण के सहारे दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग राष्ट्र की मुख्य धारा में जुड़ने लगा था। वर्ण व्यवस्था से मुक्ति पाकर अब यह समाज, समतामूलक भारत का हिस्सा बनने लगा था। परन्तु आरएसएस और उसकी भाजपा सरकार को सामाजिक बराबरी बर्दाश्त नहीं है। जिस समाज को सदियों तक शिक्षा, संपदा, संसाधनों के अधिकार से वंचित रखा गया, वह समाज दीन हीन बनकर जानवरों से बदतर जीवन जीने लगा। यही समाज आरक्षण के सहारे बराबरी का दर्जा पाने लगा। यह बात आरएसएस और भाजपा को खटकने लगी। आरएसएस और उसकी भाजपा सरकार भारतीय संविधान को नहीं बल्कि मनुस्मृति को ही अपना संविधान मानती है।
 संविधान निर्माता बाबा साहेब डा अम्बेडकर केा संविधान लागू करने वालों पर संदेह था। संविधान सभा में उन्हें कहना पड़ा था कि ‘‘संविधान चाहे कितना ही अच्छा हो, उसे लागू करने वाले अच्छे न हो तो अच्छा संविधान भी बुरा हेागा। यदि लागू करने वाले अच्छे हों तो संविधान अच्छा हेागा।’’
 दलितों और अन्य पिछड़ों का आरक्षण आवश्यक है। यह आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक दलित और सामाजिक और शैक्षिक तौर पर उच्च वर्ग के बराबर न आ जाय। भारतीय संविधान की यही मूल भावना है। पच्चासी प्रतिशत के करीब आबादी वाले दलित-पिछड़े वर्ग को साथ लिए बिना भारत को एक स्मृद्धिशाली राष्ट्र बनाने का सपना साकार होना संभव नहीं होगा। संवैधानिक शीर्ष पदों पर बैठे भारत के ओहदेदारों को अमेरिका के ‘अश्वैत भागीदारी’ फार्मूले से सबक लेना चाहिए। अमेरिकी सत्ता ने सत्रहवीं सदी में अफ्रीका से आये अश्वेतों को शिक्षा, संपदा, संसाधनों में उनकी आबादी के अनुसार हिस्सेदारी देकर एक समृद्ध अमेरिका का निर्माण कर लिया। परन्तु भारत में आरएसएस की भाजपा सरकार यहां के मूल निवासी दलितों और पिछड़ों को गुलाम बनाये रखना चाहती है। बीएस4 (भारतीय संविधान संरक्षण संघर्ष समिति) इस दबे कुचले और पिछड़े-पिछाड़े गये समाज के अधिकार के लिए निर्णायक आन्दोलन करेंगी।