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पिंडारिया को धोखे से मारा
November 18, 2019 • विक्रमादित्य

पिंडारी मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होंता है, लुटेरे सैनिक पिंडारी (दक्षिण भारत के युद्धप्रिय अफगानी पठान सवार थे, जो मुगलों के पहल भारत के शासक थे। वे बड़े कर्मठ, साहसी तथा वफादार थे। टट्टू उनकी सवारी थी। तलवार और भाले उनके अस्त्र थे। पिंडारियों में धार्मिक संकीर्णता न थी उनकी स्त्रियों का रहन-सहन हिंदू स्त्रियों जैसा था, उनमें-देवी देवताओं की पूजा प्रचलित थी। मराठों की अस्थायी सेना में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। पिंडारी सरदार नसरू ने मुगलों के विरुद्ध शिवाजी की सहायता की। पुनापा ने उनके उत्तराधिकारियों का साथ दिया। गाजीउद्दीन ने बाजीराव प्रथम को उसके उत्तरी अभियानों में सहयोग दिया। चिंगोदी तथा हूल के नेतृत्व में 15 हजार पिंडारियों ने पानीपत के युद्ध में भाग लिया। अंत में वे मालवा में बस गए और सिंधिया शाही तथा होल्कर शाही पिंडारी कहलाए। ही डिग्री और बुर्रन उनके सरदार थे, बाद में चीतू, करीम खाँ, दोस्त मुहम्मद और वसील मुहम्मद सिंधिया की पिंडारी सेना के प्रसिद्ध सरदार हुए तथा कादिर खाँ, तुक्कू खाँ, साहिब खाँ और शेख दुल्ला होल्कर की सेना में रहे। पिंडारी सवारों की कुल संख्या लगभग 50,000 थी। युद्ध में लूटमार और विध्वंस के कार्य उन्हीं को सौंपे जाते थे। लूट का कुछ भाग उन्हें भी मिलता था। शांतिकाल में वे खेती-बाड़ी तथा व्यापार करते थे। गुजारे के लिए उन्हें कर मुक्त भूमि तथा टट्टू के लिए भत्ता मिलता था। मराठा शासकों के साथ वेलेजली की सहायक संधियों के फलस्वरूप पिंडारियों के लिए उनकी सेना में स्थान न रहा। इसलिए वे धन लेकर अन्य राज्यों का सैनिक सहायता देने लगे तथा अव्यवस्था से लाभ उठाकर लूटमार से धन कमाने लगे। उन्हीं के भय से कुछ देशी राज्यों ने अग्रेजों से संधियाँ स्वीकार की। उन्होंने मिर्जापुर से मद्रास तक और उड़ीसा से राजस्थान तथा गुजरात तक अपना कार्यक्षेत्र विस्तृत कर दिया। 1812 में उन्होंने बुंदेलखंड पर 1815 में निजाम के राज्य से मद्रास तक तथा 1816 में उत्तरसर जॉल माल्कम ने आपरेशन पिंडारी की योजना बना ली। ब्रिटानी हुकूमत ने तय कर लिया कि हर हालत में अब या तो पिंडारियों के उपद्रव खत्म हो जाए, उपद्रव खत्म न हो तो पिंडारियों को खत्म कर दिया जाएगा, सरकारों के इलाकों पर भंयकर धावे किए। इससे पिंडारियों की गणना लुटेरों में होने लगीपिंडारियों के चार प्रमुख नेता थे। करीम खां, वसील मुहम्मद, चीतू खां, नामदार खां और अमीर खां। इनसे स्थिति से मुक्ति पाने के उद्देश्य से  पिंडारी सरदारों में फूट डाल दी तथा देशी राज्यों से उनके विरुद्ध सहायता ली। फिर अपने और हिसलप के नेतृत्व में 120,000 सैनिकों तथा 300 तोपों सहित उनके इलाकों को घेरकर उन्हें नष्ट कर दिया। अंग्रेज पूरी ताकत के साथ पिंडारियों के विनाश के लिए अपनी और अपनी गुलाम राजाओं की सेना के साथ मेदान में आ डटे । उनकी योजना यह थी कि पिंडारियों के प्रमुख योद्धाओं या सरदारों को वे इलाके या नगर सम्हलवा दिए जाएं, जहां वे ज्यादा प्रभावी हैं। और जो इस योजना को नही माने उन्हें जिन्दा न छोड़ा जाए। हजारों पिंडारी मारे गए, बंदी बने या जंगलों में चले गए। अमीर खां को टोंक का नवाब बना दिया चीतू को असोरगढ़ के जंगल में चीते ने खा डाला। वसील मुहम्मद ने कारागार में आत्महत्या कर ली। करीम खाँ को गोरखपुर जिले गनेसपुर की जागीर दी गई करीम खां के भतीजे नामदार खां को अंग्रेजों ने भोपाल में बसा दिया। वसील मुहम्मद को अंग्रेजों ने गाजीपुर कारागार में बंद कर दिया, जहां उनकी मौत हो गई और पिंडारियों के एक ओर प्रमुख नेता चीतू खां को जंगल में चीता खा गया। लगभग सारे पिंडारी नेता इस तरह निपट गए, इनके अलावा जिन पिंडारियों ने अंग्रेजो की शर्ते कबूल कर ली उनको भी जीवनयापन के साधन मुहैया करा दिए और जो मरने-मारने पर आमादा थे उन बाकी बचे नेतृत्वहीन पिंडारियों को अंग्रेजों ने घेर-घेर कर धोखे से मारा।